जब बजट में किया ही नहीं अल्पसंख्यकों के लिए कोई नया प्रावधान, तो कैसे जीतेगी मोदी सरकार ‘सबका विश्वास’

मोदी सरकार ने दोबारा सत्ता में आने पर ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का नारा देकर दावा किया था कि सरकार अल्पसंख्यकों को शिक्षित कर उनका विश्वास जीतना चाहती है। लेकिन आज पेश बजट में अल्पसंख्यकों की शिक्षा से जुड़ी सभी योजनाओं का बजट घटा दिया गया है।

फोटोः सोशल मीडिया
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अफरोज आलम साहिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीतते ही बड़े जोर-शोर से ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ का नारा दिया था। मोदी सरकार का यह दावा था कि अल्पसंख्यक तबके की तमाम जरूरतों को वो न सिर्फ पूरा करेगी, बल्कि अल्पसंख्यकों का उत्थान कर उन्हें भी ‘मेनस्ट्रीम’ के साथ लाकर खड़ा कर देगी। इसके लिए अगले पांच साल में पांच करोड़ अल्पसंख्यक छात्रों को स्कॉलरशिप देने का भी ऐलान किया। मगर शुक्रवार को पेश इस सरकार का पहला ‘बजट’ अल्पसंख्यकों के शिक्षा और उत्थान से सरकार की कितनी हमदर्दी है, इसकी पोल खोलता नजर आ रहा है।

यहां यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि इसस पहले फरवरी में पेश किए गए अंतरिम बजट में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का कुल बजट 4700 करोड़ प्रस्तावित किया गया था। और अब आज के बजट में भी इस मंत्रालय का बजट 4700 करोड़ ही है। यानी इस बजट में अल्पसंख्यकों के लिए कुछ भी नया नहीं है।

लेकिन जब हम इस बजट का आंकलन करते हैं, तो पता चलता है कि सरकार अल्पसंख्यकों की शिक्षा के लिए कितनी फिक्रमंद है। जहां एक तरफ मीडिया में ये बयानबाजी की जा रही थी कि सरकार अल्पसंख्यकों को शिक्षित कर उनका विश्वास जीतना चाहती है, वहीं शिक्षा से जुड़ी कुछ योजनाओं का बजट फरवरी, 2019 में पेश ‘चुनावी बजट’ से भी कम कर दिया गया है।

गरीब अल्पसंख्यक छात्रों के लिए सरकार की सबसे महत्वपूर्ण योजना पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप का बजट भी इस बार कम होता नजर आ रहा है। फरवरी में पेश किए गए बजट में इसके लिए 530 करोड़ रूपये प्रस्तावित था, लेकिन अब जुलाई में इसके लिए 496.01 करोड़ रूपये रखा गया है।

व्यावसायिक और तकनीकी पाठ्यक्रमों- स्नातक और स्नातकोत्तर कोर्सेज के लिए योग्यता सह साधन छात्रवृत्ति योजना यानी ‘मेरिट कम मिन्स स्कॉलरशिप’ के लिए फरवरी के चुनावी बजट में 506 करोड़ रूपये का प्रावधान था, लेकिन अब जुलाई में इस योजना के लिए 366.43 करोड़ रुपये का ही प्रस्ताव रखा गया है।

प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप का प्रस्तावित बजट इस बार कम होता नजर आ रहा है। पिछले वित्तीय साल यानी 2018-19 में इस स्कीम के लिए 1269 करोड़ का बजट रखा गया था। लेकिन इस साल इसके लिए प्रस्तावित बजट को घटाकर 1220 करोड़ कर दिया गया है। बताते चलें कि ये स्कॉलरशिप अल्पसंख्यक कल्याण की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण योजना है, ताकि गरीब अल्पसंख्यक अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें।

मोदी सरकार के इस बजट में सिविल सेवा एवं अन्य प्रतियोगी परिक्षाओं में बैठने वाले छात्रों की मदद के लिए शुरू की गई योजना ‘Free Coaching and allied schemes for Minorities’ का भी बजट फरवरी वाले बजट से कम नजर आ रहा है। फरवरी में इसके लिए 125 करोड़ रूपये प्रस्तावित था, लेकिन अब ये रकम 75 करोड़ रूपये हो गई है।

विदेशों में अध्ययन के लिए शिक्षा ऋण पर ब्याज सब्सिडी (Interest Subsidy on Educational Loans for Overseas Studies) के लिए साल 2018-19 में पहले 45 करोड़ का प्रस्तावित बजट था, लेकिन इसे अब घटाकर 30 करोड़ कर दिया गया है।

अल्पसंख्यक महिलाओं के उत्थान के लिए तीन तलाक पर बिल लाने वाली सरकार अल्पसंख्यक महिलाओं के उत्थान के लिए सच में कितना सजग है, इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि अल्पसंख्यक महिलाओं में लीडरशीप डेवलपमेंट को लेकर सरकार द्वारा अल्पसंख्यक महिला नेतृ्त्व विकास स्कीम (Scheme for Leadership Development of Minority Women) का बजट जहां फरवरी में 21 करोड़ रूपये प्रस्तावित था, वहीं इस ताजा बजट में ये सिर्फ 15 करोड़ रूपये है।

नेशनल माइनॉरिटी डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कारपोरेशन का बजट भी इस वित्तीय साल में कम कर दिया गया है। पिछले वित्तीय साल यानी 2018-19 में इसके लिए 165 करोड़ का बजट था, लेकिन इस साल इसके लिए प्रस्तावित बजट सिर्फ 100 करोड़ रुपये रखा गया है।

अल्पसंख्यकों की बाकी स्कीमों का चाहे जो हश्र हो, लेकिन सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए चलाई जा रही योजनाओं की पब्लीसिटी का न सिर्फ हमेशा ध्यान रखा है, बल्कि इसके लिए साल दर साल अपने बजट में इजाफा भी किया है। इस साल भी यही होता नजर आ रहा है। साल 2018-19 में इसके लिए 55 करोड़ का बजट था, लेकिन अब इसके लिए प्रस्तावित बजट 60 करोड़ रुपये रखा गया है।

गौरतलब रहे कि इस आम बजट में देश के करीब 20 फीसद अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए जो राशि आवंटित की गई है, वो कुल बजट का तकरीबन 0.2 फीसद ही है। अब आप खुद ही सोच लीजिए कि मोदी सरकार का ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा कितना खोखला है।

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