किसके हाथों में होगी यूपी BJP की कमान, अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में हैं ये नाम, जल्द होगा ऐलान

यूपी में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पद की दावेदारी में सबसे ज्यादा तो ब्राह्मण बिरादरी से ही दिख रहे, दूसरे-तीसरे नंबर पर ओबीसी और दलित। लेकिन हाईकमान क्या करेगा किसी को खबर नहीं। कोई ऐसा नाम भी कहीं सामने ना आ जाए, जो अभी जमीन पर किसी को दिख ही नहीं रहा।

फोटो: Getty Images
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नवजीवन डेस्क

क्या भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने अन्य फैसलों की तरह उत्तर प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष के मामले में भी कोई चौंकाने वाला नाम लेकर सामने आने वाला है? लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में अभी यही चर्चा आम है। बताया जा रहा है कि यूपी बीजेपी की कमान किसे मिलेगी, फैसला एक-दो दिन में हो जाएगा लेकिन एक लॉबी ऐसी भी है जिसका मानना है कि नाम की घोषणा होने में पांच से सात दिन भी लग सकते हैं।

यूपी बीजेपी के अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह के इस्तीफे के बाद फिलहाल नजर इसी बात पर टिकी है कि कमान शर्मा, वर्मा या मौर्य में से किसी को मिलती है या फिर अब तक चर्चा में न आए किसी ऐसे चेहरे को जो सूबे की राजनीति, खासतौर से जातीय गुणा-गणित और इसके नतीजे ही उलटकर रखने वाला हो। बीजेपी जिस तरह अभी से 2024 की तैयारी में दिख रही है, उसमें इस बात की संभावना या बहुतों के लिए ‘आशंका’ से इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल इतना तो तय है कि जातीय समीकरण के मद्देनजर नया चेहरा ऐसी किसी जमात से ही होगा जो मौजूदा गणित में कोई बड़ा संदेश बनकर तो आए ही, बड़े उलटफेर का दम भी रखता हो। हालांकि यह पहली बार है जब मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक कोई भी, किसी नाम पर दांव खेलने को तैयार नहीं दिखता।

सत्ता शीर्ष के एक करीबी कहते हैं: “मोदी-शाह-योगी युग में किसी नाम पर अटकल लगाने का अब कोई औचित्य नहीं रहा। हर अटकल तो गलत ही साबित हो जाती है”।


नाम जो हवा में तैर रहे हैं:

राजनीतिक हलकों में जो नाम सबसे ज्यादा लिया जा रहा है, केशव प्रसाद मौर्य हैं। इसके पीछे 2017 चुनाव के लिए उनकी परफ़ॉरमेंस की नजीर दी जा रही है। बीते दिनों केशव की दो दिवसीय दिल्ली यात्रा के दौरान उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात के बाद लखनऊ से दिल्ली तक केशव को ही फिर संगठन की कमान सौंपने की चर्चा को बल तो मिला ही है। केशव के नेतृत्व में ही बीजेपी ने 2017 में सूबे की 325 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बनाया था।

ब्राह्मण वर्ग से आने वाले दिनेश शर्मा और अनुसूचित SC कोटे से आने वाले बीएल वर्मा का नाम भी चर्चा में है। नाम तो गोरखपुर वाले सूर्य प्रताप शुक्ला का भी है लेकिन उतना गंभीर नहीं। कारण कि बीजेपी जिस तरह आक्रामक मूड में दिख रही है, उसमें मौर्य जैसे तपे-तपाए और खुद को साबित कर चुके नाम पर ही ज्यादा उम्मीद जताई जा रही है। पार्टी वैसे भी पिछड़ों पर ही ज्यादा दांव खेलने के मूड में है और अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी की ‘जमीनी निष्क्रियता’ का लाभ उठाकर वह इस जमात के बीच बड़ी घुसपैठ के साथ सपा को बड़ा डेंट देने से बाज नहीं आना चाहेगी। वैसे भी 2022 और इससे पहले के चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो बीजेपी को सवर्ण वोटों के बाद सबसे ज्यादा वोट OBC से ही मिलते रहे हैं। 2019 में तो बड़ी संख्या में यादव वोट भी बीजेपी की ओर चले ही गए थे। हालांकि सूत्रों के मुताबिक सरकारी खेमा यानी योगी समर्थक लॉबी पूर्व उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा या पूर्व मंत्री श्रीकांत शर्मा के पक्ष में है। श्रीकांत शर्मा की पैरवी तो पार्टी के एक राष्ट्रीय महामंत्री भी चुनाव बीतने के तत्काल बाद से करते आ रहे हैं।


