फूड कथा-3: आसव कहें या अरक, हैं तो डिस्टिल्ड दारू ही

पेश है फूड कथा की तीसरी कड़ी। हमने अन्न, फल, आसव आदि का इतिहास, पुराणों में अन्न और फलों का वर्णन और अन्न आदि को लेकर आज के शासक वर्ग की सियासत पर हमने फूड कथा नाम से श्रंखला शुरु की है। इसे लिख रही हैं वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे। आज चर्चा आसव या अरक पर

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मृणाल पाण्डे

‘अरक’, दक्षिण पूर्व एशिया, भारत और श्रीलंका में बनाए जाने वाले मादक डिस्टिल्ड पेय को कहते हैं। यह अरबी शब्द है जिसका अर्थ है खजूर के पेड़ के रस से बना मादक पेय। भारत में डिस्टिल्ड शराब का देशी नाम ‘आसव’ है। इसका मूल शब्द ‘सवन्’ है जिसका अर्थ है सराबोर होना, छलक कर गिरना। ‘उत्सव’ का भी मूल शब्द यही है, जिसका मतलब है हर्ष-उल्लास का छलकना! लैंसेट में प्रकाशित लेख के मुताबिक, भारत में खपत होने वाली कुल शराब में लगभग दो तिहाई देसी दारू है। बाजार में 24.2 करोड़ कार्टन शराब की खपत होती है और इसमें हर साल करीब 7 फीसदी का इजाफा हो जाता है। बॉलीवुड फिल्मों ने भारतीयों के देसी दारू के प्रति झुकाव को अच्छी तरह भुनाया है। जॉनी वॉकर और केश्टो मुखर्जी-जैसे हास्य कलाकारों ने मोहल्ला-छाप शराबियों के किरदार को पर्दे पर साकार किया।

प्राचीन समय में तरह-तरह के आसव या सुरा बनाए जाते थे और इसमें सालों-साल का समय लगता था। संपन्न लोग चीनी, फूलों और फलों से बनाई शराब का आनंद उठाते थे जबकि आम आदमी खजूर या नारियल की देसी शराब पीकर संतुष्ट हो जाते थे। आसव या सुरा शब्द में पहले लगने वाले उपसर्ग से शराब के स्रोत का पता चलता था। जैसे- पुष्प (फूल), शर्करा (चीनी), माधविका (महुआ फूल), सुरा (अनाज), नारिकेला (नारियल) वगैरह। कुछ तो आज भी महिलाओं और बच्चों की टॉनिक के रूप में बेची जा रही हैं। कुमारी आसव या मृत संजीवनी सुरा को चिकित्सीय तौर पर फायदेमंद बताया जाता है। इन सबमें अल्कोहल की मात्रा काफी ज्यादा होती है। इसकी प्राचीनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के शहरों में भी डिस्टिलरियों के अवशेष मिले हैं।

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उत्तर-वैदिक साहित्य में अन्न को खमीर करके बनने वाले ‘किलाला’ नामक पेय का उल्लेख मिलता है। कुछ खास तरह के फूलों और घासों से भी पेय बनाए जाते थे। रामायण में चार तरह के मादक पेयों का उल्लेख है, कौटिल्य ने एक दर्जन और चरक ने ऐसे 84 पेय पदार्थों का उल्लेख किया है! चूंकि सोम (इसी नाम की लता से निकालकर इसे डिस्टिल कर बनाए गए पेय) जैसे आसव का पान करना अनुष्ठानों और त्योहारों का हिस्सा था, समय के साथ इस तरह के और भी पेयों का आविष्कार किया गया। ऐसे मादक पेय को तैयार करने में ताड़ की चीनी, गुड़ से लेकर अंगूर, आम, खजूर, बेर-जैसे फल और महुआ, कदम्ब-जैसे फूलों का इस्तेमाल किया जाता। एक किस्म की शराब शहद से भी बनाई जाती थी जिसमें तेज नशे के लिए धातकी (धतूरे) के फूलों का अर्क मिलाया जाता था। ज्यादातर क्षत्रिय राजघरानों में ‘मैरेय’ नाम के पेय का बड़ा प्रचलन रहा था। क्षत्रिय राजाओं को अनाज से बने मादक पेय के सेवन की अनुमति नहीं थी, इसलिए फल, चीनी और फूलों से मैरेय बनाया जाता था।

