कहवा खाना

गालियों और गाली गीतों के बीच है बहुत बड़ा फर्क

‘गाली गीत’ शादी-विवाह के समय गाए जाते हैं। उस समय समधी, दूल्हे के बड़े भाई यानी जेठ के साथ-साथ सभी रिश्तेदारों, बारातियों को ‘गाली गीत’ से नवाजा जाता है। यहां तक कि शादी की रस्मों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले पंडित और नाई को भी नहीं बख्शा जाता।

फोटोः सोशल मीडिया

विभा रानी

जी हां, परंपरा और रीति रिवाज किसी भी रूप में आपके सामने हो, वे आपके मन को हरसाते हैं और आपको जीवन के तत्वों से जोड़ कर रखते हैं । मिथिला में शादी-विवाह के अवसर पर या किसी भी पारिवारिक अनुष्ठान पर, जब दूर-दूर से सभी नाते-रिश्तेदार जुटते हैं, तब एक सहज और खुशी का माहौल बनता है। इस माहौल में गीत-नाद गाने, एक दूसरे को छेड़ने की रिवायत रही है। यही रिवायत गीतों में ढली और उसे ‘गाली गीत’ के नाम से जाना जाने लगा । मिथिला में इस ‘गाली गीत’ को डहकन कहते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि डहकन का मतलब होता होगा कि गाते हुए जहां आपका मन खिल जाए और गीत की मधुरता तरलता में आप बह जाएं ।

मिथिला में डहकन की शुरुआत राम-सीता के विवाह से मानी जा सकती है, क्योंकि मिथिला के लिए सबसे बड़ी दुल्हन ‘सीता’ हैं और सबसे बड़े दूल्हा ‘राम’। कहा जाता है कि ‘राम’ जब शादी करने के लिए मिथिला आए तो मिथिला की स्त्रियां उनके साथ छेड़छाड़ करते हुए गाती हैं,

"सुनु सखी एक अनुपम घटना
अजगुत लागत भारी हे
खीर खाए बालक जन्माओल
अवधपुर के नारी हे।”

डहकन गाने के पीछे बहुत सारी मान्यताएं हैं। सबसे पहले तो यह आपके पारिवारिक उत्सवों को सरलता और तरलता देती है। दूसरा, घर के जितने भी नाते-रिश्तेदार हैं, वे सब किसी न किसी के ननद, देवर, भाभी, साली, सलहज, जीजा आदि होते हैं। मिथिला में इन सबके साथ छेड़छाड़ करने का रिवाज है। ऐसे खुशी के मौके पर सभी एक दूसरे के साथ चुहल करते पाए जाते हैं। इसी चुहल को गीत का रूप दे कर गाने से इसका आनंद दोगुना हो जाता है।

डहकन गाने के पीछे एक और मान्यता है। अरेंज मैरिज में दूल्हा और दुल्हन ही केवल अनजान नहीं होते बल्कि दोनों के दोनों परिवार भी एक-दूसरे से उतने ही अनजान होते हैं। गाली गीत इन दोनों के बीच की अजनबीयत को तोड़ने का काम करता है। अब इस गीत में देखिये लोग समधी को किस तरह गाली देते हैं,

“इहे मोरे समधी के बड़े-बड़े हाथ रे
ओही हाथे छुअलन मरबा हमर रे
मारु, हाथ काटू उनका, यहां से भगाऊ रे।”

आमतौर पर ये ‘गाली गीत’ शादी-विवाह के समय गाए जाते हैं। उस समय समधी, दूल्हे के बड़े भाई यानी जेठ (भैंसुर ) के साथ-साथ सभी रिश्तेदारों, बारातियों को ‘गाली गीत’ से नवाजा जाता है। यहां तक कि शादी की रस्मों में प्रमुख भूमिका निभाने वाले पंडित और नाई को भी नहीं बख्शा जाता।

दरअसल शादी एक सामाजिक अनुष्ठान है और समाज का हर वर्ग इसमें अपनी भागीदारी निभाता है । इसलिए धोबी, कुम्हार के लिए भी ‘गाली गीत’ गाए जाते हैं। तारीफ की बात तो यह है कि अगर ये गीत न गाए जाएं तो बाराती, रिश्तेदार और समाज का हर वर्ग नाखुश होता है और जब उन्हें गाली गीत से नवाजा जाता है तो वह खुश होते हैं। खाना खाने के समय गाया जाने वाला गीत -

