फिल्म वन्स अपॉन अ टाइम इन कलकत्ता: कहानी भव्य शहर के पराभव की

आदित्य विक्रम सेनगुप्ता की फिल्म ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन कलकत्ता’ में एक भव्य शहर के पराभव की व्यापक तस्वीर है।

फोटो : फिल्म पोस्टर
फोटो : फिल्म पोस्टर
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नम्रता जोशी

आदित्य विक्रम सेनगुप्ता की फिल्म ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन कलकत्ता’ में एक भव्य शहर के पराभव की व्यापक तस्वीर है। फिर भी यह फिल्म निरंतरता की भावना पर जोर देती है जो राजनीतिक, आर्थिक और बौद्धिक रूप से तथा स्थापत्य, कलात्मक एवं सांस्तिकृ क रूप से समकालीन कोलकाता को प्ररेित और आगे बढ़ाती है। यह ऐसे शहर का चित्र है जो ढह रहा है लेकिन अनिश्चित-सी नींव पर नए सिरे से निर्मित भी हो रहा है। इस तस्वीर में शहर अपने साथ चिरस्थायी अतीत, अराजक वर्तमान और कमजोर भविष्य को लिए हुए है। फिल्म में अलगाव और धैर्य की इसी तरह की समकालिकता व्यक्तियों और उनके संबंधों को भी रेखांकित करती है। जिस प्रकार एक दंपति जो अपने साझा नुकसान और दुःख के बावजूद अपने रिश्ते को चौराहे पर खड़ा पाते हों, भले ही वे एक छत के नीचे रहते हों लेकिन वे अपने को एक ही घर में बंटी अलग-अलग दीवारों के बीच पाते हैं। उनके बीच में अगर कोई संवाद रह जाता है तो वह बस चाबियों को लेने और देने का है। वे निराशा और खतरनाक रास्तों पर चाहे कितना भी संघर्ष कर लें लेकिन वे नई शुरूआत करने के लिए अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ़ जाते हैं।

जैसा कि सेनगुप्ता खुद कहते हैं कि यह कहानी जितना इस शहर के भौतिक पहलू, यानी उसके स्थानों, स्मारकों और उसके वास्तुशिल्प को खंगालने के बारे में है, उतनी ही यह लोगों और उनकी मनोदशा को जानने के बारे में भी है।

इस कहानी की शादी-शुदा जिंदगी की सड़ांध बहुत सारे अन्य किरदारों की आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक पतन से भी जुड़ी हुई है। इसमें दैनिक वतेनभोगी मजूदरों के पैसे और सपनों को चिटफंड घोटाले में लूटा जाता है और इसके कलेक्शन एजेंट खुद मासूम हैं क्योंकि उन्हें मालूम ही नहीं है कि वे अनजाने में ही एक शोषण की कड़ी का हिस्सा बन गए हैं। वास्तव में तो उनका भी फायदा ही उठाया जाता है। टीवी चैनलों पर आस्था बेची जाती है जिसमें कहा जाता है कि एक नग की सहायता से वे अपना भाग्य संवार सकते हैं। भ्रष्ट और लुटेरे बिल्डर शहर की बची-खुची खूबसूरत ऐतिहासिक शानों को विशाल मॉलों में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। और इसमें थिएटर की भूली-बिसरी संस्तिकृ की विरासत को संभाले हुए ऐसा झक्की व्यक्ति भी है जो इन सब के बीच अपना स्थान नहीं बना पा रहा है। भले ही वह उन लोगों के विश्वास के साथ दगाबाजी करता हो जो सदा से ही उसके लिए वफादार रहे हों।


फिल्म में दिखाई गई कई घटनाएं वास्तविक जिंदगी से ली गई हैं। इन्हें उन स्थानों पर फिल्माया गया है जहां सेनगुप्ता स्वयं गए हैं और वे जगहें उनके अनुभव संसार का हिस्सा रही हैं। उदाहरण के लिए, थिएटर वह जगह है जहां वह वर्षों से जाते रहे हैं। इस थिएटर के मालिक अमर घोष थे। उन्हें पर्दे पर बुबु के किरदार के रूप में दर्शाया गया है। इसे किरदार को कलाकार, निर्देशक, नाटककार और टीएमसी के नेता ब्रत्या बासु ने बहुत ही कुशलता के साथ निभाया है। सिनेमा के आगमन के बाद से इस थिएटर के बुरे दिन शुरू हो गए और बाद में इसे कैबरे के तमाशे के लिए इस्मतेाल किया गया। इसी तरह से फिल्म में चिटफंड घोटाला भी पुराने सारदा ग्रुप के पॉन्जी योजना से जुड़ा हुआ है। इस घोटाले का फंडाफोड़ 2013 में हुआ था।

सेनगुप्ता की ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन कलकत्ता’ फिल्म शब्दाडंबर से भरी हुई है, फिर भी यह अपने विशिष्ट दृश्यों के मामले में अनूठी है। फिल्मकार कोलकाता के स्थलों और ध्वनियों को एक अति-वास्तविक तरीके से कैद करता है। जैसे- फ्लाई ओवर, डायनासोर की मूर्तियां, मच्छरों का प्रकोप और उन्हें भगाने के लिए इस्मतेाल किया जाना वाला धुआं। विज्ञान केंद्र के बाहर लगी डायनासोर की मूर्तिवास्तव में उस व्यक्ति की छवि थी जिसने फिल्म की शुरुआत की और उसे एक व्यापक स्वरूप दिया। यह मूर्ति हमें इतनी स्पष्टता के साथ यह समझाती है कि कैसे कुछ चीजें जो एक समय में प्रासंगिक होती हैं, वे समय के बदलते ही अप्रासंगिक हो जाती हैं। इस फिल्म में बुबु उसी की मानवीय अभिव्यक्ति है। जैसा कि स्वयं सेनगुप्ता कहते हैं कि अब वह विलुप्त किरदार है। “वह मौजूदा इको-सिस्टम में जीवित नहीं रह सकता, उसे जाना ही होगा।”


इस फिल्म को जो अलग बनाता है, वह है फिल्मकार द्वारा किया गया स्थानीय तत्वों का इस्मतेाल। विशिष्ट रूप से सीढ़ियों और एलिवेटर तथा एक पुराने थिएटर में चलता- फिरता मंच जहां ऊपर-नीचे आ-जा रहे लोगों के साथ उसकी अपनी प्रतीकात्मक अनुगूंज होती है।

इस फिल्म को बनाते हुए सेनगुप्ता को जिस चीज में सबसे ज्यादा आनंद आया, वह है इसका संपादन। वह कहते हैं, “संपादन एक ऐसी जगह होती है जहां आप फिल्म को पुनः खोजते हो और उस पर लगातार काम कर सकते हो।” अपनी पहली फिल्म ‘लेबर ऑफ लव’ की तरह की उनकी तीसरी फिल्म ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन कलकत्ता’ भी वनिे स फिल्म समारोह का हिस्सा होने जा रही है। इसका प्रीमियर 7 सितंबर को होगा। सेनगुप्ता कहते हैं, “यह एक ऐसा समारोह है जिसने मुझे खोजा और मेरे काम तथा अभिव्यक्ति को मान्यता दी।”

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