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अगली बार मुंबई जाएं तो ‘भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय’ जरूर देखें, यहां दिखेगी सिनेमा के इतिहास की झलक

मुंबई में स्थित भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय सिनेमा की इस परंपरा के प्रति राष्ट्र की श्रद्धांजलि है। एक तीर्थ है। फिल्म दर्शक, प्रेमी, छात्र और अध्येता यहां भारतीय सिनेमा के इतिहास से परिचित हो सकते हैं।

फोटो सोशल मीडिया
फोटो सोशल मीडिया

अजय ब्रह्मात्मज

इसी साल जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुंबई में ‘भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय’ का उद्घाटन किया। इस संग्रहालय की योजना तो बहुत पहले बन गई थी, लेकिन केंद्रीय सरकारों की टालमटोल से इस पर धीमी गति से अमल हुआ। कई बार ऐसी खबरें भी आईं कि अब किसी और ढंग से इसे निर्मित किया जाएगा। यह बात भी चली कि इस संग्रहालय के लिए मुंबई के व्यस्त इलाकों में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाएगी, इसलिए मुमकिन है कि पुणे या किसी और शहर में इसे शिफ्ट कर दिया जाए। बहरहाल, पेडर रोड पर फिल्म्स डिवीजन के परिसर में एक नई इमारत और एक पुरानी इमारत को मिलाकर इसे शुरू कर दिया गया है। इसे श्याम बेनेगल और प्रसून जोशी की देखरेख में तैयार किया गया है।

भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय के मुंबई में स्थित होने का खास महत्व है। सभी जानते हैं कि 1897 में पहली बार मुंबई के वाटसन होटल में लुमिएर बंधु ने 19वीं सदी के महान आविष्कार चलती फिरती तस्वीरों का खास प्रदर्शन किया था। उस प्रदर्शन से देश के अनेक कला उद्यमियों को प्रेरणा मिली थी। उनमें से एक दादा साहब फाल्के भी थे। निजी प्रयासों से उन्होंने 1913 में भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ का निर्माण और प्रदर्शन किया। मुंबई में स्थित भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय सिनेमा की इस परंपरा के प्रति राष्ट्र की श्रद्धांजलि है। एक तीर्थ है। फिल्म दर्शक, प्रेमी, छात्र और अध्येता यहां भारतीय सिनेमा के इतिहास से परिचित हो सकते हैं। ऑडियो, वीडियो, मल्टीमीडिया, चित्रों और लिखित विवरण से यह संग्रहालय भारतीय सिनेमा के क्रमिक विकास की विस्तृत झांकी पेश करता है।

आप मुंबई दर्शन के लिए निकले हैं और हाजी अली और महालक्ष्मी मंदिर से हैंगिंग गार्डन के लिए पेडर रोड से जाते हैं, तो इसी रोड पर स्वर कोकिला लता मंगेशकर रहती हैं। उनके निवास से थोड़ा आगे बढ़ने पर फिल्म्स डिवीजन का परिसर है। फिल्म्स डिवीजन दशकों से न्यूज रील, डॉक्यूमेंट्री और फिल्में बना रहा है। भारतीय इतिहास की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों को सिलसिलेवार दर्ज करने के अलावा यह महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर फिल्में भी तैयार करता रहा है। यह देश में डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के आंदोलन का सक्रिय केंद्र रहा है। इसी परिसर में गुलशन महल है। 19वीं सदी से पहले की इस खूबसूरत इमारत में ही पहले फिल्म्स डिवीजन का कार्यालय था। अब यह प्राचीन इमारत राष्ट्रीय संग्रहालय को सौंप दी गई है। इसी परिसर में गुलशन महल के ठीक सामने राष्टीय संग्रहालय की आवश्यकता के मुताबिक आधुनिक सुविधाओं से लैस बहुमंजिली इमारत भी बनी है।

