Ukraine-Russia War: आखिर इस युद्ध से हासिल क्या करना चाहते हैं पुतिन!

पुतिन केजीबी गुप्तचर अधिकारी रहे हैं। पश्चिमी विश्लेषक आरोप लगाते हैं कि वह सोवियत संघ के विघटन को पचा नहीं पाए हैं। उन्होंने 1995 में राजनीति में प्रवेश किया और पिछले 22 साल से रूस में शीर्ष स्थान पर रहे हैं।

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नवजीवन डेस्क

रूस ने यूक्रेन के नाटो और यूरोपीय संघ के सदस्य बनने पर आपत्ति की। इसका कहना है कि नाटो ने 1990 में पूरब की तरफ एक इंच भी न बढ़ने पर सहमति जताई थी लेकिन अब यह रूस की गर्दन तक पहुंच गया है। पुतिन का तर्क है कि यूक्रेन में नाटो की सेनाएं रहीं या उसका बेस बना तो रूस पर खतरा हो जाएगा। इसका प्रतितर्क यह है कि 1990 में दिया गया आश्वासन सोवियत संघ के विघटन से पहले का था और कि सोवियत संघ में शामिल रहे कई गणराज्य पश्चिम और नाटो के साथ निकटवर्ती रिश्ते चाहते हैं क्योंकि वे रूस से खतरा महसूस करते हैं। अगर यूक्रेन यूरोपीय संघ या नाटो का हिस्सा बनना चाहता है, तो इसमें रूस को क्यों आपत्ति होगी? दूसरीओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका में रिपब्लिकन का बड़ा हिस्सा तथा यूरोप में दक्षिणपंथी राजनीतिज्ञ मानते हैं कि यूक्रेन आजादी के लायक नहीं है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से यह रूस का हिस्सा था और कि यूक्रेन के लोग रूसी हैं तथा जैसा कि पुतिन कहते हैं, यूक्रेन के नेता ‘मादक पदार्थों के व्यसनी, फासिस्ट नाजी’ हैं।

रूसी साम्राज्य का सपना

पुतिन केजीबी गुप्तचर अधिकारी रहे हैं। पश्चिमी विश्लेषक आरोप लगाते हैं कि वह सोवियत संघ के विघटन को पचा नहीं पाए हैं। उन्होंने 1995 में राजनीति में प्रवेश किया और पिछले 22 साल से रूस में शीर्ष स्थान पर रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जॉर्जिया, क्रीमिया, बेलारूस में उनकी कार्रवाई बताती है कि वह पूर्व सोवियत संघ के प्रभाव को रूसी बोलने वाली दुनिया में वापस लाना चाहते हैं।

कब्जा या कोई और इरादा?

जरूरी नहीं कि रूस यूक्रेन पर कब्जा करना चाहता है। पुतिन देश का विभाजन कर और उसे कमजोर कर छोड़ देना चाहेंगे और उसी तरह शासन में बदलाव चाहेंगे जिस तरह अमेरिकी करते रहे हैं। पुतिन ने संभवतया तर्क दिया होगा कि अगर अमेरिका अरब को आजाद करने का जिम्मा ओढ़ ले सकता है, तो वह रूसी भाषी लोगों को आजाद क्यों नहीं कर सकते हैं? रूसी विदेश मंत्री सरगे लावरोव ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में दावा भी किया कि यूक्रेन एक समान देश नहीं है, कि यूक्रेन में पोलैंड, रोमानिया, रूस और हंगरी के लोग भी हैं। यूक्रेन के डोनबास क्षेत्र में रूसी बोलने वाले अल्पसंख्यक आबादी के 40 फीसदी हैं। पुतिन ने पिछले महीने डोनबास की आजादी को मान्यता दी। यहां रूस 2014 से अलगाववादियों को समर्थन दे रहा है।


क्या इसकी वजह घरेलू है?

पुतिन 2024 में 72 साल के हो जाएंगे। उन्हें पुनः निर्वाचित होना होगा। हालांकि उन्होंने 2020 में रूसी संविधान में इस तरह का संशोधन करवा लिया है कि वह छह-छह साल के लिए दो बार राष्ट्रपति रह सकते हैं, उन्हें दोनों बार चुनाव में जाना ही होगा। विश्लेषकों का मानना है कि 2024 का चुनाव वह आसानी से जीत जाएंगे क्योंकि एकमात्र प्रतिद्वंद्वी अलेक्सई नैवेल्नी सजायाफ्ता हैं। लेकिन पुतिन को जनता के बीच अपनी लोकप्रियता प्रदर्शित करनी होगी और चुनावों से पहले सख्त बने रहना होगा।

हमले से हासिल क्या हुआ है?

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस हमले का रूस पर उलटा असर हुआ है। इसने यूरोप में एकता ला दी है, फिनलैंड- जैसे देशों की तटस्थता समाप्त हो गई है, स्विट्जरलैंड और जर्मनी ने अमन पसंदगी और यूक्रेन को हथियार न बेचने की नीति त्याग दी है। यहां तक कि नाटो ने भी पूर्वी यूरोप तक अपने पंजे बढ़ा दिए, हालांकि उन्हें यह कहने में भारी परेशानी हुई कि नाटो यूक्रेन की लड़ाई नहीं लड़ेगा।

परमाणु चेतावनी क्या वास्तविक है?

पुतिन निश्चिततः निर्दयी नेता हैं, ऐसे बाहुबली जो अपने को रूस के सुरक्षा कवच के तौर पर देखते हैं। रूस को उनकी जरूरत है और अगर उन्हें ऐसा लगेगा कि रूस खतरे में है, तो वह परमाणु विकल्प का उपयोग करेंगे, भले ही वह पहला बम महासागर में डालकर देखेंगे कि उसका दुनिया पर क्या प्रतिक्रिया होती है। कुछ विश्लेषक पहले दिए गए उनके बयानों की भी याद दिलाते हैं, खास तौर से 2018 में दिए उस बयान की जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर रूस नहीं रहेगा, तो शेष दुनिया रहे या नहीं, उसका क्या मतलब है? पुतिन ने हाल में भी धमकी दी है कि अगर अन्य देशों ने यूक्रेन मामले में हस्तक्षेप किया, तो उन्हें वैसी स्थिति भुगतनी होगी जैसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ होगा।

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