बजट 2020: बेरोजगारी, महंगाई, आर्थिक संकट से उबरने का कोई रोडमैप नहीं, आशंका में डूबे शेयर बाजार में खूनखराबा

इस बार के बजट से उम्मीद थी कि बेरोजगारी, बढ़ती महंगाई, आर्थिक संकट, किसानों की दुर्दशा और विकास दर बढ़ाने के उपाय बताने वाले तरीके सामने रखेगी मोदी सरकार। लेकिन इन सभी मोर्चों पर बजट ने निराश किया, नतीजतन शेयर बाजार औंधे मुंह गिरा और निवेशकों के लाखों करोड़ स्वाह हो गए।

फोटो : सोशल मीडिया
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राहुल पांडे

निर्मला सीतारमण के बजट से बाजार में खूनखराबा हो गया। सेंसेक्स करीब 1000 अंक लुढ़क गया। यानी बाजार इस बजट से बुरी तरह निराश हुआ है। बाजार का रुख बता रहा है कि इस बजट के बाद अर्थव्यवस्था का संकट और गहराने वाला है।

मोटे तौर पर देखें तो बजट में सिर्फ वित्तीय जुमलेबाजी की गई है, जिसका अर्थ निकालें तो यही दिखेगाकि घर का खर्च चलाने के लिए सरकार करीब 2.1 लाख करोड़ का घर का सामान बेचेगी। वित्तीय घाटे का लक्ष्य बुरी तरह छूटा है और सरकार इसे काबू करने में पूरी तरह नाकाम रही है। यानी देश एक गंभीर संकट में फंसने वाला है।

यूं भी बजट में देश की मुख्य समस्याओं पर कुछ नहीं कहा गया। बेरोजगारी दूर करने का कोई रास्ता इस बजट से निकलता नहीं दिखा, घटती मांग और बढ़ती कीमते काबू करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं है। सरकार डिनायल मोड में दिखी और सिर्फ आने वाले दिनों में कुछ अच्छा होने की उम्मीद लगाए हुए है। लेकिन क्या सरकार कोई ठोस वित्तीय नीति पेश कर पाई।

इनकम टैक्स की दरों में फेरबदल से सुर्खीयां तो बन जाएंगी, लेकिन इस बजट से निकलने वाले मायने गहरे तक जा कर समझने होंगे। इनकम टैक्स की दरों में बदलाव शर्तों के साथ किए गए हैं। आप नए टैक्स स्लैब से खुश हों, लेकिन पहले अपनी नौकरी सुरक्षित करने के बारे में सोचिए। आने वाले दिनों में बजट के पिटारे से निकली विस्तृत जानकारियां तय करेंगी की हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं।

बजट के बाद भविष्य को लेकर गंभीर चिंता नजर आती है क्योंकि इसके बाद रेटिंग एजेंसियां हमारी रेटिंग और कम कर सकती हैं क्योंकि सरकार वित्तीय सुधारों के लिए कोई रोडमैप नहीं पेश कर पाई है। इससे भी बुरी बात यह है कि सरकार ने ऐसा कुछ संकेत नहीं दिया कि नौकरियां नहीं जाएंगी और नई नौकरियां पैदा होंगी।

सरकार ने 2019-20 में जो वित्तीय अव्यवस्था खड़ी की है, इस बजट के बाद उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती है, क्योंकि सरकार ने वित्तीय घाटे का लक्ष्य 3.5 फीसदी रखा है जो कि पिछले लक्ष्य से 0.2 फीसदी अधिक है। इसके अलावा राजस्व और खर्च यानी कमाई और खर्च के बीच का फासला भी 8 लाख करोड़ के बीच रहने का अनुमान है, जिसके चलते सरकार को अगले वित्त वर्ष के सीमाप्ति के आसपास विभिन्न योजनाओं पर खर्च में भारी कटौती करनी पड़ेगी। यह बिल्कुल उसी तरह होगा जैसा कि इस समय हम मौजूदा वित्त वर्ष में देख रहे हैं।

यहां सवाल आता है कि आखिर सरकार अपने ही बजट पर क्रियान्वयन के लिए पैसा कहां से लाएगा और इसे सरकारी कंपनियों आदि को बेचकर यानी विनिवेश से कितना पैसा हासिल होगा? सरकार का मौजूदा विनिवेश का लक्ष्य इस बार बढ़कर दोगुना होने की संभावना है। 2019-20 के लिए सरकार ने करीब 1.05 लाख करोड़ का लक्ष्य रखा था, लेकिन उसके हाथ में 20,000 करोड़ भी बमुश्किल आ पाए। मौजूदा वित्त वर्ष खत्म होने में सिर्फ दो महीने बचे हैं, ऐसे में उसे 3.8 फीसदी का वित्तीय घाटा बनाए रखने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

इस सबसे हमारे सामने गंभीर संकट आना तय है और रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने तो संकेत दे ही दिए हैं कि सरकार की राजस्व आमदनी लक्ष्य से इतनी कम है कि वह इसे हासिल नहीं कर पाएगी। इसका अर्थ है कि देश पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा।

बजट से क्या बना, क्या बिगड़ा अब सोमवार को और स्पष्ट होगा जब बाजार खुलेगा, लेकिन आज जो कुछ हुआ उससे साफ है कि मोदी सरकार ने अपने बजट से देश को निराश किया है।

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