आखिर क्यों बदल गया है देशभक्ति की फिल्मों का चेहरा और आयाम! क्या कहते हैं देश के जाने-माने फिल्मकार

जैसी देशभक्ति पूर्ण फिल्में पहले के दौर में बनती थीं, उस तरह की फिल्में अब क्यों नहीं बनतीं? एक दौर था जब मनोज कुमार ने ‘शहीद’ और ‘उपकार’- जैसी फिल्मों के साथ देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों की एक पूरी श्रृंखला प्रस्तुत की थी। तो क्या अब उस तरह की फिल्मों को बनाने का दौर समाप्त हो गया है?

नवजीवन
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सुभाष के झा

क्या देशभक्ति पर फिल्में आज प्रासंगिक हैं? इस सवाल पर चर्चा करने से पहले यह समझना जरूरी है कि देशभक्ति की परिभाषा समय के अनुसार बदलती रहती है। एक समय था जब सांप्रदायिक सौहार्द की फिल्में भी देशभक्ति पर केंद्रित समझी जाती थीं। लेकिन शको शुबहा और वैमनस्य से बोझिल आज के समयमें ‘तन्हाजी’, ‘पानीपत’ और ‘सत्यमेव जयते’-जैसी फिल्में बनी हैं जिनमें देशभक्ति काआक्रामक रूप ही दिखाई देता है। तब इस बात पर गौर करना जरूरी हो जाता है कि देशभक्ति के लिए कोई शत्रु सामने हो, यह जरूरी नहीं। हम सामाजिक सुधार और प्रगति, सौहार्द और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अहिंसात्मक सोच को केंद्र में रख कर भी देशभक्ति के कथानक पर फिल्म बना सकते हैं। शायद ज्यादा महत्वपूर्ण है देशभक्ति के प्रति फिल्मकारों के नजरिये में बदलाव।

जैसी देशभक्ति पूर्ण फिल्में पहले के दौर में बनती थीं, उस तरह की फिल्में अब क्यों नहीं बनतीं? एक दौर था जब मनोज कुमार ने ‘शहीद’ और ‘उपकार’- जैसी फिल्मों के साथ देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों की एक पूरी श्रृंखला प्रस्तुत की थी। तो क्या अब उस तरह की फिल्मों को बनाने का दौर समाप्त हो गया है?

फिल्मकार बेदोब्रत पैन हाल के वर्षों में उभरकर आए हैं और देशभक्ति की फिल्मों के नए दौर के निर्देशक हैं। उनकी फिल्म ‘चटगांव’ 1930 के ब्रिटिश राज में हुए विद्रोह पर बनी एक बहुचर्चित फिल्म है। पैन भी यह महसूस करते हैं कि आज के समय में देशभक्ति की फिल्में कहीं धारा से बाहर हो गई हैं। वह कहते हैं, “मैं समझता हूं कि हमारी देशभक्ति की फिल्मों के साथ समस्या यह है कि वे हीरो (मुख्य किरदार) की उपासना/गुणगान और त्याग पर ज्यादा केंद्रित होती हैं और विजय पर कम ध्यान देती हैं। अपनी फिल्मों में मैंने इसी दोष को हटाने का प्रयास किया है। मेरी फिल्मों में एक भाव है कि अंत उदासी पर नहीं होगा बल्कि एक जोश के साथ होगा। मुझे लगता है कि आज का भारत विजय की कहानियां सुनना चाहता है और लोगों को लगता है कि देशभक्ति की फिल्में बहुत रोमांचक और उत्साहजनक नहीं होंगी। अब आप ‘ब्रेवहार्ट’ जैसी फिल्म को देखिए। मुझे लगता है कि हम कभी भी इतने बड़े कैनवस की रचना नहीं कर पाए। मुझे नहीं लगता कि लोग राष्ट्रवाद को लेकर संवेदनशील नहीं रहे। मैं महसूस करता हूं कि फिल्म निर्माताओं के सामने जो चुनौती है, वह है ऐसी फिल्मों को रोमांचक बनाए रखना। मैं देखना चाहता था कि क्या मैं एक ऐसे लड़के की कहानी सुना सकता हूं जो एक आशावादी दौर में बड़ा हो रहा है – और मैं उसे बड़ी ही सादगी के साथ सुनाते हुए दर्शकों को बांधे रखना चाहता था। बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे पुराण और ग्रंथ हमें बांधे रखते हैं।”

पैन को लगता है कि मनोज कुमार के सिनेमा और उनके अंदाज की देशभक्ति के चित्रण का दौर समाप्त हो चुका है। वह कहते हैं, “मनोज कुमार की तरह का देशभक्ति का सिनेमा आज के दौर में उस दौर के जैसे भाव नहीं जगाता। वह पूरा युग ही आशावाद का था, उम्मीद का था, एक विजन का था और कुछ अपेक्षाओं का था-जैसे कुछ बड़ा होने जा रहा हो और जिसके लिए लोग अपनी जान की कुर्बानी के लिए भी तैयार हों। लेकिन आज आजादी के इतने दशकों के बाद उम्मीद और विजन की कहानी का स्थान निराशावाद ने ले लिया है।”