दावेदार और भी हैं

OBC से आने वाले बीएल वर्मा और भूपेन्द्र सिंह चौधरी के नाम भी चर्चा में हैं। वर्मा अभी केंद्र में मंत्री और भूपेन्द्र चौधरी योगी कैबिनेट में पंचायती राज मंत्री हैं। ब्राह्मणों में पूर्व डिप्टी सीएम और लखनऊ के मेयर रह चुके दिनेश शर्मा, पूर्व ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा, प्रदेश महामंत्री और कन्नौज के सांसद सुब्रत पाठक, दिनेश उपाध्याय, गोविंद नारायण शुक्ला, हरीश द्विवेदी, सूर्य प्रताप शुक्ला, ब्रज बहादुर शर्मा, अलीगढ़ के सांसद सतीश गौतम, नोएडा के सांसद डॉ. महेश शर्मा और प्रदेश उपाध्यक्ष विजय बहादुर पाठक बड़े दावेदार माने जा रहे हैं। यानी यह लिस्ट काफ़ी लम्बी है।

पार्टी नेतृत्व द्वारा किसी दलित चेहरे पर भी दांव खेलने से इनकार नही किया जा सकता और इसके लिए उसके पास रामशंकर कठेरिया (इटावा से सांसद), कौशल किशोर (मोहनलालगंज से सांसद और केंद्रीय मंत्री) और विनोद सोनकर (कौशांबी से सांसद ) जैसे नाम मौजूद हैं।

लेकिन एक रसूख़ वाले सवर्ण बीजेपी नेता की इस बात से इनकार करने का भी कोई कारण नहीं दिखता कि ‘आप लोग ओबीसी, दलित, ब्राह्मण में ही उलझे रहिए, मौर्य, शर्मा, वर्मा, पांडेय, शुक्ला करते रहिए, कोई यादव क्यों नहीं हो सकता प्रदेश अध्यक्ष।’ इस नेता ने बात भले ही हल्के अंदाज में कही हो लेकिन इसे सिरे से इनकार करने का कोई फौरी कारण नहीं दिखता। भले ही बीजेपी में कोई बड़ा यादव चेहरा फिलहाल न दिख रहा हो। लेकिन हर बार दूर की कौड़ी लाकर खेलने वाला बीजेपी नेतृत्व इस दिशा में सोच ही रहा हो, आश्चर्य नहीं। आखिर मायावती और उनकी बीएसपी को किनारे लगाने के बाद अब उसका अगला निशाना स्वाभाविक रूप से समाजवादी पार्टी को निपटाने का ही होना चाहिए! ऐसे में मोदी-शाह की जोड़ी ऐसा कोई दांव ही खेल जाए, इनकार नहीं! समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की जमीन पर दिख रही निष्क्रियता और मुसलमानों की उनसे बढ़ती दिखाई देती दूरी के दौर में अगर ऐसा हुआ तो आने वाले दिन सूबे में किसी बहुत बड़े उलटफेर का गवाह बन जाएं मुमकिन है।

क्यों आया यादव नेता का नाम

पिछले दिनों कानपुर में जब समाजवादी पार्टी के संस्थापकों में से प्रमुख और मुलायम सिंह यादव के सबसे विश्वस्त सिपहसालार रहे चौधरी हरमोहन सिंह यादव की पुण्यतिथि मनाई जा रही थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्चुअल तौर पर इसमें शामिल हुए थे। दरअसल मोदी तो इसमें सशरीर आने वाले थे लेकिन राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण कार्यक्रम के चलते उन्हें इसमें वर्चुअली शामिल होना पड़ा था। कार्यक्रम कानपुर के मेहरबान सिंह पुरवा के उनके गांव में था। यादव नेता के परिवार के प्रति बीजेपी का बढ़ता प्रेम हालांकि इससे पहले भी चर्चा में आ चुका है, लेकिन कार्यक्रम में मोदी की इस तरह भगीदारी ने इसे जरूरी हवा दे दी। यह वही आवास है जिसे कभी मुलायम सिंह यादव का दूसरा घर माना जाता था।

