बॉलीवुड के लटके-झटकों और एक्शन से परे वंचितों की आवाज, नए चेहरों और विषय के सिनेमा का एक वर्ष

साल 2021 गुजर रहा है। इस साल फिल्म जगत में यूं तो बॉलीवुड की कई फिल्में ऐसी हैं जिन्होंने चर्चा बटोरी। लेकिन असली सिनेमा तो क्षेत्रीय भाषाओं और उन विषयों का रहा जिसमें वंचितों की आवाज थी, नए चेहरे थे और कुछ ऐसा था जिसने दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी।

'फायर इन द माउंटेंस' का एक दृश्य
'फायर इन द माउंटेंस' का एक दृश्य
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नम्रता जोशी

प्रिंट मीडिया के किसी पत्रकार और उसके जीवन को उसके लिखे से ही जाना-परखा जाता है, लेकिन बहुत कुछ है जो उसके कागज या कम्प्यूटर स्क्रीन तक पहुंच ही नहीं पाता। कई साक्षात्कार अपनी परिणति तक नहीं पहुंचते। तमाम फिल्में उसकी समीक्षा की कसौटी नहीं देख पातीं। कितने मुद्दे धरे रह जाते हैं जिन पर कोई बात ही नहीं हो पाती।

अब यह तो न ही पूछें कि क्यों, लेकिन एक फिल्म ऐसी थी जिसपर चाहकर भी मैं लिख नहीं सकी। हालांकि मेरी नजर में यह 2021 की बहुत अच्छी फिल्मों में रही।अजित पाल सिंह की ‘फायर इन द माउंटेंस’, जिसका प्रीमियर पिछली जनवरी में आयोजित सनडांस फिल्म फेस्टिवल में हुआ था। भले ही इसे पसंद करने का मेरा तात्कालिक कारण पूरी तरह व्यक्तिगत रहा हो लेकिन, उत्तराखंड के एक छोटे से गांव में जिस प्रामाणिकता और विस्तार के साथ अजित जीवन के रंगों को फिर परदे पर जीवंत करते हैं, अद्भुत है।

गाती-बजाती अपनी ही धुन में खोई दुनिया, जिसमें लोक भी है, संगीत भी, और देवी-देवताओं, पुश्तैनी आत्माओं, झाड़-फूंक से इलाज की बातें भी। यह मेरी भी दुनिया है, जहां मेरी जड़ें हैं। हालांकि वर्ष जाते-जाते अजित एक दमदार थ्रिलर के रूप में एक खूबसूरत कहानी के साथ ‘फायर इन द माउंटेंस’ सोनी लिव पर छोड़ जाते हैं, जहां किरदारों, रिश्तों और भावनाओं पर उनकी पकड़ वैसी ही मजबूत दिखती है, लेकिन यह कहानी उनकी उस कहानी से एकदम अलग खुरदुरे पंजाब की दुनिया में ले जाती है।

बॉलीवुड के लटके-झटकों और एक्शन से परे वंचितों की आवाज, नए चेहरों और विषय के सिनेमा का एक वर्ष

अजित की तरह ही एक और नवोदित हैं पीएस विनोथराज। एक नामालूम सी जगह से विनोथ अपनी फिल्म कूझंगल (कंकड़) के साथ एक खुशनुमा हवा की तरह आते हैं। फिल्म रॉटरडम अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल की प्रीमियर स्क्रीनिंग का हिस्सा बनती है और प्रतिष्ठित ‘टाइगर’ अवार्ड जीतकर ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व करने निकल जाती है। यह वाकई एक दुर्लभ और सुकून देने वाला अहसास है।

तमिलनाडु में मदुरै के पास अरिट्टापट्टी गांव में फैले अंधकारमय जीवन को विनोथराज पूरी संजीदगी और सरलता से पर्दे पर उतारते हैं। यह न सिर्फ उनकी बहन के साथ घटी एक घटना पर आधारित है बल्कि विनोथ स्वयं अरिट्टापट्टी की मामूली पृष्ठभूमि से आकर उस जीवन को परदे पर जीवंत करते हैं।शायद यही कारण हो कि फिल्म हमें अपने एकदम पास लगती है। सामान्य नहीं है कि स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने वाला, कपड़ा फैक्टरी में दस साल से ज्यादा समय तक मजदूरी और चेन्नई की सड़कों पर डीवीडी बेचने वाला यह शख्स माजिद मजीदी और स्टेनली कुब्रिक जैसी वैश्विक फिल्मी हस्तियों के असर में आता है, ए षनमुगम की दो फिल्मों में बतौर सहायक निर्देशक जुड़ता है, एक दिन खुद की लघु फिल्में बनाना शुरू करता है और आखिरकार अपनी पहली फीचर फिल्म के साथ एक धमाके से एंट्री लेता है।