भारत-पाक के मेलजोल पर आधारित फिल्म ‘लाहौर’ के निर्देशक संजय चौहान कहते हैं, “समकालीन सिनेमा में देशभक्ति की स्टीरियो टाइप परिभाषा में परिवर्तन आया है। अब ऐसा माना जाता है कि अनिल शर्मा की ‘गदर’- जैसी फिल्में जो एक ही आयाम यानी तिरंगा लहराने और अपने प्रिय राष्ट्र के लिए अपनी कुर्बानी देने से भरी रहती थीं, अब दर्शकों को खो चुकी हैं। मैं अलग राय रखता हूं। फिल्मकार देशभक्ति के रंग को बहुत सूक्ष्मता से अपना रहे हैं और बहुत सारी सच्चाइयों के साथ घोलकर बड़ी ही सहजता के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रंग दे बसंती’ फिल्म में दिखाए गए कैंडल लाइट विरोध प्रदर्शन ने एक बहुत बड़े स्तर पर यह साबित किया है कि कैसे सिनेमा समाज की सोच को प्रभावित कर सकता है। यहां तक कि मेरी फिल्म ‘लाहौर’ जिसको बहुत सारे लोग इसलिए एंटी-क्लाइमैक्टिक समझते थे क्योंकि उसमें खेल के मैदान में पाकिस्तान की जीत दिखाई गई थी। सिनेमा में देशभक्ति की नई तरंग का यह सबसे बेहतरीन उदाहरण है। दर्शकों को भर-भर कर उपदेशात्मक देशभक्ति प्रस्तुत करने का समय बीत चुका है।”


फिल्मकार अनंत महादेवन महसूस करते हैं कि सिनेमा में देशभक्ति की पूरी अवधारणा में ही एक गहरा बदलाव आया है। उनका कहना है, “शहीद’ और ‘क्रांति’ तथा उसके बहुत ही बाद में आई देशभक्ति पूर्ण फिल्में ‘खेलेंगे हमजी जान से’ और ‘चटगांव’ उन चरित्रों के बारे में है जो स्वतंत्रता से पहले के भारत में अपने देश के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। अब दृष्टिकोण बदल चुका है। देशभक्ति को वर्तमान संदर्भ में परिभाषित किया जाता है।... केतन मेहता की ‘मंगल पांडेय’, आशुतोष गोवारिकर की ‘खेलेंगे हमजी जान से’ और बेदोब्रत पैन की ‘चटगांव’-जैसी फिल्में उस दौर को चित्रित करने वाली अंतिम फिल्में थीं।”

देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्म ‘कर्मा’ के निर्देशक सुभाष घई यह नहीं मानते कि मनोज कुमार के देशभक्ति पूर्ण ब्रांड का दौर अब खत्म हो चुका है। वह कहते हैं, “यह अभी भी भारतीय सिनेमा में बना हुआ है। लेकिन देशभक्ति की परिभाषा बदल चुकी है। दर्शक खोखले नारे, झूठी शान और बनावटी सपने नहीं चाहते हैं। आज का सिनेमा स्वयं वास्तविक भारत को संबोधित है। ”

लेखक प्रसून जोशी यह मानते हैं कि हमारी फिल्मों में देशभक्ति में कोई बदलाव नहीं आया है। वह कहते हैं, “देशभक्ति का अर्थ अभी भी अपने देश के लिए प्यार और निष्ठा है। पहले शायद यह ज्यादा स्पष्ट था क्योंकि हम बाहरी शत्रु से अपने देश के लिए आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। तभी ‘शहीद’ जैसी देशभक्ति की शैली का सिनेमा सामने आया। फिर बात अपने देश को बनाने और संवारने की थी तो ‘नया दौर’ और ‘उपकार’ जैसी देशभक्ति की शैली का सिनेमा सामने आया। आज का देशभक्ति का सिनेमा हमारे देश को बदलने, उसे भ्रष्टाचार से बाहर निकालने और उन सभी बुराइयों से लड़ने पर केंद्रित है जो हमारे देश के अंदर बैठ चुकी हैं। आज हमारा शत्रु हमारे भीतर है। आज फिर से गांधीवादी आदर्श की हमारे सिनेमा में प्रतिध्वनि हो रही है। उदाहरण के लिए राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘मुन्नाभाई’ में यह दिखता है।”


‘पिंजर’ जैसी बेहतरीन फिल्म बनाने वाले डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी का मानना है कि गत वर्षों में सिनेमा में देशभक्ति की परिभाषा बदली है। वह कहते हैं, “हां, अतीत को दिखाने वाली फिल्मों में कमी आई है लेकिन एक देशभक्ति की फिल्म के लिए आवश्यक नहीं है कि वह हमेशा ऐतिहासिक विषय-वस्तु ही दिखाए। कोई भी फिल्म जो समाज को बांधती हो, एक करती हो, शांति कायम करती हो और एक समन्वय स्थापित करती हो- वह देशभक्ति की फिल्म है। मेरे लिए सलीम अहमद की मलयालम फिल्म ‘अदामिंते माकन अबू’ उतनी ही देशभक्ति की फिल्म है जितनी गौत मघोष की बांग्लाफिल्म ‘मोनेर मानुष’ और अमित राय की ‘रोड टु संगम’।”

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