‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और प्रगतिशील लेखनः जोखिम के बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं

बीते दिनों जिस तरह नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी और गौरी लंकेश जैसे बौद्धिकों की हत्याएं हुईं, उसकी अनुगूंज जयपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के 17वें सम्मेलन में होना तय था। भारत में तर्क, ज्ञान, वैज्ञानिक चिंतन पर पहली बार ऐसा कड़ा पहरा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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वीरेंद्र यादव

लगभग आठ दशक पूर्व जब 1936 में प्रेमचंद की अध्यक्षता में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई थी, तब भारतीय लेखकों के समक्ष ब्रिटिश गुलामी और वर्णाश्रम जातिवाद से पोषित देशज शोषण व्यवस्था से मुक्ति की दोहरी चुनौती थी। प्रेमचंद ने तब अपने उद्द्बोधन में साहित्य को राजनीति का ‘एडवांस गार्ड’ बताते हुए ‘सौंदर्य की कसौटी’ बदलने का आह्वान किया था। अभी 13-15 सितंबर तक जब प्रगतिशील लेखक संघ के 17वें राष्ट्रीय सम्मेलन के बहाने देश के छब्बीस राज्यों और लगभग सभी भारतीय भाषाओं के लगभग पांच सौ से अधिक लेखकों का जुटान जयपुर में हुआ, तो साहित्य की कसौटी तो बदल चुकी थी, लेकिन उसे देश की बदलती परिस्थितियों में राजनीति का ‘एडवांस गार्ड’ बनना शेष था।

इस बार चुनौती राजनीतिक जनतंत्र, संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बहुलवादी संस्कृति को बचाने की थी। विगत कुछ वर्षों में जिस तरह नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे, एम एम कलबुर्गी और गौरी लंकेश सरीखे बौद्धिकों की हत्याएं वैचारिक अभिव्यक्ति के कारण हुईं, उसकी अनुगूंज सम्मेलन में होना स्वाभाविक ही था। स्वाधीन भारत में यह पहली बार है जब तर्क, ज्ञान, वैज्ञानिक चिंतन और बहुलवाद की संस्कृति पर कड़ा पहरा है। लेखकों का साहित्य पर पहरे की राजनीति को लेकर उद्वेलित होना स्वभाविक ही था। पेरूमल मुरुगन, कांचा इलैया, हांसदा सोवेंद्र शेखर, आनंद तेलतुम्बडे की घेरेबंदी और उनकी पुस्तकों को लेकर सड़क से लेकर शीर्ष अदालतों तक की जाने वाली पेशबंदी से जुड़े सवालों का उठना भी सम्मेलन में वांछित ही था।

देश के जाने-माने भाषाविद और प्रख्यात बुद्धिजीवी गणेश एन देवी ने इसकी अभिव्यक्ति करते हुए अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि “शब्द तभी जीवित रह सकते हैं जब समाज की धड़कन से उनका सीधा रिश्ता हो। इसलिए जरूरी है कि लेखक और बुद्धिजीवी मिथ्या चेतना और अर्धसत्य का पर्दाफाश करने में सार्वजनिक बुद्धिजीवी की भूमिका अपनाकर व्यापक जन एकता भी सुनिश्चित करें।”

संभवतः यह पहली बार था किकश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात और दक्षिण भारत से लेकर असम, मिजोरम तथा अरुणाचल तकसे आए लेखकअपनी भाषा, संस्कृतिऔर अभिव्यक्तिपर एकरूपीकरण का खतरा महसूसकर रहे थे। प्रगतिशील लेखकसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और तमिल लेखकपुन्नीलन ने तो वर्तमान राजनीतिकदौर को मनुवाद की वापसी करार देते हुए ‘हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान’ के अभियान को शिकस्तदेने को लेखकों की पहली प्राथमिकता करार दिया।

ध्यान देने की बात यह है कि इस सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में जो विषय निर्धारित किए गए थे, वे साहित्य से जुड़ी आंतरिक समस्याओं या लेखकीय परिसर तक सीमित न होकर देश और समाज के व्यापक मुद्दों से रूबरू थे। सम्मेलन में चर्चा के निर्धारित विषयों में थेः ‘हिंसात्मक समय में लेखक होना’, ‘वंचित अस्मिताएं और सामूहिक संघर्ष’, ‘आजाद कलम के दायरे’, ‘फासिज्म, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक प्रतिरोध’ और ‘भारतीय भाषाओं में प्रगतिशील साहित्य।’

प्रभात पटनायक, प्रांजय गुहा ठाकुरता, मणींद्र नाथ ठाकुर, अनिल सदगोपाल, रामशरण जोशी, ओम थानवी, एसपी शुक्ला आदि सरीखे जाने-माने बौद्धिकों ने सम्मेलन के विषयों को जो बौद्धिक विस्तार प्रदान किया, वह लेखकों के वृहत्तर सरोकारों और जनतांत्रिकता का तकाजा था। भारत की लगभग सभी प्रमुख भाषाओं के प्रगतिशील लेखकों के इस समागम में जो एक बात शिद्दत से उभरकर आई, वह यह कि विविधता भरे इस देश में एक भाषा, एक संस्कृति और समरूपता का कोई भी प्रयत्न देश को जोड़ने वाला न होकर तोड़ने वाला ही है।