बॉलीवुड के लटके-झटकों और एक्शन से परे वंचितों की आवाज, नए चेहरों और विषय के सिनेमा का एक वर्ष

2021 कन्नड़ फिल्मी सितारों राज बी शेट्टी और ऋषभ शेट्टी का साल भी रहा। अभिनेता-निर्देशक-लेखक राज शेट्टी की ‘गरुण गमन, वृषभ वाहन’ मुख्यधारा में इस साल की सबसे मनोरंजक फिल्म रही। राज के साथ ही प्रसिद्ध अभिनेता-फिल्म निर्माता ऋषभ शेट्टी की गैंगस्टर पृष्ठभूमि वाली इस फिल्म में मनोरंजन का वह सबकुछ है जिसे लोकप्रियता की शर्त माना जाता है। राज अभिनीत एक और है जो स्मृतियों में टंग सी गई। यह थी नरेश हेगड़े की पहली फिल्म ‘पेड्रो’। इस वर्ष की सबसे पसंदीदा फिल्म। उस ग्रामीण कर्नाटक की कहानी जहां सामन्तवाद, धार्मिक कट्टरता, वंचितों पर अत्याचार आज भी पूरे विद्रूप में मौजूद है। समय और समाज के उस हिस्से के सच का यह एक अत्यंत प्रभावशाली बयान है।

2021 मेरे लिये शेट्टियों से परिचय का साल भी रहा। राज और ऋषभ के साथ इनमें 2016 की फिल्म ‘किरिक पार्टी’ से चर्चित रक्षित का भी नाम अनिवार्य रूप से शामिल है। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में ये तीनों कन्नड़ सिनेमा को लोकप्रियता दिलाने के साथ ही शेष भारत के सिनेमा की बैसाखी से मुक्त ही नहीं, विश्व सिनेमा के पटल पर भी स्थान दिला पाने में सफल होंगे! मैं तो इन पर जुआ खेलने को भी तैयार हूं।

इरफाना मजूमदा की फिल्म 'शंकर्स फेयरीज़' का एक दृश्य
इरफाना मजूमदा की फिल्म 'शंकर्स फेयरीज़' का एक दृश्य

कहना न होगा कि 2020 ने ‘माइल स्टोन’ और ‘द डिसिपल’ के साथ हमें जहां छोड़ा था, 2021 में उसने विभिन्न भारतीय भाषाओं में नई तरह की फिल्मों का रास्ता खोला और कई ऐसे नाम दिखे जो पहली बार (डेब्यू) एंट्री लेते हैं और परिवेश की विशिष्टता और खूबसूरती को बखूबी सामने लाते हैं। ठीक इरफाना मजूमदार की शंकर की परियों (शंकर्स फेरीज) की तरह जहां जाति, वर्ग और धर्म आधारित विभाजन को बहुत संवेदना के साथ समझा गया है। साठ के दशक के लखनऊ की पृष्ठभूमि में एक छोटी सी बच्ची की यह कहानी जिस तरह बुनी गई है वह मौजूदा परिवेश में किसी भारतीय की निजी कहानी भी हो सकती है।

प्रसून चटर्जी की पहली ही बंगाली फीचर फिल्म ‘दोस्तोजी’ नब्बे के दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस की पार्श्वभूमि में रचे गए साम्प्रदायिक माहौल में बंगाल के ग्रामीण अंचल के आठ साल के दो ब्च्चों की दोस्ती की परीक्षा की मार्मिक कहानी है।आदित्य विक्रम सेनगुप्ता की ‘वंस अपॉन अ टाइम इन कोलकाता’ और निखिल महाजन की ‘गोदावरी’ भी अलग से रेखांकित करने योग्य हैं।


