देश की बर्बादी के 8 साल और राजा का जश्न, भारत के आगे पूरी तरह बदरंग नजर आता है न्यू इंडिया!

आठ वर्ष पहले, शायद ही किसी राजनैतिक विद्वान ने आने वाले वर्षों में ऐसे देश की कल्पना की होगी। वाकई खूबसूरत भारत के आगे न्यू इंडिया पूरी तरह बदरंग नजर आता है। इन आठ वर्षों में सत्ता पूरी तरह व्यक्तिवादी और जिम्मेदारी से मुक्त हो चुकी है।

फोटो: सोशल मीडिया
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महेन्द्र पांडे

आदत से मजबूर सत्ता देश के 8 वर्ष की तबाही के उत्सव और आजादी के अमृत महोत्सव के जलसों में व्यस्त है। आठ वर्ष पहले, शायद ही किसी राजनैतिक विद्वान ने आने वाले वर्षों में ऐसे देश की कल्पना की होगी। वाकई खूबसूरत भारत के आगे न्यू इंडिया पूरी तरह बदरंग नजर आता है। इन आठ वर्षों में सत्ता पूरी तरह व्यक्तिवादी और जिम्मेदारी से मुक्त हो चुकी है। देश में मंत्री पद का लाभ लेते तमाम लोग अपने विभाग का काम करने नहीं बल्कि विपक्ष की अश्लील आलोचना करने और कभी-कभी चुनाव प्रचार कर लेते हैं। हमारे प्रधानमंत्री जी भी हमेशा चुनावी मोड में रहते हैं और नए नारे गढ़ने में व्यस्त रहते हैं। देश को आगे बढाने की नीतियां है ही नहीं, बस प्रधानमंत्री जो कहते हैं वही विकास की लकीर बन जाता है। फिर, उसका प्रचार मंत्री और मेनस्ट्रीम मीडिया करना शुरू कर देते हैं और फिर दिनभर ट्विटर पर बैठी सेना उसे जन-जन तक पहुंचाती है।

प्रधानमंत्री इस दौर को देश की समृद्धि का नया काल बताते हैं। देश में विदेशी पूंजी का अकाल है, रूपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोरी का लगातार नया रिकॉर्ड स्थापित करता जा रहा है, बेरोजगारी दर आजादी के बाद सबसे अधिक है, महंगाई चरम पर है, देश की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी प्रति माह 10,000 रुपये या इससे कम में गुजारा करने को मजबूर है – जाहिर है ऐसी तथाकथित समृद्धि देश में किसी दौर में नहीं देखी है। लगता है प्रधानमंत्री जब देश की बात करते हैं, तब उनका मतलब केवल उनकी पार्टी और कुछ चुनिन्दा पूंजीपति ही होते हैं। देश ने समृद्धि की ऐसी कहानी रची है जिसमें सभी सरकारी उपक्रम बेचने की नौबत आ गयी है। पूंजीपतियों की समृद्धि का आलम यह है कि आम आदमी की जिन्दगी से जुडी अधिकतर चीजों – सीमेंट, बाज़ार, रेल, रोड, बंदरगाह, हवाईअड्डे, बिजली, कोयला, पेट्रोलियम उत्पाद, मोबाइल नेटवर्क, मीडिया, सौर-उर्जा – पर उनका एकाधिकार होता जा रहा है। तभी तो अडानी जैसे पूंजीपति अब वही भाषा बोलते हैं, जैसा हमारे प्रधानमंत्री बोलते हैं – अडानी ने हाल में ही कहा था कि जब देश की अर्थव्यवस्था 10 ख़रब डॉलर की हो जायेगी तब देश में कोई भूखा नहीं सोयेगा। प्रधानमंत्री जी यही सब्जबाग 5 ख़रब डॉलर की व्यवस्था के लिए दिखाते थे। हाल में ही एक समाचार के अनुसार अडानी पर 2.2 ख़रब रुपये का कर्जा है, फिर भी सत्ता की नजदीकियों के कारण वे देश के इतिहास का सबसे महंगा अधिग्रहण कर रहे हैं और दूसरी तरफ बैंक उनके कर्जे को माफ़ करते जा रहे हैं।


पिछले 8 वर्षों के दौरान बार-बार देश से आतंकवाद मिटाने के दावे किये गया। नोटबंदी से जिस आतंकवाद की कमर तोड़ी गयी थी, उसे फिर से जम्मू-कश्मीर के टुकड़े कर और विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म कर फिर से जड़ से मिटा दिया गया। अब जम्मू-कश्मीर में जानलेवा हमले रोज होने लगे हैं, सभी धर्मों के लोग मारे जा रहे हैं। जिन कश्मीरी पंडितों की एकतरफा कहानी बयान करने वाली फिल्म को प्रधानमंत्री समेत सभी कट्टरवादी राष्ट्रीय फिल्म का दर्जा दे रहे थे, उनकी आवाजें कश्मीर में पंडितों की हत्या के सन्दर्भ में खामोश हैं। कश्मीर ही नहीं बल्कि पूरे देश में ही हत्या और धार्मिक उन्माद के बारे में सत्ता खामोश रहती है। यह बात दूसरी है कि पिछले 8 वर्षों से एक ट्रेंड चला आ रहा है – जब भी किसी विरोधी पार्टी शासित राज्यों में चुनाव होते हैं तब प्रधानमंत्री जी तामझाम से तमाम विकास परियोजनाओं की सौगात बांटने पहुंचते हैं। इसके बाद चुनाव होते है और परियोजनाएं भुला दी जाती हैं। फिर अगले चुनावों में पिछली परियोजनाओं को नए कलेवर में सौगात के तौर पर प्रचारित किया जाता है। पिछले 8 वर्षों का एक और ट्रेंड है – विपक्षी राज्यों में चुनाव प्रचार के आरम्भ में ही दो-तीन बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या करवा दी जाती है और उसके बाद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की जोड़ी उसी राज्य में कैम्प लगाकर उसे भुनाने में जुट जाते हैं। सवैधानिक संस्थाओं और ईडी जैसी जांच एजेंसियों का दुरूपयोग इस हद तक बढ़ गया है कि अब तो राज्यों के चुनाव से पहले ही अनुमान लगा सकते हैं कि तथाकथित रूटीन जांच के दायरे में कौन से नेता आएगा।

