अब सुनहरे पर्दे पर भी नजर आएंगे मोदी, फिल्म ‘मोदी का गांव’ को सेंसर बोर्ड से मिली हरी झंडी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलते जुलते एक किरदार की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘मोदी का गांव’ की रिलीज का रास्ता साफ हो गया है। सेसर बोर्ड ने फिल्म को अंतिम रूप से पास कर दिया है।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया
user

नवजीवन डेस्क

फिल्म 'मोदी का गांव' के रिलीज का रास्ता अब साफ हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलते जुलते एक पात्र की वजह से चर्चा में रही यह फिल्म अब बहुत जल्द पर्दे पर नजर आएगी। अस्पष्ट तौर पर पीएम मोदी के विकास के एजेंडे से प्रेरित इस फिल्म को आठ महीने बाद सेंसर बोर्ड ने अपनी मंजूरी दी है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने 22 नवंबर को फिल्म के निर्माता सुरेश के झा को सूचित किया कि फिल्म को प्रदर्शित करने की अनुमति प्रदान कर दी गई है। इस खबर से प्रसन्न झा ने कहा, "यह हमारे लिए बड़ी जीत है। फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण (एफसीएटी) ने सीबीएफसी की ओर से उठाए गए आपत्तिजनक बिंदुओं को खारिज कर दिया है और हमलोग अब दिसंबर के मध्य तक पूरे भारत में फिल्म का प्रदर्शन करने पर विचार कर रहे हैं।"

फरवरी में सीबीएफसी के तत्कालीन चेरयमैन पहलाज निहलाणी ने कई मुद्दों के आधार पर फिल्म को प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया था। उन्होंने निर्माता सुरेश के झा को बोर्ड का प्रमाणपत्र देने से पहले प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और चुनाव आयोग से अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्त करने को कहा था। निहलाणी ने फिल्म में उरी में हुए आतंकी हमले के संदर्भ में पीएम मोदी से मिलते-जुलते पात्र के भाषण और 'पप्पू' बिहारी नाम के चरित्र आदि को लेकर फिल्म को मंजूरी देने में अपनी अनिच्छा जाहिर की थी। फिल्म के निर्माता ने पीएमओ को इस संबंध में पत्र लिखा था, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने एफसीएटी का दरवाजा खटखटाया और सीबीएफसी के आदेश को चुनौती दी।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया
फिल्म ‘मोदी का गांव’ का एक और पोस्टर 

एफसीएटी ने 12 अक्टूबर को अपने आदेश में कहा कि फिल्म को पीएमओ या निर्वाचन आयोग की ओर से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की कोई जरूरत नहीं है। एफएसीटी ने कहा, "दोनों संदर्भो में प्रधानमंत्री या फिल्म में दिखाए गए चरित्र की बात का कोई कानूनी आधार नहीं है, इसलिए पीएमओ से अनापत्ति प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है।” एफसीएटी ने झा की इस दलील पर भी गौर किया कि भारत के कई हिस्सों में लोग बच्चों को प्यार से 'पप्पू' नाम से पुकारते हैं, जो बाद में बच्चे का नाम ही रह जाता है। पूर्व में इस नाम का प्रयोग बॉलीवुड फिल्म 'पप्पू कान्ट डांस साला' और एक विज्ञापन 'पप्पू पास हो गया' में होने के उदाहरण भी हैं।

एफसीएटी के इस आदेश के बाद फिल्म 'मोदी का गांव' सीबीएफसी के पास फिर से भेजी गई थी जिसे अंतिम रूप से अब हरी झंडी मिल गई है। झा ने बताया कि फिल्म में स्वच्छ भारत अभियान, स्मार्ट इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का जिक्र किया गया है। फिल्म में मुख्य पात्र मोदी की भूमिका में मुंबई के एक व्यवसायी हैं। वहीं टेलीविजन कलाकार चंद्रमणि एम और जेबा ए ने अन्य अहम किरदार निभाए हैं। 135 मिनट लंबी इस फिल्म का निर्देशन तुषार ए गोयल ने किया है।

लोकप्रिय
next