गुलशन महल में सबसे पहले भारतीय सिनेमा के आदि पुरुष दादा साहेब फाल्के की मूर्ति का दर्शन होता है। दो मंजिला इस इमारत में भारत में सिनेमा के आगमन और शुरुआत की झांकी है। दीवारों पर तस्वीरें सजी हैं। हर तस्वीर के नीचे अंग्रेजी और हिंदी में विवरण लिखे हैं। इस इमारत में भारतीय सिनेमा का टाइम लाइन देखा जा सकता है। ‘सिनेमा कम्स टू इंडिया’, ‘ओरिजिन ऑफ सिनेमा’, ‘एड्वेंट आफ साउंड’, ‘स्टूडियो एरा’, ‘इंपैक्ट ऑफ वर्ल्ड वॉर 2’ आदि सेक्शन है। इस इमारत के विभिन्न कक्षों से गुजरते हुए भारत में सिनेमा की शुरुआत की झलकियां मिल जाती हैं। बाहर गलियारे में निकलने पर बाएं से दाएं जा रही दीवार पर 1913 से लेकर 2013 तक की हर साल की एक चर्चित फिल्म का पोस्टर लगाया गया है। इसे ‘भारतीय सिनेमा की दीवार’ कहना उचित होगा। इस एक दीवार पर भारतीय सिनेमा पोस्टरों में दर्ज है।

चमत्कारी लालटेन से डिजिटल कैमरे तक के तकनीकी सफर में भारतीय सिनेमा ने विषय और अभिव्यक्ति के कई चरणों और आयामों को पार किया है। मूक सिनेमा से एनिमेशन और वीएफएक्स के दौर तक का सिनेमा का यह विकास अनेक बाधाओं और अड़चनों से भरा रहा है। इस संग्रहालय में घूमते हुए एहसास होता है कि हर दशक में कुछ सनकी और जिद्दी कला प्रेमियों ने सिनेमा की राह सुगम की। उन्हें कभी पर्याप्तम सरकारी और प्रशासनिक सहयोग और समर्थन नहीं मिला। केवल कुछ नया करने के उत्साह और दर्शकों को अधिकाधिक संतुष्ट करने की चाह और धुन ही उनकी मार्गदर्शक रही। इस संग्रहालय में उनकी उपलब्धियों को ही सहेजा गया है। उनकी उपलब्धियों के पीछे की कारुणिक कथा हृदय विदारक है। उन पर फोकस नहीं है।

यह संग्रहालय सभी उम्र के दर्शकों के लिए उपयोगी है। भारतीय समाज में सिनेमा की पैठ को देखते हुए इस संग्रहालय की महत्ता बढ़ जाती है। हमें अपने सिनेमा के इतिहास की विधिवत जानकारी होनी चाहिए। आज के दमकते सितारों की जीवन शैली की चकाचौंध से अलग यह संग्रहालय दर्शकों को अतीत के संघर्ष और प्रयत्नों की बानगी देता है।

पुणे स्थित राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय भारतीय सिनेमा के संरक्षण का महत्वपूर्ण कार्य दशकों से कर रहा है। 1964 में इसकी स्थापना हुई थी। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन चल रहा यह संग्रहालय सरकारी उदासीनता और कुशल निवेशकों की कमी से अपेक्षित योगदान और संरक्षण नहीं कर पा रहा है। दूसरे, देश में फिल्मों और फिल्मी दस्तावेजों के संरक्षण की जागरूकता भी नहीं है।

राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय मुख्य रूप से फिल्म अध्येताओं के लिए अधिक उपयोगी है, जो सिनेमा के गहन और विशेष शोध व अध्ययन में रुचि रखते हैं। इस लिहाज से सिनेमा का राष्ट्रीय संग्रहालय आम नागरिकों के लिए अधिक उपयोगी है। यहां वे सिनेमा के इतिहास की सचित्र झांकी देख सकते हैं। ऑडियो, वीडियो और मल्टीमीडिया सुविधाओं से वे हर युग की उपलब्धियों और प्रयोगों की जानकारी हासिल कर सकते हैं। उसे महसूस कर सकते हैं।

