‘आराधना’ और ‘7 हिंदुस्तानी’: 50 साल पहले रिलीज़ हुईं दो फिल्में जिनसे निकले दो सुपरस्टार

50 बरस पहले भारतीय सिनेमा में एक ही दिन दो फिल्में रिलीज हुईं। एक ने कामयाबी के झंडे गाड़े,तो दूसरी सुपर फ्लॉप। एक ने फिल्मफेयर अवार्ड जीते, तो दूसरी ने राष्ट्रीय पुरस्कार। लेकिन इन दोनों ही फिल्मों ने बॉलीवुड को दिए दो सुपर स्टार्स

फिल्मों के पोस्टर
फिल्मों के पोस्टर

इकबाल रिजवी

पचास साल पहले यही नवंबर का महीना था जब एक ही दिन दो फिल्में रिलीज़ हुईं और भारतीय सिनेमा के इताहिस में दर्ज हो गयीं। गूगल के मुताबिक आराधना और सात हिंदुस्तानी 7 नवंबर 1969 को रिलीज हुई थीं। फिल्म “आराधना” से भारतीय सिनेमा में सुपर स्टार का युग शुरू हुआ। और “सात हिंदुस्तानी” महानायक अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म थी।

पहले बात करते हैं फिल्म “ आराधना” की। आराधना एक समर्पित प्रेमिका और पत्नी तथा कर्तव्य निभाने वाली मां की कहानी है, जो अमेरिकी फ़िल्म ‘टू ईच हिज़ ओन’ (1948) पर आधारित है। इसका असरदार भारतीयकरण किया लेखक सचिन भौमिक ने। इस फिल्म के रिलीज होने के बाद जैसा जादू राजेश खन्ना का चला वह अपने आप में एक मिसाल है। तभी तो वे देश को पहले सुपर स्टार बने। फिल्म तो नारी प्रधान ही थी। इस फिल्म के लिये शर्मीला टैगोर को पहली बार फिल्म फेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला।

लेकिन, सब कुछ एक तरफ और फिल्म का संगीत एक तरफ। एक से बढ़ कर एक हिट गाने। ‘मेरे सपनो की रानी कब आएगी तू’ , ‘रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना भूल कोई हमसे ना हो जाए’, और ‘कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा’ जैसे गीत गाकर मानो किशोर कुमार ने गायकी की दुनिया में फिर से जन्म लिया। किशोर कुमार को सर्वश्रेष्ठ गायक का पहला फिल्म फेयर पुरस्कार इसी फिल्म के लिये मिला। भला इस फिल्म का गीत ‘गुनगुना रहे हैं भंवरे खिल रही है कली कली’ और ‘बागों में बहार है’ जैसे गीत कभी मुलाए जा सकते हैं। फिर सचिन देव बर्मन की आवाज में ‘ काहे को रोए’ जैसा खुद में डूबने पर मजबूर करने वाला गीत भी तो इस फिल्म की जान था।

कहने की जरूरत नहीं कि फिल्म का संगीत सचिन देव बर्मन ने दिया था। आराधना को साल 1969 का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। शक्ति सामंत के कुशल निर्देशन में बनी आराधना आज भी भारतीय सिनेमा की श्रेष्ठ फिल्मों में शुमार की जाती है।

दूसरी तरफ इसी के साथ रिलीज हुई सात हिंदुस्तानी अपने समय की सुपर फ्लाप फिल्म थी। फिल्म की कहानी गोवा की आजादी के आंदोलन पर आधारित है। दरअसल 1947 में भारत आजाद हो गया था लेकिन पुर्गालियों ने गोवा पर कब्जा नहीं छोड़ा था। गोवा की आजादी के लिए 14 साल तक संघर्ष चला। तब जाकर 1961 में गोवा भारत का हिस्सा बना। फिल्म में दिखाया गया है कि भारत के अलग अलग राज्यों से सात हिंदुस्तानी इकट्ठा हुए हैं जो गोवा को पुर्तगाली शासन से आजाद कराने की जंग लड़ते हैं। इन सात हिंदुस्तानियों में एक अमिताभ बच्चन भी हैं।

फिल्म में उत्पल दत्त, जलाल आगा, महमूद के भाई अनवर अली और आगा की बहन शहनाज ने भी काम किया, लेकिन ढीले निर्देशन और पटकथा में कसाव ना होने की वजह से फिल्म दर्शकों पर प्रभाव नहीं छोड़ पायी। साथ ही रंगीन फिल्मों के दौर में यह ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म थी। इसका भी नकारात्मक असर दर्शकों पर पड़ा। कैफी आजमी की एक नज्म जो इस फिल्म में शामिल की गयी थी उसे जररू काफी अर्से तक याद रखा गया। नज्म के बोल थे, “आंधी आए या तूफां कोई ग़म नहीं - है यही आखरी इम्तहां साथियों, एक तरफ़ मौत है एक तरफ़ ज़िंदगी - बीच से ले चलो कारवां साथियों”।

'सात हिन्दुस्तानी' को उस वर्ष राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। कैफी आजमी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। लेकिन जिस पुरस्कार की सबसे कम चर्चा होती है वह था अमिताभ बच्चन को मिला सर्वश्रेष्ठ नए अमिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार। सात हिंदुस्तानी ख़्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म थी। वे इसके निर्माता और निर्देशक ही नहीं लेखक भी थे। फिल्म की पटकथा भी उन्होंने ही तैयार की थी लेकिन यह फिल्म इतिहास का हिस्सा बनी तो सिर्फ इस वजह से कि यह महानायक अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म है।

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