पिछले 8 वर्षों के दौरान समाज में जो परिवर्तन आया है उसके गंभीर परिणाम लगातार सामने आ रहे हैं। पहली बार देश का समाज विकास के क्रम में तेजी से पीछे जाने लगा है। सामाजिक विकास के साथ ही सामाजिक समरसता बढ़ती है, पर हमारा समाज हिंसक हो चला है इस हिंसा का समर्थन सत्ता और सत्ता के दरबार में बैठी मेनस्ट्रीम मीडिया खुले आम करती है। हिंसा केवल धरातल पर ही नहीं दिख रही है, बल्कि अब तो सत्ता, समाज और मीडिया की भाषा में लगातार झलकती है। सामाजिक वैमनस्व को लगातार हवा दी जाती है और धार्मिक उन्माद में हत्यारों को पुलिस बचाती है और सत्ता उन्हें पुरस्कार देती है।


जिस आजादी का जश्न सरकार मनाती है वह आजादी केवल प्रधानमंत्री, मंत्री, संतरी और पूंजीपतियों के पास है, बाकी देश तो इन सबका गुलाम है। दरअसल सरकार भी जश्न केवल इसी का मनाती है। तभी तो 80 करोड़ अत्यधिक गरीब आबादी की गरीबी कम करने की कोई नीति नहीं बनाई जाती है, बल्कि इस गरीबी का मजाक उड़ाया जाता है, जिसे सरकार उत्सव कहती है। इस उत्सव का सरकार के सामने घुटने टेक चुकी मीडिया सीधा प्रसारण करती है, जिसमें प्रधानमंत्री प्रवचन देते हैं और प्रसाद के तौर पर 5 किलो अनाज दिया जाता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि यह सब कवायद अनाज देने के लिए नहीं की जाती बल्कि उस थैले को बांटने की होती है जिसपर प्रधानमंत्री की तस्वीर होती है। प्रधानमंत्री जी ने यह तो सुनिश्चित कर लिया था कि आप टीवी देखें, सड़क पर चलें, पेट्रोल पम्प पर जाएं, समाचारपत्र पलटें, या फिर कोई सर्टिफिकेट डाउनलोड करें – हरेक जगह उनका चेहरा नजर आये, अब आप अपने घर में भी रहें तब भी थैले पर लटके प्रधानमंत्री के दर्शन करते रहें| जाहिर है, प्रधानमंत्री के दर्शन के मामले में हम अवश्य ही विश्वगुरु हैं।

अब, जनता की कोई मांग नहीं है, जनता की कोई आशा नहीं है, कोई महत्वाकांक्षा नहीं है – हमारे देश में लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी गयी है, जिसमें केवल प्रधानमंत्री की मांग, आशा और महात्वाकांक्षा का मतलब है, बाकी देश एक बड़ा सा शून्य है। दुनिया के बड़े से बड़े तानाशाह के देश में मीडिया और न्यायपालिका इस शून्य को भरने का काम करती है, पर अफ़सोस हमारे देश में दोनों ही प्रधानमंत्री की ही भाषा बोलते हैं। दुनिया में केवल हमारा देश ऐसा है जहां का मीडिया जनता का दुश्मन है और सरकारी चाटुकार बन बैठा है। न्यायपालिका का आलम भी यह है कि देश तोड़ने वाले, महिलाओं और मुस्लिमों के विरुद्ध हिंसक नारे लगाने वाले अगले दिन जमानत पर बाहर पहुँच जाते हैं और दूसरी तरफ जनता की आवाज उठाने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता सालों-साल जेल में सड़ते रहते हैं, कुछ तो जेल में ही मर भी जाते हैं।


प्रश्न यह उठता है कि क्या हम कभी इस गुलामी से बाहर आ सकेंगें, जिसमें एक मुख्यमंत्री या कोई भी जन-प्रतिनिधि हमारे सामने आकर गर्व से ऐलान करने की हिम्मत कर सके कि आजादी शब्द का मतलब राजद्रोह है। इसका उत्तर हमारे ऊपर निर्भर करता है। यदि हमने आज की परिस्थितियों का निष्पक्ष होकर विश्लेषण और आवाज बुलंद करना नहीं शुरू किया तो स्थिति और बदतर होती जायेगी। जो सरकार आज 5 किलो अनाज देने का उत्सव मना रही है, वही सरकार कल आधा किलो अनाज देकर और भी भव्य उत्सव आयोजित करेगी और भूखे पेट भी आपको तालियां बजानी पड़ेगीं, मीडिया के कैमरा से आंख मिलाकर मुस्कराना पड़ेगा। यदि एक गुलाम देश की जश्ने आजादी के बदले सही मायने में आजादी चाहते है तो जागिये, सोचिये, कुछ कीजिये – सही मायने में आजादी अपने आप में एक जश्न है।

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