बासु चटर्जीः सिनेमा का वह मास्टर, जिसने आम लोगों की आम जिंदगी को पर्दे पर उतारा

बासु चटर्जी के रचे-गढ़े किरदारों को भारत का विशाल मध्य वर्ग खुद से आसानी से जोड़ पाता था। इसीलिए सत्तर के दशक में जब भारतीय मध्यवर्ग में सिनेमा देखना कतई अच्छी बात नहीं मानी जाती थी, तब लोग सपरिवार बासु चटर्जी की फिल्में देखने जाया करते थे।

फोटोः सोशल मीडिया
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इकबाल रिजवी

70 के दशक का हिंदी सिनेमा और अमिताभ के एंग्रीमैन का दौर। मुकाबले के लिए धर्मेंद्र, शत्रुघन सिन्हा, विनोद खन्ना सहित तमाम लौह पुरूष, लेकिन बासु चटर्जी ने पर्दे पर नायक बनाया अमोल पालेकर को। हैरत की बात ये रही कि आम सी सूरत वाले सीधे-साधे अमोल पालेकर का दर्शकों ने तहे दिल से स्वागत भी किया।

70 के दशक में गोली, बम, खून और बेतहाशा हिंसा का पर्दे पर हास्य और संगीत के सहारे मुकाबला आसान नहीं था। उस दौर के फिल्मी पर्दे पर नजर आने वाले सर्वगुण संपन्न और सर्वाधिक शक्तिशाली नायकों के मुकाबले अमोल पालेकर जैसे आम से नजर आने वालों की कोई हैसियत नहीं थी, लेकिन बिमल राय और ऋषिकेष मुखर्जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले बासु ने ऐंग्री मैन के मुकाबले सहज मैन को चुना और कई यादगार फिल्में दीं।

हालांकि हिंदी सिनेमा को चाहने वाली नौजवान पीढ़ी से बासु चटर्जी का नाम पूछिये तो शायद ये नाम याद ना आए, लेकिन ‘रजनी गंधा’, ‘शौकीन’ और ‘खट्टा-मीठा’ जैसी फिल्मों के बारे में पूछिये तो ये फिल्में जरूर याद होंगी। ये सारी फिल्में बासु चटर्जी की देन हैं। बासु का सिनेमा हिंदी सिनेमा के सपनों और कल्पनाओं की धारा वाला सिनेमा नहीं था। मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहारा के मुकाबले उनका सिनेमा मध्यवर्ग के रहने वाले सामान्य लोगों की सामान्य कहानियों का सिनेमा है।

सामान्य वर्ग की सामान्य कहानियों को खास ढंग से पेश करने में बासु को काफी समय लगा। अजमेर में 10 जनवरी 1930 को जन्मे बासु ने जीवन की शुरूआत का खासा समय मथुरा में बिताया। बीए करने के बाद सिनेमा की कशिश उन्हें मुंबई ले गई, लेकिन उन्हें शरण मिली एक कार्टूनिस्ट के तौर पर ब्लिटज़ अखबार में। वहां वे राजनीतिक कार्टून बनाने के दौरान समाज की छोटी-छोटी विसंगतियों और खूबियों को बारीकी से समझते रहे।

साल 1962 में उन्हें फिल्म तीसरी कसम में सहायक निर्देशक बनने का मौका मिला। इसके बाद कुछ और फिल्मों में सहायक निर्देशक बनने के बाद 1969 में पहली फिल्म ‘सारा आकाश’ निर्देशित करने का मौका मिला। राजेंद्र यादव ने सामान्य प्रेमियों की सामान्य प्रेम कहानी को असरदार ढंग से ‘सारा आकाश’ उपन्यास के रूप में लिखा था। इसी पर बासु ने फिल्म बनाई, जिसने कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रशंसा बटोरी। बासु फिल्म निर्देशक के रूप में स्थापित हो गए।

सामान्य वर्ग की सामान्य कहानी को खास दिलचस्प तरीके से पर्दे पर पेश करने का हुनर बासु सीख चुके थे। इसके बाद ‘रजनी गंधा’ (1974), ‘छोटी सी बात’ (1975), ‘चितचोर’ (1976), ‘बातों बातों में’ (1979) जैसी फिल्मों में अमोल पालेकर को हीरो बनाया। इनके अलावा, ‘खट्टा-मीठा’ (1978), ‘शौकीन’ (1981), ‘दिल्लगी’ (1978) भी बासु चटर्जी की उस दौर की यादगार फिल्में हैं। दिल-दिमाग में रच बस जाने वाले गीत बासु चटर्जी की फिल्मों की एक और खासियत हुआ करते थे।

बासु चटर्जी ने सिर्फ हल्की फुल्की मनोरंजक फिल्में ही नहीं बनाईं। उन्होंने ‘रतनदीप’, ‘कमला की मौत’, ‘स्वामी और चरित्रहीन’ जैसी गंभीर फिल्में भी बनाईं। उन्होंने अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘मंजिल’ का भी निर्देशन किया। इस फिल्म का एक गीत रिमझिम गिरे सावन सदाबहार फिल्मी गीतों में से एक है। इतना ही नहीं, उन्होंने भारतीय टीवी दर्शकों को ब्योमकेश बख्शी, रजनी और कक्का जी कहिन जैसे बेहतरीन धारावाहिक भी दिए।

बासु चटर्जी ने फिल्म निर्देशन की शुरूआत उस समय की जब भारत में समानान्तर या कहिये पैरलल सिनेमा अपनी जगह बना रहा था। बासु चटर्जी की पहली फिल्म ‘सारा आकाश’, मृणाल सेन की ‘भुवन सोम’ और मणिकौल की फिल्म ‘उसकी रोटी’ को भारतीय पैरलल सिनेमा का बुनियाद माना जाता है, लेकिन बासु ने ना तो मणिकौल और मृणाल सेन की तरह गंभीरता में डूबी फिल्में बनाईं और न ही मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा की फिल्मों की तरह की फिल्में बनाने में दिलचस्पी दिखाई, बल्कि उन्होंने बीच का रास्ता चुना।

बासु चटर्जी के रचे किरदारों को भारत का विशाल मध्यवर्ग खुद से आसानी से जोड़ पाता था, इसीलिए सत्तर के दशक में जब भारतीय मध्यवर्ग में सिनेमा देखना अच्छी बात नहीं मानी जाती थी, तब लोग सपरिवार बासु चटर्जी की फिल्में देखने जाया करते थे।

फिल्मी पर्दे पर कहानी सुनाने और बताने की कला में माहिर होने वाले कभी मर नहीं सकते। शरीर इस दुनिया में न भी रहे तो उनकी फिल्में उन्हें ज़िंदा रखती हैं। निर्देशक बासु चटर्जी भी अब नहीं रहे, लेकिन उनकी फिल्में हमारे बीच हैं और सशक्त सिनेमा के इतिहास के दस्तावेज के तौर पर हमेशा रहेंगी।

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