भगवा चिट्ठा bhagwa-chittha

दक्षिणपंथ का बोलबाला...

भारत नाम का जो मूल विचार हमारे वंशजों ने हमें इस उम्मीद के साथ दिया था कि आने वाली पीढ़ियां इसकी रक्षा करेंगी और इस विचार को आगे लेकर जाएंगी, आज कहीं खो गया है।

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ज़फ़र आग़ा

आप पसंद करो या न करो, लेकिन आज का भारत आरएसएस का भारत है। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और अब राज्यसभा के अध्यक्ष तक। आज देश के सभी शीर्ष पदों पर आरएसएस का ही व्यक्ति विराजमान है। उपराष्ट्रपति पद पर वेंकैया नायडू की जीत ने ये चक्र पूरा कर दिया है। बीजेपी अब राज्यसभा में सबसे बड़ी पार्टी है, जहां कल तक वो अल्प संख्या में थी।

भारतीय शिक्षा पद्धति, संस्कृति, इतिहास और यहां तक कि विज्ञान को भी भगवा रंग देने के लिए सरकारी संस्थाओं और संस्थानों में अपने लोगों को बिठाने में संघ को कोई संकोच नहीं होता। संघ के लोग इतिहास को फिर से लिख रहे हैं जो ऐतिहासिक तथ्यों से परे प्राचीन भारत का महिमामंडन करने में जुटे हैं। इसके लोग सिनेमा को सेंसर कर रहे हैं ताकि लोकप्रिय मनोरंजन का केवल आरएसएस संस्करण ही लोगों तक पहुंच सके। आरएसएस के लोग बिना किसी नौकरशाही की पृष्ठभूमि के ही अब सचिव पद तक पहुंच कर प्रमुख सरकारी पदों पर नियुक्त किए जा रहे हैं।

आज विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और यहां तक कि मीडिया में भी संघ के ही पदचिहन नजर आते हैं। आप पसंद करें या नहीं, भारत अपने 70वें स्वतंत्रता दिवस पर पूरी तरह भगवा हो चुका है। दक्षिणपंथी हिंदुत्व की विचारधारा का बोलबाला है, जिसका उदारवादी राजनीतिक समूह बहुत ही हल्का-फुल्का प्रतिरोध कर पा रहे हैं।

1947 के दिनों से 2017 तक आते आते भारत में काफी बदलाव आया है। 1947 का भारत उदारवाद, बहुलवाद के लिए प्रतिबद्ध था, और सहिष्णुता के अपने प्राचीन सभ्यतागत मूल्यों में निहित लेकिन आधुनिकता की तरफ बढ़ता भारत था। 2017 का भारत उन मूल्यों में से किसी को भी प्रतिबिंबित नहीं करता है। आज हर महत्वपूर्ण पद पर बैठा व्यक्ति संघ की विचारधारा की कसम खाता है, जो उदारवाद, बहुलतावाद और सहिष्णुता विरोध पर आधारित है।

हम आज सबसे बुरे वक्त में रह रहे हैं, जब पाठ्य पुस्तकों को फिर से लिखा जा रहा है, इतिहास को एक नया विन्यास दिया जा रहा है और संस्कृति को भगवा रंग में रंगा जा रहा है। प्रमुख राजनीतिक दल की केवल एक आवाज़ है, जो भगवा धुनों में ही गूँजती है। कोई भी सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि हम तेजी से एक हिंदू राष्ट्र में बदल रहे हैं, जिसका स्वरूप पाकिस्तान की राजनीति जैसा ही है।

2017 का भारत, भीड़ की हिंसा का भारत है; एक ऐसा भारत, जहां कॉर्पोरेट जगत सबकुछ तय कर रहा है, जबकि गांधी का ‘आखिरी आदमी’ नोटंबदी के बोझ के नीचे दबा हुआ है। यह एक ऐसा भारत है जहां जन कल्याण की धारणा को इस हद तक नष्ट किया जा रहा है कि सरकारी अस्पतालों तक को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के नाम पर निजी हाथों में सौंपा जा रहा है। यह ऐसा भारत है जो आरएसएस की एक राष्ट्र, एक पार्टी और एक संस्कृति के सिद्धांत पर आधारित है।

