अर्जुन के निजी संबंधों की वजह से ‘पानीपत’ हार गए गोवरिकर...

अर्जुन कपूर की निजी जिंदगी से अधिक नकारात्मकता फैली। भारतीय समाज में रिश्तों और संबंधों की सामंती सोच में मलाइका अरोड़ा और अर्जुन कपूर के अंतरंग संबंधों को स्वीकारने की उदारता नहीं दिखी। इसे दो व्यक्तियों के प्रेम और निर्णय के रूप में नहीं देखा गया।

फोटोः सोशल मीडिया
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अजय ब्रह्मात्मज

बहुत बड़े पैमाने पर बनी ऐतिहासिक फिल्म होने के बाद भी आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘पानीपत’ की ओपनिंग बहुत कम थी, इसलिए वीकेंड कलेक्शन संतोषजनक नहीं रहा। ‘पानीपत’ ने पहले वीकेंड में केवल 17.15 करोड़ का कलेक्शन किया। 90 से 100 करोड़ की लागत से बनी फिल्म की यह कमाई निराश करती है। आगे उम्मीद भी नहीं है, क्योंकि ‘मर्दानी 2’ आ चुकी है। अब सलमान खान की ‘दबंग 3’ आ रही है। चूंकि ‘पानीपत’ के साथ रिलीज हुई ‘पति पत्नी और वो’ अच्छी कमाई कर रही है, इसलिए सिनेमाघर ‘पानीपत’ के शो कम करेंगे और ‘दबंग 3’ के अधिकतम शो की व्यवस्था करेंगे।

इन दिनों फिल्मों की गुणवत्ता और मौलिकता से अधिक उनकी व्यवसायिकता मायने रखती है। बाजारवाद ने स्थापित कर दिया है कि जिन फिल्मों से अच्छी कमाई होती है, वही फिल्में उल्लेखनीय होती हैं। इस लिहाज से विषय और प्रस्तुति में श्रेष्ठ होने के बावजूद ‘पानीपत’ साथ में रिलीज हुई ‘पति पत्नी और वो’ से फिलहाल कमतर मानी जाएगी। ट्रेड विशेषज्ञ चिल्ला-चिल्लाकर आंकड़े बताएंगे और ‘पानीपत’ को ‘लॉस्ट प्रपोजल’ की तरह पेश करेंगे। वे रत्तीभर भी फिल्म की क्वालिटी और प्रासंगिकता की परवाह नहीं करते। उनका सीधा सा तर्क होता है कि जिस फिल्म को दर्शक मिल रहे हैं, वही श्रेष्ठ है, इस लिहाज से आशुतोष गोवारिकर के निर्देशन और अर्जुन कपूर, संजय दत्त, कृति सैनन जैसे लोकप्रिय कलाकारों के बावजूद पहले दिन 4.15 करोड़ का कलेक्शन हैरत में डालता है। पहले दिन का कलेक्शन अच्छा नहीं होने से अगले दो दिनों की उल्लेखनीय बढ़त भी आंकड़े सुधार नहीं सकी। हालांकि ट्रेड विशेषज्ञों ने सोमवार तक फ्लॉप का ठप्पा नहीं मारा था, लेकिन कम कलेक्शन की सच्चाई कोई कैसे छुपा सकता है?

जानकार कहते हैं कि ‘पानीपत’ की रिलीज से पहले ही उसकी अपकीर्ति फैल गई थी। ‘जोधा अकबर’ जैसी भव्य और प्रासंगिक ऐतिहासिक फिल्म बना चुके आशुतोष गोवारिकर की ‘पानीपत’ की घोषणा के बाद से ही अर्जुन कपूर को लेकर उनकी पसंद पर सवाल उठाए जा रहे थे। मेहनती और संभावनाशील होने के बावजूद अभी तक अर्जुन कपूर ने किसी फिल्म में ऐसा अभिनय और प्रदर्शन नहीं किया है कि उन्हें ‘पानीपत’ के नायक सदाशिव भाऊ के लिए सक्षम अभिनेता माना जाए। फिर अर्जुन कपूर की निजी जिंदगी में इस बीच जो कुछ हुआ उससे नकारात्मकता फैली। भारतीय समाज में रिश्तों और संबंधों की सामंती सोच में मलाइका अरोड़ा और अर्जुन कपूर के अंतरंग संबंधों को स्वीकारने की उदारता नहीं दिखी। इसे दो व्यक्तियों के प्रेम और निर्णय के रूप में नहीं देखा गया।

दर्शकों के बीच एक बड़ा समूह यह मानता है कि अर्जुन कपूर ने ‘जिस थाली में खाया, उसी में छेद कर दिया’। अर्जुन कपूर के शैशव काल में सलमान खान ने उन्हें अपने संरक्षण में लिया। अपनी देखरेख में वर्जिश करवाई और लॉन्चिंग के लिए तैयार किया। तभी सलमान खान की बहन अर्पिता से अर्जुन कपूर का प्रेम भी हुआ। अर्जुन कपूर खान परिवार के सदस्य बन गए थे। उन दिनों ही अचानक मलाइका अरोड़ा और अर्जुन कपूर के कथित संबंधों की खबरें आने लगी थीं। फिर भी सब कुछ सार्वजानिक नहीं था। अरबाज खान से तलाक के चंद महीनों के अंदर जिस तेजी से मलाइका अरोड़ा अर्जुन कपूर के साथ नजर आने लगीं, उससे अर्जुन कपूर की छवि का भारी नुकसान हुआ है। संबंधों में ओढ़ी हुई नैतिकता की चादर लपेटे समाज को यह सब बुरा लगा। भारतीय समाज की बुनावट हॉलीवुड के निजी परिवेश से अलग है। यहां संबंध और रिश्तों की परख अलग तरीके से होती है।