जब तमिल लेखकअंग्रेजी बोलता है तो उसमें भी यदि भाषा के स्थानीय पुट को नजरंदाज किया जाए तो ‘मनुवाद’ को ‘मानववाद’ समझने की भूल की जा सकती है। जैसा कि तमिल लेखक पुन्नीलन को सुनते हुए मुझे स्वयं महसूस हुआ। स्वीकार किया जाना चाहिए कि अकेली हिंदी के माध्यम से समूचे हिंदुस्तान से संवाद नहीं किया जा सकता। अंग्रेजी अभी भी एक सीमा तक अखिल भारतीय भाषायी सेतु की भूमिका निभा रही है। यद्यपि यह देखकर अच्छा लगा कि अरुणाचल प्रदेश की युवा लेखिका जमुना बिनी सरीखे कुछ अन्य भाषा-भाषी लेखक बेहतरीन हिंदी में भी अपनी बात कह सकने में समर्थ थे।

यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि हिंदी की तुलना में गैर हिंदी भाषाओं के लेखकों के बीच आज के हिंसात्मक समय की अनुगूंज अधिक है। जहां कश्मीरी लेखक खालिद चौधरी कश्मीर पर आयद बंदिशों और वहां के लोगों को समूचे देश से अलग-थलग किए जाने को लेकर व्यथित और चिंतित थे, वहीं तेलंगाना के लेखक पुस्तकों के प्रकाशन और आयोजनों पर बढ़ते प्रतिबंध पर उद्वेलित थे। सम्मेलन में शामिल लेखक अपनी-अपनी भाषा और इलाकाई स्थितियों को लेकर जिस तरह व्यग्र और आक्रोशित थे, उससे ‘अवार्ड वापसी’ के तीन वर्ष पूर्व के उस दौर की याद आ गई जब क्षेत्र और भाषा की सीमा तोड़कर समस्त भाषाओं के लेखक एकजुट हुए थे।

यहां यह तथ्य भी लक्ष्य करने वाला है कि हिंदी की अपेक्षा अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों के बीच यदि वर्तमान हालात को लेकर अधिक उद्वेलन और बेचैनी है, तो संभवतः इसका कारण उनका अपने समाज और संस्कृति से गहरी संलग्नता है जिसके चलते कुलीन सत्ता के उत्पीड़न और बंदिशों से सीधे उनका साक्षात है। स्वीकार किया जाना चाहिए कि तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि भाषाओं के वर्तमान दौर के साहित्य में सामाजिक अंतर्विरोध जिस गहराई के साथ उजागर हुए हैं, उस रूप में हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के लेखकों में नहीं। इस दौर के हिंदी लेखन में सांप्रदायिकता विरोध की चिंता तो भरपूर है, लेकिन सांप्रदायिकता के पार जाकर वर्ण और जाति के अंतर्विरोध तथा धर्म की आलोचना उस रूप में नहीं उजागर हुआ जैसी प्रगतिशील लेखन आंदोलन की पूर्व परंपरा रही है।

शायद यही कारण था कि सम्मेलन में आत्मालोचना और आत्मावलोकन करते हुए वर्ण और जाति से मुक्त होकर प्रेमचंद की परंपरा को अपनाने पर लेखकों द्वारा विशेष बल दिया गया। हिंदी के प्रगतिशील लेखकों के समक्ष आज के दौर की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वे हिंदी साहित्य और समाज की मुख्यधारा के मध्यवर्गीय सरोकारों को अपनाते हुए उसमें समाहित होते रहें या सामाजिक अंतर्विरोधों और फांक को भी अपनी रचनात्मकता का विषय बनाएं।

सचमुच यह जोखिम भरा क्षेत्र है, जिससे गैर हिंदी भाषी लेखक भरपूर रूबरू हैं। यह अनायास नहीं है कि इस समूचे दौर में जिन बौद्धिकों की हत्याएं हुईं, जिन्हें प्रताड़ित किया गया और जिन पुस्तकों के विरुद्ध प्रतिबंध का अभियान चलाया गया, वे सभी गैर हिंदी भाषी लेखक-बौद्धिक और उनकी पुस्तकें थीं। सम्मेलन में यह तथ्य शिद्दत के साथ रेखांकित हुआ कि अभिव्यक्ति के जोखिम के बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं है।

कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35 ए को निष्प्रभावी किए जाने और गैरकानूनी गतिविधियों पर रोक लगाने संबंधी कानून पर भी सम्मेलन के मंच पर तीखी चर्चा रही और इसके विरोध में विस्तृत प्रस्ताव भी पारित किए गए। 'अर्बन नक्सल' के नाम पर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बौद्धिकों की गिरफ्तारी भी लेखकों की चिंता का विषय बने। आनंद पटवर्धन ने अपनी फिल्म ‘विवेक’ (रीजन) का प्रदर्शन कर सम्मेलन की इन चिंताओं को विस्तार दिया।

प्रगतिशील लेखक संघ के इस सम्मेलन में एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि अब संगठन का नेतृत्व पूरी तरह गैर हिंदी लेखकों के हाथों में है। तमिल लेखक पुन्नीलन जहां पहले से ही इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, वहीं पंजाबी के जाने-माने लेखक सुखदेव सिंह सिरसा संगठन के नए महासचिव बनाए गए। देखना है कि फासीवाद की वर्तमान चुनौतियों के संदर्भ में प्रगतिशील लेखक संघ प्रेमचंद के इस कथन को कितना सार्थक कर सकेगा कि ‘साहित्य देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।’

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