नई इमारत में फिलहाल चार मालों में सिनेमा से संबंधित दस्तावेजों और सामग्रियों का प्रदर्शन किया गया है। पहले माले पर महात्मा गांधी और भारतीय सिनेमा की चित्रमय झांकी है। कम लोग जानते हैं कि सिनेमा मीडियम में गांधी जी की कोई रुचि नहीं थी। गांधी जी फिल्में नहीं देखते थे। समाज और राजनीति के तमाम विषयों पर राय और टिप्पणी जाहिर करने वाले गांधी जी ने कभी सिनेमा पर कोई टिप्पणी नहीं की। उनके इस रवैये से आहत होकर ख्वाजा अहमद अब्बास ने उनसे चिट्ठी लिखकर निवेदन किया था कि वे सिनेमा मीडियम पर गौर करें। इस साल गांधी जी की 150वीं जयंती है। सिनेमा पर गांधी के प्रभाव का अध्ययन होना चाहिए।

दूसरे माले पर बाल स्टूडियो है। यहां बच्चों को समझाया गया कि सिनेमा में साउंड, लाइट, म्यूजिक, डबिंग, विजुअल इफेक्ट, आदि तकनीकी चीजें कैसे काम करती हैं। बच्चों के मनोरंजन के लिए कुछ इंटरएक्टिव काउंटर भी बने हैं। तीसरे माले पर सिनेमा के लिए जरूरी उपकरणों और साधनों के आविष्कार उपयोग और विकास का क्रमिक चित्रण है। इस माले पर उन महत्वपूर्ण व्यक्तियों और फिल्मों की भी जानकारी दी गई है, जिन्होंने तकनीकी विकास में खास योगदान किया और फिल्मों में उनका पहली बार इस्तेमाल किया। चौथे माले पर भारत में बन रहे सिनेमा के सभी विभागों में हुए परिवर्तनों की विस्तृत झलक है। कॉस्टयूम, मेकअप, कोरियोग्राफी, म्यूजिक, डांस, लोकेशन और प्रोडक्शन आदि में फिल्मकारों ने कब क्या जोड़ा और उसे कैसे दर्शकों के अनुकूल बनाया। मजेदार साक्ष्य के तौर पर चित्र सजाए गए हैं। लगातार ऑडियो और वीडियो भी चल रहा होता है।

सचमुच देश में और कहीं सिनेमा का ऐसा विशाल संग्रहालय नहीं है। हां, इसे और विस्तार देने की जरूरत है। खाली रह गए जगहों को भरना होगा जैसे कि आजादी के पहले लाहौर और कोलकाता में फिल्म निर्माण की गतिविधियों की जानकारी। आजादी के बाद देश की विभिन्न भाषाओं की फिल्मों के केन्द्रों का भी उचित उल्लेख होना चाहिए। यह भी कोशिश होनी चाहिए कि सभी राज्यों की राजधानियों में इस संग्रहालय के संक्षिप्त प्रदर्शनियां आयोजित हों। कभी भारतीय सिनेमा ट्रेन भी चलाई जा सकती है। चित्र और तथ्यों की गलतियों को सुधारने की भी जरूरत है। एक जगह कमाल अमरोही के विवरण के साथ निदा फाजली की तस्वीर लगा दी गई है।

इस राष्ट्रीय संग्रहालय का प्रवेश शुल्क केवल 20 रुपये है और विदेशियों के लिए 500 रुपये। बच्चों और छात्रों के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। यह संग्रहालय सोमवार को बंद रहता है। अगली बार मुंबई आएं, तो इस संग्रहालय के लिए भी समय जरूर निकालें।

पीआईबी ने इस संग्रहालय पर एक वीडियो भी बनाया है जिसे आप नीचे दिए लिंक में देख सकते हैं

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