बताते चलें कि मेहरबान सिंह पुरवा की यह कोठी कभी समाजवादी पार्टी की चुनावी रणनीति से लेकर कैबिनेट का आकार-प्रकार तक तय किया करती थी। इसे मिनी सचिवालय तक कहा जाता था, लेकिन हरमोहन यादव के निधन के बाद वक्त के साथ दूरियां बढ़ीं जो अब खुलकर सामने आने लगी हैं। कार्यक्रम के संयोजक सपा के पूर्व सांसद चौधरी सुखराम रहे जो हरमोहन सिंह के पुत्र भी हैं। चौधरी सुखराम की बीते दिनों योगी आदित्यनाथ से मुलाक़ात भी चर्चा में रही थी। उनके बेटे मोहित यादव पहले ही बीजेपी का दामन थाम चुके हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की इस परिवार के किसी कार्यक्रम में किसी भी तौर पर भागीदारी महत्वपूर्ण ही कही जाएगी। तब और भी ज्यादा जब नरेंद्र मोदी के बारे में यह साफ है कि वे कुछ भी आनायास नहीं करते। उनकी इस मौजूदगी को इसीलिए किसी बड़े राजनीतिक संदेश की पूर्वपीठिका माना जा रहा है।

बीजेपी 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अभी से फेंटा कसकर तैयार है और इसकी नजर यूपी की सभी सीटों पर जीत दर्ज करने की है। हालिया विधानसभा चुनाव और उसके नतीजों के बाद तो उसने यादव वोट बैंक को हथियाने का लक्ष्य ही प्राथमिकता पर ले लिया है। ऐसे में चौधरी हरिमोहन यादव के बहाने मिशन 2024 को साधने की कोशिश अगर मज़बूत होती दिख रही है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


क्यों देना पड़ा इस्तीफा:

फ़िलहाल खबर यही है कि नए अध्यक्ष की घोषणा तक स्वतंत्रदेव पार्टी के कार्यक्रमों में बतौर प्रदेश अध्यक्ष काम करते रहेंगे। स्वतंत्रदेव सिंह मुख्यमंत्री आवास पर बुधवार शाम हुई पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में भी शामिल हुए थे। माना जा रहा है कि शुक्रवार तक नए प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा नहीं हुई तो 29 से 31 जुलाई तक चित्रकूट में होने वाले तीन दिवसीय प्रशिक्षिण शिविर में भी स्वतंत्रदेव बतौर प्रदेश अध्यक्ष शामिल होंगे।

स्वतंत्रदेव सिंह 16 जुलाई, 2019 को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बने थे और उनका तीन साल का कार्यकाल इसी 16 जुलाई को पूरा हो गया। स्वतंत्र देव योगी कैबिनेट में जलशक्ति मंत्री भी हैं और काफी रसूख़ वाले माने जाते हैं। हालांकि यह भी सही है कि पार्टी में एक व्यक्ति एक पद का सिद्धांत है और ऐसे में चुनाव के बाद से ही नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति की अटकलें लगाई जा रही थीं और चुनाव के तत्काल बाद श्रीकांत शर्मा का नाम तेजी से उछला भी था।

लेकिन अब तीन साल का कार्यकाल पूरा होते ही स्वतंत्रदेव ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया तो अटकलें शुरू होनी ही थीं। चर्चा है कि इसके पीछे जलशक्ति राज्यमंत्री दिनेश खटीक का बड़ा हाथ रहा, जिनके इस्तीफा देने के बाद स्वतंत्रदेव पर दबाव बढ़ गया था। पार्टी का एक धड़ा स्वतंत्रदेव के खिलाफ यह कहते हुए खड़ा हो गया था कि वह मंत्री के साथ प्रदेश अध्यक्ष भी हैं और पार्टी का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता। अंततः इस दबाव के और बड़ा बनने से बचाने के लिए स्वतंत्रदेव ने खुद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को इस्तीफा सौंप दिया।

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Published: 29 Jul 2022, 4:03 PM