‘दीवार’ का ‘मेरे पास मां है’ और ‘त्रिशूल’ में बाप से अलगाव तो जावेद अख्तर की जिंदगी के संवाद और किरदार हैं

मां ने प्यार तो बहुत किया लेकिन जब तक मां के प्यार का एहसास होने की उम्र आयी तो मां दुनिया छोड़ गयीं और फिर मां की याद और उनके प्यार की कमी दिल की रगों में दर्द बन कर उतरती रही। इसी जद्दोजहद में जावेद अख्तर एक मशहूर कलमकार बन गए।

फोटोः सोशल मीडिया
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इकबाल रिजवी

ये कहानी है जावेद अखतर की। उनके पिता मशहूर शायर और गीतकार जां निसार अख्तर थे। जबकी शायरी के मैदान में उनके दादा मुज्तर खैराबादी का कद भी बहुत ऊंचा था। जावेद के मामा मजाज भी मशहूर शायर थे, जबकि मां सफिया अख्तर उर्दू की लेखिका और शिक्षिका थीं। जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ था, जहां उनके पिता जां निसार अख्तर शिक्षक थे। कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों में सक्रीय रूप से हिस्सा लेने के सिलसिले में जां निसार अख्तर ने शिक्षक की नौकरी छोड़ दी। फिर वह मुंबई जा पहुंचे। मुंबई में वह पार्टी के काम, शायरी और शराब में इस तरह फंसे कि बच्चों और बीवी के पास पलट कर आने का मौका नहीं मिला।

जावेद पांच साल के थे और उनके बड़े भाई सलमान की उम्र आठ साल थी जब बाप का इंतजार कर रही उनकी मां का निधन हो गया। जावेद और उनके बड़े भाई की परवरिश लखनऊ, अलीगढ़ और भोपाल में हुई। फिर जां निसार अखतर ने दूसरी शादी कर ली। भोपाल में जावेद दोस्तों के भरोसे वक्त गुजारते रहे और जिंदगी के नए सबक भी सीखते रहे। फिर वह भी अच्छे भविष्य की तलाश में 1964 में मुंबई अपने पिता के पास जा पहुंचे। सौतली मां से निभ नहीं सकी इसलिए पिता के घर सिर्फ एक रात बिता कर उन्होंने खुद को मुंबई के फुटपाथों और दुकानों के बरामदों के हवाले कर दिया।

फिल्मों में काम की तलाश में जुटे जावेद को काम तो नहीं मिला लेकिन कमाल अमरोही स्टूडियो में राते गुजारने का मौका जरूर मिल गया। किसी तरह वे निर्देशक एस एम सागर की फिल्म ‘सरहदी लुटेरा’ में क्लैपर बॉय का काम पा गए। इस फिल्म के हीरो सलीम खान और हिरोइन हेलेन थीं। फिल्म निर्माण के दौरान सलीम खान और जावेद की गहरी छनने लगी। जावेद को इस फिल्म में कुछ संवाद लिखने का भी मौका मिला। फिल्म तो फ्लॉप हो गयी लेकिन सलीम और जावेद के रिश्ते बहुत मजबूत हो गए। सलीम खान को फिल्मों में मनचाहा काम नहीं मिल पा रहा था। उन्हें एहसास था कि वे लिख सकते हैं इसलिए जावेद से मुलाकात से पहले ही वे कहानियां लिखने लगे थे।

जावेद के साथ सलीम खान ने जोड़ी बना कर लिखना शुरू किया। फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ से शुरू कर इस जोड़ी ने एक के बाद एक 24 फिल्में लिखीं, जिनमें ‘जंजीर’, ‘दीवार’ और ‘शोले’ जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल थीं। फिल्म में संवाद की अधिकतर जिम्मेदारी जावेद के कंधों पर होती थी। उन्हें भोपाल में तंगहाली में बिताए दिन, मां की कमी और बाप के रहते ही अनाथों जैसा जीवन बिताने का दर्द भुलाए नहीं भूलता था। यही सब उनकी फिल्म लेखनी में भी उभरा। बेसहारा लेकिन उसूलों वाली मां और गरीबी में पला बेटा यह खास बात थी जो जावेद, सलीम के साथ मिल कर अपनी कहानियों में बार-बार दोहराते रहे।