आखिर भारत नाम का वह मूल विचार जो हमारे वंशजों ने हमें इस उम्मीद के साथ दिया था कि आने वाली पीढ़ियां इसकी रक्षा करेंगी और इस विचार को आगे लेकर जाएंगी, आज क्यों नष्ट हो गया है? सिर्फ इसलिए कि हमारे राजनेता नाकाम साबित हुए हैं और वह भी बुरी तरह। जाहिर है कि लोगों का विश्वास टूटा है और वे भगवा राजनीति की तरफ आकर्षित हुए हैं। लोगों ने भगवा एजेंडा को अपनाया नहीं था, उन्होंने तो सिर्फ कुछ ऐसे लोगों को सत्ता से बाहर किया था जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध हो गयी थी। लोगों ने उन लोगों को सत्ता पर बिठाया था, जिन्होंने अच्छे दिनों का वादा किया था।

आखिर मोदी शासन के सिर्फ तीन वर्षों में ऐसा नाटकीय बदलाव कैसे हो गया? दरअसल मोदी से पहले के सत्तासीन राजनेताओं ने उदारवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद और बहुलवाद के मूल भारतीय मूल्यों के साथ खतरनाक समझौते किये। बाबरी मस्जिद उस वक्त गिरा दी गयी जब देश का प्रधानमंत्री इसे सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या ही समझ रहा था।

याद है कि तत्कालीन प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने एक उन्मादी और सांप्रदायिक भीड़ के हाथों बाबरी मस्जिद गिराए जाने के अगले दिन संसद में क्या बयान दिया था: 'मजिस्ट्रेट ने सुरक्षा बलों को फायरिंग का आदेश ही नहीं दिया और इसलिए अयोध्या में जो कुछ हुआ, उस दौरान वे सब मूकदर्शक बने रहे।' देश के बंटवारे के बाद होने वाली सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और वीभत्व सांप्रदायिक समस्या का राव ने इस तरह वर्णन किया था।

यह कांग्रेस पार्टी के एक कथित 'धर्मनिरपेक्ष' प्रधान मंत्री के लिए मामूली मामला था क्योंकि वह अपने निजी स्वार्थों के लिए सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर काम कर रहे थे। नतीजा ये हुआ कि उसी दिन से धर्मनिरपेक्षता एक खोखला नारा बन गया और धर्मनिरपेक्ष लोगों को छद्म धर्मनिरपेक्ष कहने वाले आडवाणी को खुला मैदान मिल गया।

6 दिसंबर, 1992, जिस दिन बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया गया, उस दिन देश में न सिर्फ सांप्रदायिक राजनीति का खुला खेल शुरु हो गया बल्कि भगवा ताकतों को आम लोगों के बीच अपनी नफरत की राजनीति का प्रचार करने का एक सजा हुआ मंच भी मिल गया। भारत को अयोध्या की अंधकारपूर्ण दोपहर से 2002 के क्रिया-प्रतिक्रिया सिद्धांत पर हुए गुजरात दंगों में सामूहिक नरसंहार तक को सही बताने वाली राजनीति में झोंक दिया गया। और, धर्मनिरपेक्ष समूह मूक दर्शक बने रहे।

गुजरात दंगों के बाद पूरे एक दशक तक भारत को इस किस्म की राजनीति से राहत मिली, जब धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के गठबंधन ने देश पर शासन किया। लेकिन, इस दौरान किसी भी व्यक्ति ने नफरत की उस बढ़ती राजनीति के खिलाफ खड़ा होने का साहस नहीं दिखाया उठाया था जो अंदर ही अंदर तैयार हो रही थी। 1990 के दशक से 2014 के दौरान पूरे भारत में कहीं भी सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ कोई न कोई कदम उठाया गया और न ही कोई कार्रवाई की गयी और इस दौरान वाम दलों सहित भी दूसरे दल एक साजिश की तरह खामोश से रहे। बस औपचारिकता के लिए इक्का-दुक्का बयान या संसद में किसी मामले पर हस्तक्षेप के अलावा कुछ नहीं किया गया।

जन कल्याण वाली सरकार की अवधारणा ही उलटी कर दी गयी है क्योंकि गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी काटकर बड़े-बड़े कार्पोरेट घरानों को कर्ज दिया जा रहा है और इस रकम की वापसी नहीं हो रही। नतीजतन बैंक कंगाली के कगार पर पहुंच गए हैं। गरीबों को खाद्य सुरक्षा देने वाला कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का ड्रीम प्रोजेक्ट भी यूपीए -2 के शासनकाल में उनकी अपनी ही सरकार के दौरान ही नाकाम हो गया और चंपू पूंजीवाद का देश में बोलबाला हो गया। किसानों खुदकुशी कर रहे थे और सरकार नजरें फेरे रही, महिलाओं का बलात्कार हो रहा था और सरकार इसे सामाजिक समस्या समझने के बजाय कानून बनाने में उलझी रही।