"चटनी पूरी, चटनी पूरी, चटनी है आमचुर की
खाने वाला समधी मेरा सूरत है लंगूर की
दाएं हाथ से भात खाए, बाएं हाथ से दाल रे
मुंह लगाकर चटनी चाटे, कुकुर जैसी चाल रे।”

तारीफ तो यह है कि ऐसे मौके पर अगर आपने गाली नाम लेकर नहीं दी तो चाचा जी, मामा जी, फूफा जी, दोस्त नाराज होकर मंडप छोड़कर भाग जाते हैं। कई बार संबंध टूट जाते हैं। अब आप ही बताएं कि लोग गाली ना सुनने के लिए नाराज होते हैं या सुनने के लिए। दूल्हे को भी गाली दी जाती है। जैसे ही दूल्हा शादी करने के लिए आता है, दूल्हे और दुल्हन दोनों से एक ही सवाल पूछा जाता है कि अपने माता-पिता का नाम बताओ। दुल्हन की तरफ से जवाब दिया जाता है कि मेरे पिता पंडित हैं और माता गौरी हैं । लेकिन यही सवाल दूल्हे से पूछने पर उनकी तरफ से जवाब में स्त्रियां गाती हैं,

कहु बाबा के नाम कोहबर
कहु अम्मा के नाम कोहबर
बाबा त हमर लोफर बाबा हो
अम्मा जंगली छिनाल कोहबर

‘गाली गीत’ मुख्य रूप से स्त्रियों द्वारा ही गाए जाते हैं। यह उनकी ऐंद्रिकता यानी यौनिकता को भी अभिव्यक्त करने का माध्यम है। स्त्रियां घर के भीतर रखी जाती रही हैं। उन्हें बाहर निकलने या लोगों, खास तौर से पुरुषों से बात करने की इजाजत नहीं होती। ऐसे में वे अपनी ऐन्द्रिकता को दबाकर रखने पर विवश होती हैं। ‘गाली गीत’ उनकी एंद्रिकता को बाहर निकालने में मनोवैज्ञानिक भूमिका निभाता है ।

आमतौर पर शादी के बाद पति बाहर कमाने चले जाते हैं। घर में सास और ननद के बीच बहू अकेली रहती है। पति से अलगाव और सास-ननदों के बीच निरंतर रहने से संवादहीनता कम होती है, कटुता बढ़ती जाती है, लेकिन रहना वहीं है। इसलिए अपने पति के न होने का गम और साथ-साथ सास और ननद की ज्यादतियों का भी जवाब वे इन्हीं गीतों के माध्यम से देती हैं,

"हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो

बहू सासु के ले जा दहाय
हमर मन कटहल पर ।"

अब जरा सोचिए, बहू, सास को यह कहे कि तुम मुझे कटहल की सब्जी खाने नहीं दे रही हो, इसलिए गंगा मैया तुम्हें बहा ले जाएं तो उस बहू की क्या हालत होगी। लेकिन यही बात वह गीत के माध्यम से कहती हैं और खुद भी मुस्कुराती हैं और सास के चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है। संबंध भी निभते हैं और मन का गुबार भी बह जाता है।

यहां इस बात को समझना होगा कि गाली और गाली गीत में फर्क है। गाली आपको नकारात्मकता की ओर ले जाती है और गाली गीत आपको आपकी संस्कृति की ओर है। गाली हमारे संबंधों को तोड़ती है, जबकि गाली गीत हमारे संबंधों को जोड़ते हैं। इसलिए हमें इस बात का ख्याल रखना होगा कि हम क्या कर रहे हैं। आमतौर पर गाली गीत को लोग अपमान से जोड़ते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। गाली गीत कोई अपमान नहीं है। यह आज के जीवन को आनेवाली पीढ़ियों के जीवन से जोड़ता है, जहां आप भी हंसते मुस्कुराते हुए गुनगुनाने लगते हैं,

"सुनाओ मेरी सखियां,
स्वागत में गाली सुनाओ
बजाओ मेरी सखियां
ढोलक मजीरा बजाओ।"

(विभा रानी लेखक, कवि और फिल्म-थियेटर कलाकार हैं)

Published: 29 May 2018, 5:13 PM
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