उनका ‘दीवार’ का लिखा संवाद “मेरे पास मां है” और ‘त्रिशूल’ जैसी फिल्म में बाप के प्रति विद्रोही तेवर लिये नायक को गढ़ने में जावेद को शायद जरा सी भी मेहनत नहीं करनी पड़ी। यह सब तो एक तरह से उनकी जिंदगी में घट चुका था। बगावत को बार-बार पर्दे पर पेश कर एक तरह से जावेद खुद को दोहरा रहे थे। इसके अलावा सलीम-जावेद की लिखी फिल्मों में पर्दे पर एक ऐसी मां की छवि भी बार-बार प्रस्तुत होती रही, जो बेसहारा और गरीब है लेकिन खुद्दार है और उसके बच्चों से बढ़ कर दुनिया में और कुछ नहीं है। पर्दे पर कई बार निरूपा राय ने यह रोल निभाया।

इस दौरान निजी जीवन में जावेद को जिस सहारे की तलाश थी वह उन्हें हनी ईरानी के रूप में मिला। दोनों ने शादी कर ली और एक हसीन इत्तेफाक यह भी रहा कि दोनों का जन्म दिन 17 जनवरी को पड़ता है। मगर लंबे समय तक दोनों साथ-साथ जन्म दिन सेलिब्रेट नहीं कर सके। जिस तरह जावेद के पिता ने जिंदगी का सुकून दूसरी औरत में तलाश किया उसी तरह की घटना से जावेद को भी दो-चार होना पड़ा और दो बच्चों के बाप बनने के बाद उनका हनी ईरानी से अलगाव हो गया।

अलगाव की पीड़ा से उन्हें फिर गुजरना था तभी तो बड़े भाई की हैसियत रखने वाले सलीम खान से भी उन्हें अलग होना पड़ा। तब तक जावेद संवाद और स्क्रीन प्ले लिखने के अलावा शायरी भी करने लगे थे। और हां इस बीच जावेद ने शबाना आजमी से शादी कर ली थी।

शायरी तो उन्हें विरासत में मिली ही थी। सलीम से जोड़ी टूटने के बाद एक गीतकार की हैसियत से फिल्म ‘सिलसिला’ में जावेद अख्तर ने पहली बार गीत लिखे और छा गए। लेकिन उन्हें लग रहा था कि एक गीतकार की हैसियत से खुद को स्थापित करने के लिए उन्हें फिर से संघर्ष करना पड़ेगा। दूसरी ओर उन पर यह इलजाम भी लग रहा था कि सलीम-जावेद की जोड़ी में कहानी और लेखन का सारा कमाल तो सलीम खान का ही होता था।

लिहाजा जावेद ने अकेले फिल्म लिखने का जिम्मा उठाया और पहली फिल्म लिखी ‘बेताब’ (1983) इसके बाद जावेद स्क्रिप्ट राइटर और गीतकार के बीच का संतुलन साधते रहे, लेकिन उन्हें बेजोड़ सफलता मिली गीतकार के रूप में। उन्हें गीतकार की हैसियत से आठ बार और श्रेष्ठ स्क्रिप्ट राइटर की हैसियत से सात बार फिल्म फेयर का पुरस्कार मिला। उन्हें पांच बार राष्ट्रीय पुरस्कार से भी नवाजा गया। पद्मश्री और पद्मभूषण के साथ-साथ उन्हें राज्य सभा के मनोनीत सदस्य का सम्मान भी हासिल हुआ। शायर की हैसियत से उनके काव्य संग्रह ‘लावा’ को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।

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Published: 17 Jan 2019, 7:00 AM