आदर्श अपने अस्तित्व को बचाने के लिए खोखले हो चुके थे। निजी स्वार्थों के लिए मूल्यों का बलिदान दिया जा रहा था। धर्निरपेक्ष समूह भी नर्म-सांप्रदायिकता की राजनीति खेल रहे थे जबकि सांप्रदायिकता एक ज्वार की तरह सबकुछ निगलने को आगे बढ़ रही थी। मामूली से फायदों के लिए किए जा रहे समझौतों के चलते धर्मनिरपेक्ष पार्टियां आजादी के बाद की युवा पीढ़ी के लिए कोई आदर्श नहीं बची थीं, क्योंकि इन्होंने सत्ता के लिए अपनी आत्मा का समझौता कर लिया था।

1990 का दशक आजादी के बाद के भारत के लिए सबसे भयंकर वैचारिक संकट वाला दशक रहा। मंडल की राजनीति ने बहुत बूरी तरह झटका दिया। जातीय भेदभाव के खिलाफ सामाजिक न्याय का मुद्दा दरअसल देश के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे में बदल गया। सच्चाई यह है कि जाति व्यवस्था पर आधारित सदियों पुराने भेदभाव से निपटने के लिए किसी के पास कोई हल था भी नहीं। वैसे तो सामाजिक न्याय का वादा तो हमारे संविधान में 1952 में ही लिखा गया था, लेकिन इस पर कभी गंभीरता से विचार नहीं हुआ। और हुआ तो इसने देश के राजैनितक वर्ग को चारों खाने चित कर दिया।

मंडल संकट से दो धाराओं का उदय हुआ। एक तो था मुलायम सिंह, लालू प्रसाद यादव और मायावती उत्तर भारतीय क्षेत्रीय राजनीतिक खिलाड़ियों का राजनीतिक ताकत बनना। इन क्षेत्रीय खिलाड़ियों ने सत्ता और ताकत के लिए सामाजिक न्याय के मुद्दे को एक-जाति-एजेंडे में बदल दिया। यहां तक कि सामाजिक न्याय के भव्य विचार को मंडल के बाद उभरे नीतीश कुमार और राम विलास पासवान जैसे नेताओं ने भी भुनाया और कल तक बीजेपी को मनुवादी करार देते रहने के बावजूद उनके साथ गठजोड़ करने से गुरेज नहीं किया। इस तरह एक और आदर्श की निजी स्वार्थ के लिए बलि दे दी गयी।

मंडल की राजनीति से जो दूसरा विचार उभरा वह था हिंदुत्व का, जिसने जातीय वर्गीकरण और सामाजिक न्याय के विचार को ध्वस्त कर दिया। यह एक खतरनाक विचार था, लेकिन कई मान्यताओं से घिरी हिंदू सामाजिक व्यवस्था को आकर्षित करने में कामयबा रहा। सभी हिन्दुओं को एक वोट बैंक बनाने की खातिर जातीय बंधनों को तोड़ने के लिए एक "अन्य" दुश्मन तैयार किया गया।

संघ परिवार आजादी के पहले से ही ऐसी किसी घटना इंतजार कर रहा था जिसे वह अपने पक्ष में बदल सके। इसलिए, वह मंडल संकट के दौरान अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में कूद पड़ा। और खुद को खतरे में महसूस कर रहे हिंदू जातीय व्यवस्था ने संघ को अपनी पूरी क्षमता और जोर के साथ संघ को समर्थन दिया। आडवाणी की रथ यात्रा के दिनों को याद करिए, उन दिनों पूरा सामाजिक और राजनीतिक माहौल ही भवा हो गया था। पूरे देश में ‘बाबर की संतोंनो मस्जिद खाली करो’ और ‘बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम’ के नारे लग रहे थे।