जैसा कि स्पष्ट है कि ‘अरक’ शब्द अरबी से आया है, नए तरह के पेय बनाने के लिए भारतीय मादक पेय वगैरह बनाने के लिए इनका आयात करते थे। भारतीय मिट्टी के बड़े-बड़े भांडों में रोम से भी शराब मंगाते थे। ऐसे ही बर्तन के टुकड़े केरल में पाए गए हैं। लाल और सफेद अंगूर से बनी दो तरह की शराब- कपिस्यानी और हरिहुरका- अफगानिस्तान से मंगाई जाती थी। कश्मीर और उत्तर पूर्व की पहाड़ियों में रहने वाली जनजातियां भी सातवीं सदी में ही चावल को खमीर करके अलग तरह का मादक पेय तैयार करने लगी थीं।


अरक पश्चिमी दुनिया में बनने वाली ज्यादातर स्पिरिट से भी पुराना है। यह विभिन्न प्रकार के अनाज या नारियल के फूलों के खमीर किए गए रस या फिर ताड़ या गन्ने के रस से बनाया जाता है। सबसे पहले चीनी, खांड, पानी और लाल चावल से अरक बनाए जाते थे। भारत में इसका उत्पादन ईसा पूर्व आठवीं शताब्दी के आसपास ताड़ और गुड़ से किया जाता था। जहां तक विदेशियों की बात है तो बाहरी व्यापारियों और औपनिवेशिक आकाओं को भी इस तरह भारत में बने अरक का स्वाद अच्छा लगता था लेकिन सबसे पहले तो इसका सेवन बाहरी नाविकों ने किया। जैसे ही गन्ने से परिष्कृत चीनी का बनना शुरू हुआ, इसकी कई किस्में विकसित हो गईं।

डच बटाविया का अरक देखने में साफ होता है और इसका स्वाद रम की तरह होता है। नियमित सेवन करने वालों में श्रीलंकाई अरक खासा पसंद किया जाता है। इसका स्वाद बेहतरीन रम-जैसा होता है और इसमें फूलों की भीनी-भीनी खुशबू होती है। 16वीं शताब्दी के पुर्तगाली यात्री पेड्रो टेक्सेरा ने लिखा है कि भारतीय अरक खासा कड़वा होता था और पुराना होने के साथ और थोड़ी किशमिश डालने से यह मीठा होता जाता था। उन्होंने लिखा है कि सर थॉमस रो जब सम्राट जहांगीर से मिलने गए तो उन्हें अन्य विशिष्ट मेहमानों की तरह ही शाही अरक का प्याला पेश किया गया था। टेक्सरा लिखते हैं कि शीशे के मर्तबानों में रखे अन्य शराबों की तुलना में यह कहीं अधिक पारदर्शी और सुगंधित था। वह इतना तेज था कि उसे पीते ही थॉमस रो को छींक आ गई। लेकिन थॉमस रो के साथ गए पादरी ने उन्हें समझाया कि अगर थोड़ी मात्रा में इसका सेवन किया जाए तो यह बड़ा ही स्वास्थ्यवर्द्धक पेय है।

क्या आप जानते हैं कि अंग्रेजी का शब्द ‘पंच’ भारतीय है? पंच फलों के रस, छिलके और लौंग, दालचीनी-जैसे साबुत मसालों के साथ मिश्रित मादक पेय का कटोरा होता है जिसे खास उत्सवों पर छककर पीया जाता था। यह ‘पंच’ या पांच तत्वों (अरक, चीनी, मसाले, नींबू का रस और पानी) को मिलाकर बनता है। ताड़ी भी पूरे भारत में बड़े पैमाने पर तैयार की जाती थी और तटीय क्षेत्रों में तो खास तौर पर यह आज भी बहुत ही लोकप्रिय पेय है। 1870-90 में अकेले बंगाल में अरक बेचने वाली 8,000 तो ताड़ी बेचने वाली 30,000 दुकानें थीं। लगभग हर गांव में इसे बनाया जा रहा था। धूर्त अंग्रेजों ने आज की जीएसटी की तरह ही उस समय किसी भी दुकान से बेची जाने वाली शराब पर टैक्स लगा दिया था।

अंग्रेजों ने अपनी पहली डिस्टिलरी 1805 में कानपुर के पास रोजा में खोली। 1901 तक 14 रजिस्टर्ड डिस्टिलर थे और आजादी के समय तक इनकी संख्या 40 हो गई थी।

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