देश के बदले हालात में बड़ा सवाल, क्या हम फिर से एक संवेदनशील समाज रचने में कामयाब होंगे?

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नेहरू ने ऐसे भारत की कल्पना की थी जिसमें जात-पात, धर्म आदि के आधार पर कोई भेदभाव न हो। हर तबके के लोगों को जीने और बढ़ने की आजादी हो। उन्होंने दुनिया को पंचशील का सिद्धांत देकर देश की एक विशिष्ट पहचान बनाई।

फोटोः gettyimages
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अधिकतर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया को देखें तो लगता है, देश में सिवा हिंदू-मुसलमान विवाद के कोई समस्या बची ही नहीं है। कुछ एंकर तो साफ तौर पर मुसलमानों को सबक सिखाने के काम में लगे हुए हैं। सोशल मीडिया सामाजिक मूड, खासकर नौजवानों के मूड का कुछ अंदाजा देता है। पढ़ने-लिखने का दौर तो लगता है, चला ही गया। अब तो ज्यादातर लोगों के लिए सूचना और विश्लेषण का माध्यम या तो टीवी है या सोशल मीडिया। टीवी में एक एजेंडे के तहत खबरें और टिप्पणियां बनती हैं जो समाज का दिमाग बनाती हैं। और, आज आजादी के बहत्तरवें साल में यह दिमाग किस दिशा में कहां तक चला गया है, उसे देखकर, देश के भविष्य के बारे में डर लगता है।

आप पिछले कुछ दिनों के सोशल मीडिया को देखें, तो मालूम पड़ेगा कि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मसला यह है कि किसी ने जोमैटो को दिया ऑर्डर कैंसल कर दिया क्योंकि खाना लेकर कोई मुसलमान आ रहा था। जैसी कि आजकल के माहौल में उम्मीद की जा सकती है, कुछ आत्यंतिक रूप से समझदार लोग इस खतरनाक हरकत का जमकर समर्थन कर रहे हैं, जोमैटो के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, “चुनाव की स्वाधीनता” का ढोल पीट रहे है।

इन महानुभावों से इतनी अक्ल की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती कि सोचें कि कल कोई कह सकता है कि दलित या आदिवासी का लाया खाना खाने से उनकी चुनाव की स्वाधीनता का हनन होता है। खतरे की बात यह है कि इस बेहूदगी का समर्थन असल में भारत राष्ट्र के समावेशी रूप को खत्म कर देने की, सच्चे भारतीय राष्ट्रवाद के स्थान पर देशघाती कट्टरपन लाने की राजनीति का बस एक और रूप है। राष्ट्रवाद के चोले में राष्ट्र को कमजोर करने की यह राजनीति ऐसे कई रूपों में बहुत अरसे से चलती रही है। पिछले कुछ बरसों में इसने खतरनाक कामयाबी हासिल की है।

चिंता की बात यह है कि जो इस खतरनाक राजनीति का विरोध करना चाहते हैं, वे भी जाने-अनजाने इसके हाथों खेल रहे हैं। सोशल मीडिया पर जोमैटो विवाद में लोकतांत्रिक और लिबरल लोग भिड़े हुए हैं, यह भूलते हुए कि जो उत्तर प्रदेश के उन्नाव में हुआ बल्कि होने दिया गया, वह कहीं ज्यादा चिंताजनक बल्कि खतरनाक है।

यह बलात्कार का सामान्य अपराध नहीं बल्कि संगठित अपराधी गिरोह-जैसा काम था। पीड़िता के परिवार और सहयोगियों को चुन-चुनकर निबटाया गया, पुलिस-प्रशासन पीड़िता का नहीं, आरोपी का साथ देता रहा जो कई पार्टियों से होने के बाद फिलहाल बीजेपी में शोभायमान हैं। आरोपी माननीय विधायक भी हैं, जेल में हैं, लेकिन जलवा ऐसा कि निर्वाचित सांसद महोदय उनका आभार प्रकट करने जेल जाते हैं। ट्रक दुर्घटना के नाम पर हुई कातिलाना साजिश पर सुप्रीम कोर्ट ने ताबड़तोड़ निर्देश न जारी किए होते, तो विधायक जी राष्ट्रवादी पार्टी से निष्कासित भी न किए जाते। हालांकि, यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि निष्कासित किए गए हैं, या केवल निलंबित।

इन दोनों घटनाओं में किस को कितना वजन मीडिया और सोशल मीडिया में मिला है, इस पर शांत चित्त से विचार करें, तो आप यह सोचे बिना नहीं रह सकते कि हम कितने बीमार समाज में बदल चुके हैं। किस तरह का दिमाग हमारा बनाया गया है।

सवाल उठता है कि कहां हैं विरोधी दल? निर्भया कांड बहुत वीभत्स था, लेकिन संगठित अपराध- माफियागीरी का नमूना नहीं। उस पर जैसा रोष समाज में व्यापा था, अब कहां गया? तत्कालीन गृहमंत्री और प्रधानमंत्री की खिल्ली उड़ाने वाली तेजस्वीआवाजें कहां गईं? मीडिया का मामला तो ऐसा है कि भविष्य में जब भी कभी आज के हिन्दुस्तान के इतिहास पर बात होगी तो मीडिया के अधिकांश को समाज के अमानवीयकरण में शर्मनाक हिस्सेदारी के अपराधी के रूप में याद किया जाएगा। लेकिन, कांग्रेस सहित अन्य विरोधी दलों को क्या हुआ है? लोकतंत्र में राजनैतिक दल होते किसलिए हैं? जनता के असंतोष को स्वर देने और उसे अपने राजनैतिक विचार की ओर मोड़ने के लिए। यही तो बीजेपी ने तथाकथित भ्रष्टाचार के मामलों में अन्ना हजारे के जरिये किया।