भाखड़ा नांगल बांध और आईआईटी जैसे आधुनिक मंदिरों के नेहरू के विचार वाला भारत अयोध्या में राम मंदिर के लिए अपनी ऊर्जा खपा रहा था। राम मंदिर विवाद के साथ ही भारत प्राचीन समय की तरफ उलटा लौट पड़ा। हम पीछे आगे बढ़ने के बजाय पीछे लौटने लगे। राम मंदिर आंदोलन ही भारत नाम के विचार पर पहला संगठित और व्यवस्थित हमला था, क्योंकि इस विचार को पहले ही इसके रखवाले कमजोर कर चुके थे। नरसिम्हा राव की कांग्रेस ने भी इसका कोई विरोध या प्रतिरोध नहीं किया। यहां तक कि कमजोर पड़ते जा रहे वामपंथियों ने भी सिर्फ घबराहट में हिंदुत्व का उदय देखा भर, लेकिन उसका कोई विरोध या प्रतिरोध नहीं किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-बीजेपी के गठबंधन के नेतृत्व में उभरती नयी सामाजिक व्यवस्था ने राजनीति को हम (हिंदू) बनाम वे (मुस्लिम) में बदल दिया। हिंदू वोट बैंक के उदय के साथ पहली बार खुद को खतरे में महसूस करते हुए भी धर्मनिरपेक्ष दलों ने कुछ नहीं किया और अपनी विश्वसनीयता भी खोते चले गए। इस तरह भारत ने वैचारिक बदलाव के सामने बिना किसी प्रतिरोध के हथियार डाल दिए।

1990 के दशक की शुरुआत होते होते दक्षिणपंथी झुकाव वाले एक नए भारत का उदय होना शुरु हो गया था। फिर भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने, यूपीए के बैनर के तहत गैर-बीजेपी वोटों को एकजुट करने के लिए धर्मनिरपेक्ष दलों का गठबंधन यूपीए बनाया और राजनीतिक चतुरता के साथ 2004 में दक्षिणपंथी ताकतों के विजय रथ पर लगाम लगा दी। सोनिया गांधी की मनरेगा और दूसरी जन -कल्याणकारी योजनाओं के कारण 2009 में भी यूपीए को एक बार फिर देश चलाने का मौका मिला।

लेकिन यूपीए के भीतर ही 2009 से 2014 के बीच मुक्त बाजार के पैरोकार इस हद तक हावी हो गए कि उन्होंने सोनिया गांधी के ड्रीम प्रोजेक्ट खाद्य सुरा कानून को लागे नहीं होने दिया। आखिरकार जब उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार को 2014 चुनावों के करीब खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने के लिए तैयार किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कुछ खास नहीं हो सकता था। इसके अलावा, मुक्त बाजार वाली अर्थव्यवस्था, चापलूसी वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में बदल चुकी थी जिसकी परिणति घोटालों के रूप में सामने आयी और यूपीए पर से लोगों का विश्वास पूरी तरह खत्म हो गया। इसके साथ ही राजनीतिक परिदृश्य में एक ऐसी वैचारिक जगह खाली हो गयी जिसे कोई भी भर सकता था।

बहरहाल, इस प्रकार का नाटकीय वैचारिक बदलाव अकेले भारत में नहीं हो रहा था। 1990 के दशक के लगभग बाद से वैश्विक सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था और सत्ता संतुलन में बदलाव हो रहा था। दुर्भाग्य से यही वह समय था जब भारत में बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद अपने चरम पर था।

1993 में सोवियत संघ के विघटन ने 19वीं सदी से लेकर 1980 के दशक तक पीढ़ियों का प्रेरणा स्त्रोत रहे साम्यवाद के विचार को ही ध्वस्त कर दिया। सोवियत संघ के पतन से एक प्रमुख वैचारिक ध्रुव नष्ट हो गया। अचानक, भारत सहित पूरी दुनिया साम्यवाद के विचार से विमुख हो गयी। यह एक ऐसा वैचारिक नुकसान था जिसने 19वीं सदी से 20वीं सदी के आखिर तक लगभग पूरी दुनिया को प्रेरित किया था।

इस खाली जगह को वैश्विक स्तर पर नए इंटरनेट आधारित प्रौद्योगिकी के उदय के साथ ग्लोबलाइजेशन के नारे से भरने की कोशिशें शुरु हो गयीं। 21वीं शताब्दी के शुरुआती दिनों में बाजार सबसे बड़ा विचार बन गया और भारत जैसे विकासशील देशों में बड़ा निवेश किया जाने लगा और नतीजे के तौर पर 1991 में मनमोहन सिंह के हाथों शुरु हुए आर्थिक उदारीकरण ने भारत को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बना दिया और ये काम 2014 में उनके प्रधानमंत्रित्व काल के समाप्त होने तक जारी रहा।

लाखों लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गए और स्वतंत्रता संग्राम के वैचारिक आदर्शवाद के बिना ही सूचनाओं के विस्फोट में बड़े बड़े सपने देखने लगे। इन लोगों का मात्र एक ही विचार था, और वह था स्वंय की पहचान और कुछ नहीं। इस पहचान की राजनीति ने एक नए युग को जन्म दिया गया, जहां हिंदुत्व एक स्वाभाविक आकर्षण के तौर पर सामने आया।