'द ग्रेट इंडियन किचन' का एक दृश्य
'द ग्रेट इंडियन किचन' का एक दृश्य

बीते कुछ वर्षों में मलयालम सिनेमा के प्रति दर्शकों का प्रेम खासा बढ़ा है। इसने भाषा और क्षेत्र की सीमाएं लांघी हैं। 2021 में इसे लीक से हटकर, विचारों के इर्दगिर्द बनी दिलचस्प कहानियों और करिश्माई अभिनय के लिए रेखांकित जाएगा। स्वाभाविक रूप से इसमें फहद फसिल जैसे बहुआयामी अभिनेताओं और तकनीकी महारत का बड़ा योगदान है। द ग्रेट इंडियन किचन, नायट्टू, जोजी, अरक्कारियम, मालिक, बिरयानी, मिन्नल मुरली, संतोषथिंते ओन्नम रहस्यम जैसी फिल्में देखते हुए लगता है जैसे एक से बढ़कर एक सिनेमा बनाने की होड़ सी लगी हो।

तमिल सिनेमा भी बीते कुछ सालों की अपेक्षा इस बार सीमाएं तोड़ता दिखा। कर्णन, सरपट्टा परंबराई, जय भीम, माडथी जैसी फिल्में बड़े पर्दे से दूर ओटीटी प्लेटफार्म के जरिए सीधे भारतीय दर्शक तक ही नहीं पहुंचीं, वैश्विक तारीफ का कारण भी बनीं। कुछ ऐसे विषय सामने आए जो अब तक यहां दुर्लभ या कह लें वर्जित थे। इनमें हाशिए का समाज दिखा, जातीय विभेद पर चोट के साथ तीखी बहस दिखी और दिखा आदिवासियों का शोषण, पुलिसिया दमन और हिंसा का प्रतिकार। बहुत कुछ नया और धारा से अलग था।

बॉलीवुड के लटके-झटकों और एक्शन से परे वंचितों की आवाज, नए चेहरों और विषय के सिनेमा का एक वर्ष

इस बीच बॉलीवुड सूर्यवंशी और सत्यमेव जयते की सफलता-असफलता की बहस के बीच प्रायः हिंदुत्व की चाशनी में डूबे अंधराष्ट्रवाद के साथ मुसलमानों को कोसने, अच्छे मुस्लिम-बुरे मुस्लिम की परिभाषा तय करने की भेड़चाल में उलझा दिखाई दिया। तो ‘सरदार ऊधम सिंह’ के साथ शूजित सरकार सबसे अलग दिखे। मौजूदा समय में एक देशभक्त की बायोपिक बनाने के खतरे उठाते हुए शूजित का यह काम लम्बे समय तक स्मृतियों में रहेगा। अमित मासुरकर की ‘शेरनी’ पर्यावरण जैसे नीरस विषय और इसके ट्रीटमेंट के लिए याद रहेगी तो यह वर्ष सीमा पाहवा के निर्देशन में उतरने की सफल कहानी भी गढ़ता है जब वे ‘राम प्रसाद की तेरहवीं’ के रूप में एक बहुश्रुत कहानी को न सिर्फ अपना विषय बनाने की चुनौती लेती हैं, बल्कि पूरी तरह निर्वाह भी करती हैं।


'हंगामा है क्यों बरपा' के एक दृश्य में मनोज वाजपेयी
'हंगामा है क्यों बरपा' के एक दृश्य में मनोज वाजपेयी

जिस दौर में एंथालाजी स्ट्रीमिंग दुनिया के लिए अभिशाप दिखाई दे रही थी वैसे वक्त में भी यहां कुछ अपवाद दिखाई दे गए। नीरज घायवान की गीली पुच्ची (अजीब दास्तान खंड) अगर एक साथ जातीय-रंगभेदी संघर्ष के साथ स्त्री विमर्श के भी गवाक्ष खोलती है तो यह कोंकना सेन शर्मा के शानदार अभिनय के लिए भी स्मृति में बनी रहेगी।

ओटीटी पर चर्चित शृंखला अभिषेक चौबे की ‘रे’ की एक कड़ी ‘हंगामा है क्यूं बरपा’ में मनोज बाजपेयी और गिरिराज राव के अद्भुत अभिनय की प्रशंसा के बिना यह चर्चा अधूरी रह जाएगी, जहां ये दोनों अभिनेता अलग ही धुन में दिखाई देते हैं। हां, ‘गुल्लक-2 जैसी लघु फिल्म को कहानी कहने के अपने खासअन्दाज के लिए जरूर याद किया जाएगा जहां अभिनय ही नहीं, तेजी से बीतते वक्त में एक मध्यवर्गीय परिवार की रोजमर्रा की बातें या संघर्ष कब आंखों के सामने से गुजर जाते हैं दर्शक को पता ही नहीं चलता।

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