‘पानीपत’ के प्रति आशंका और नकारात्मकता में इस अप्रत्यक्ष किंतु संगीन प्रभाव ने गहरा असर किया है। ऊपर से फिल्म का पहला ट्रेलर इंप्रेसिव नहीं लगा। सभी ने इतिहास की किताबों में पानीपत की तीनों लड़ाइयां के बारे में पढ़ा है। विस्तार से उन लड़ाइयों के बारे में कम लोग जानते हैं। हिंदी में बनी और बन रही है ऐतिहासिक फिल्मों में प्रामाणिकता और तथ्यों से अधिक ड्रामा और संवादों पर ध्यान रहता है। दर्शक सेट और कॉस्टुयम भी देखते हैं। ‘मुगले आजम’ का बड़ा उदाहरण सामने है। इम्तियाज अली ‘ताज’ ने अकबर के बेटे सलीम और काल्पनिक किरदार अनारकली की प्रेम कहानी नाटक के फॉर्म में लिखी थी। बाद में इसी पर फिल्में बनीं। सन 1944 के आसपास के आसिफ ने यह नाटक देखा था और उन्हें इस प्रेम कहानी पर फिल्म बनाने का ख्याल आया था। उसके बाद की सारी ऐतिहासिक फिल्मों ने संघर्ष, युद्ध, विजय-पराजय और रोमांस के मूलभूत तत्वों को फार्मूला बना लिया। ‘बाहुबली’ तक में इसका प्रभाव दिखता है।

हिंदी में ऐतिहासिक फिल्मों की परंपरा बहुत पुरानी है। मूक फिल्मों के दौर से इतिहास और ऐतिहासिक चरित्रों को महत्व दिया जाता रहा है। बोलती फिल्मों का दौर ‘आलम आरा’ से आरंभ हुआ और हिंदी की तीसरी बोलती फिल्म ‘नूरजहां’ ऐतिहासिक फिल्म थी। तब से लेकर ‘बाहुबली’ तक ऐतिहासिक फिल्मों के अनेक दौर रहे। हर दौर में ऐतिहासिक फिल्में बनाने का लक्ष्य और ध्येय बदलता रहा। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में ऐतिहासिक फिल्में देश की गौरव गाथा के साथ ही साथ आजादी की कल्पना से लबरेज थीं। आजादी के बाद सबल ऐतिहासिक चरित्रों को फिल्मों का विषय बनाया गया। ‘बाहुबली’ की कामयाबी के बाद फिर से ऐतिहासिक चरित्रों में निर्देशकों ने रुचि दिखाई है। इन दिनों ‘राष्ट्रवाद’ एक अलग रंग और ध्येय में उछाल मार रहा है। निर्देशक ‘राष्ट्रवाद के नवाचार’ से प्रभावित होकर कथित ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के हिमायती हो गए हैं। यह देश की बहुसंख्यक आबादी को वर्तमान राजनीतिक सत्ता के प्रभाव में भा भी रहा है।

इस संदर्भ में आशुतोष गोवारिकर का निर्देशकीय विक्षेप सराहनीय है। ‘पानीपत’ में उन्होंने भारतीय इतिहास के सेक्युलर मूल्यों पर जोर दिया है। यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि मराठा योद्धा मुगलों के खिलाफ ‘हिंदू राष्ट्र’ के लिए लड़ रहे थे। वे राष्ट्रवादी थे। सच्चाई यह है कि तब न तो राष्ट्र की ऐसी धारणा थी और न कोई ऐसा शासक था, जिसका पूरे भारत पर शासन हो। अधिकांश युद्ध अपनी सत्ता और राज्य के लिए हुए। भारतीय उपमहाद्वीप अनेक रियासतों और राज्यों में बंटा था। हर क्षत्रप अपनी सत्ता कायम रखने के लिए युद्ध और समझौते कर रहा था। पानीपत के तीसरे युद्ध पर बनी ‘पानीपत’ में आशुतोष गोवारिकर ने सदाशिव भाऊ और अहमद शाह अब्दाली के बीच के महत्वपूर्ण युद्ध का प्रसंग लिया है।

आशुतोष गोवारिकर इस बार कथा विधान में चूके हैं। ऊपर से उनके पास सक्षम कलाकार नहीं थे। नायक सदाशिव भाऊ के रूप में अर्जुन कपूर अपनी ईमानदार कोशिशों के बावजूद योद्धा का दमखम जाहिर करने में विफल रहे। उनके सामने अहमद शाह अब्दाली की भूमिका में संजय दत्त का कद्दावर व्यक्तित्व था, इसलिए भी उनका प्रदर्शन बेअसर रहा। पानीपत की दूसरी खामियों पर अलग से बातें की जा सकती हैं। फिलहाल यह फिल्म दर्शकों की पसंद नहीं बन पाई है।

अब लोगों की निगाहें ओम राऊत की ‘तान्हाजी’, करण जौहर की ‘तख्त’ और डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी की ‘पृथ्वीराज’ पर टिकी हैं।

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