यही वह पीढ़ी थी जो खुद को गौ-रक्षक या कांवड़िया कहती है। यह काफी हद तक बेरोजगार और कट्टर भीड़ है, जो बिना किसी दिशा-निर्देश के रातों-रात आकांक्षी बन गयी। यह अपने गांवों और छोटे शहरों से उखाड़ फेंके गये लोग थे जो बदलाव के चक्र में घिरे हुए थे और असुरक्षा की भावना से ग्रसित थे। इन्हें दिशा देने की जरूरत थी और ये विचारशून्यता के इस दौर में एक नेता को तलाश रहे थे।

इसी शून्य के बीच में 2014 में नरेंद्र मोदी का एक नेता के तौर पर आगमन हुआ। अपनी वाकपटुता से उन्होंने नारे देने शुरु किए। पहचान की राजनीति में वह माहिर हैं। वह लोगों को ऐसे सपने बेच सकते हैं: ‘जब विदेशों में जमा कालाधन वापस आएगा तो हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए आ जाएंगे’, ‘जल्द ही बुलेट ट्रेन देश में दौड़ने लगेगी’, ‘स्मार्ट शहरों से भारत दुबई की तरह जगमगाने लगेगा।’ मोदी के इन नारों और सपनों ने युवा मतदाताओं को चकाचौंध कर दिया।

नरेंद्र मोदी ने ऐसे सपने बेचे, जिन्हें पूरा करना शायद संभव ही नहीं, फिर भी उन्होंने चुनाव जीतने के लिए नई तकनीक के साथ धर्मनिरपेक्षता और मिश्रित मुक्त बाजार जैसे कुछ नरम पश्चिमी विचारों के सामने स्वंय की पहचान की राजनीति शुरु की। अपनी जड़ों से दूर, गैर-राजनीतिक और ऊब चुकी भीड़ उनके सपनों के झांसे में आ गयी और उन्हें उस जगह चुन लिया जिसकी जगह पहले से खाली थी।

मोदी इस नई गैर-राजनीतिक पीढ़ी के नायक हैं, जिसका उदारीकरण, समाजवाद या धर्मनिरपेक्षता जैसे औद्योगिक क्रांति के बाद किसी भी विचार पर कोई विश्वास नहीं है। यह पीढ़ी बाजारू अर्थव्यवस्था और स्मार्ट फोन टेक्नालॉजी से चिपकी हुई और उसे सिर्फ अपनी पहचान से मतलब है। हिंदुत्व की पहचान की राजनीति वैश्वीकरण के बाद की उस नयी भारतीय पीढ़ी की विचारधारा है जिसके लिए बाकी राजनेताओं ने सिर्फ समझौते किए और कुछ नहीं।

भारतीय राजनीति सिर्फ वैचारिक शून्या से ग्रस्त नहीं है, बल्कि दूसरी तरफ किसी व्यक्तित्व का कोई आकर्षण ही नहीं बचा है। भारत जैसे अर्ध-सामंती समाजों में लोगों को एक विचार और एक पार्टी की तरफ आकर्षित करने के लिए एक करिश्माई व्यक्तित्व की जरूरत होती है। मोदी ने अपने भक्तों के लिए करिश्मा किया है। वह एक कुशल राजनीतिज्ञ हैं, जो नोटबंदी और जीएसटी जैसे भयावह फैसलों को भी सुनहरे कागज में लपेट कर बेच सकते हैं।

मोदी के अलावा किसी की विश्वसनीयता नहीं !

यही वह शून्यता जिसमें हिंदुत्व फल-फूल रहा है। इसीलिए, एक दिन आपको राष्ट्रपति के पद के लिए एक कोविंद और दूसरे दिन उपराष्ट्रपति के रूप में नायडू को मिलते हैं। ये सभी आरएसएस के लोग हैं। कोई भी आज उस विचार पर गौर नहीं कर रहा जो 1947 की आधी रात को नेहरू के ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ के माध्यम से भारत को एक आधुनिक देश में बदलने के लिए दिया था। इसके बजाय, हम भगवान जाने किस दिशा में बढ़ रहे हैं।

इसीलिए, ये दक्षिणपंथ का दौर है, और ट्रम्प और एरडोगंस की दुनिया है जिसमें मोदी भी फिट बैठते हैं और उनका आरएसएस भी।

(लेखक कौमी आवाज के चीफ एडिटर हैं )

Published: 15 Aug 2017, 1:16 PM
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