अन्ना हजारे दूसरे गांधी तो खैर क्या साबित होते, नंबर दो वाले जरूर साबित हुए। उनका गुणगान करने वाले वाम-लिबरल लोगों ने कभी आत्मालोचना की? कांग्रेस के विरोध के लिए किसी से भी जा मिलेगा टाइप नेताओं, बुद्धिजीवियों ने दो नंबर वाले अन्नाजी का साथ देने के लिए शर्म महसूस की? उसके लिए सार्वजनिक क्षमा याचना की?

और स्वयं कांग्रेस? आज के जो साढ़े आठ करोड़ नौजवान वोटर हैं जिनमें से ज्यादातर आक्रामक हिन्दुत्व के साथ हैं, उनकी ऐसी मानसिक बुनावट के लिए कौन जिम्मेवार है? कौन जिम्मेवार है ऐसी शिक्षा-पद्धति के लिए जो टेक्नोलाॅजी और मैनेजमेंट के प्रति पगलाए प्रेम से भरी हुई है। जिसमें न भाषा और साहित्य के लिए जगह छोड़ी गई, न इतिहास और दर्शनशास्त्र के लिए।

सच तो यह है कि विज्ञान का भी इस शिक्षा पद्धति में कोई महत्व नहीं। महत्व है तो केवल और केवल इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट का। ऐसे में भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास की समझ वाट्सएप यूनिवर्सिटी से आए तो ताज्जुब क्या? और अगर आप यह भी न जानते हों कि इस यूनिवर्सिटी में आक्रामक हिन्दुत्व किस तरह सर्वव्यापी है तो माथा पीटने से फायदा भी क्या?

वक्त बहुत कम है, हमें अपने आप से पूछना ही होगा कि आजादी के बहत्तर साल पूरे होने के बाद अपना देश कहां खड़ा है? जो सत्तर साल में क्या हुआ की हुंकार भरते हैं, उन्हें तो बस इतना याद दिलाना काफी है कि इस हुंकार के जरिये वे कांग्रेस पर सवाल नहीं उठा रहे बल्कि स्व. अटलजी के शब्दों में “देश के पुरुषार्थ का अपमान” कर रहे हैं। एक संदिग्ध भविष्य वाले कमजोर देश के दर्जे से निकल कर भारत बरसों पहले ही विश्व की महाशक्तियों की पांत में शामिल होने की राह पर चल पड़ा था।

इसके पीछे आजादी की लड़ाई की तपस्या तो थी ही, नेहरूजी की दूरदर्शिता भी थी कि बहुत सारे लोगों के सवालों, बल्कि मखौलों का मुकाबला करते हुए उन्होंने एक तरफ सामाजिक न्याय संभव करने का सपना देखा, दूसरी तरफ औद्योगीकरण और आर्थिक-सांस्कृतिक-वैज्ञानिक विकास के माध्यम से मजबूत आधुनिक राष्ट्र-राज्य की वास्तविक बुनियाद रखने की पहलकदमी की। लेकिन, साथ ही नेहरू ने समावेशी, संवेदनशील भारत-संकल्पना को लोगों के मानस में बैठाने की कोशिश भी की। आज आलम यह है कि आजादी के इस बहत्तरवें साल में हिन्दुत्ववादी फूले नहीं समा रहे कि नेहरूवियन कन्सेंस को खत्म करने में नहीं, तो जबर्दस्त चोट पहुंचाने में तो जरूर ही उन्होंने सफलता पा ली है।

कांग्रेस को फौरन सोचना होगा कि नेहरूवियन कन्सेंस को, स्वाधीनता आंदोलन की उस विरासत को, जिसके लिए गांधीजी ने प्राण न्यौछावर किए, बचाने के लिए आपके पास क्या है? बात चुनाव जीतने-हारने से बहुत आगे जाकर लोगों के मानस में समावेशी, सच्चे भारतीय राष्ट्रवाद को फिर से कायम करने की चुनौती तक पहुंच गई है। जहां सरकारें हैं, शिक्षा में की गई भयानक गलतियां सुधारने की शुरुआत वहां से की जा सकती है। उन्नाव कांड को केंद्र में रखकर पुलिस-प्रशासन और राजनैतिक नेतृत्व की जबावदेही की मांग को लेकर जबर्दस्तआंदोलन खड़ा किया जा सकता है। लेकिन यह सब होगा जनता के बीच जाकर, जनता से संवाद करके, जिसके लिए जरूरी है स्पष्ट राजनैतिक सोच, समावेशी राष्ट्रवाद का पुनःरेखांकन।

आजादी के बहत्तरवें साल में उन्नाव और जोमैटो से उभरता सवाल यही है कि हम संवेदनशील समाज फिर से रचने में कामयाब होंगे, रहेंगे या बीमार से बीमारतर होते जाएंगे?

(लेखक हिंदी के प्रमुख आलोचक, चिंतक और रचनाकार हैं)

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