समीक्षाः समाज में ‘मिसफिट’ होने के दर्द से जूझने वालों के दर्द को बयां करती है ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’

शुक्रवार को रिलीज हुई ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ में ‘सेम सेक्स’ रिश्तों के निजी नहीं बल्कि सामाजिक पहलू को दिखाने का साहस किया गया है। फिल्म इन रिश्तों के कई बहुत अहम् पहलुओं से जूझती है, जो हमारे समाज में वर्जित तो हैं लेकिन दबे-छिपे चलन में भी हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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प्रगति सक्सेना

साल 2017 में आई एक खूबसूरत फिल्म ‘कॉल मी बाई योर नेम’ ने हॉलीवुड में तहलका मचा दिया था। उसी तरह 2005 में आंग ली निर्देशित फिल्म ‘ब्रोकबैक माउंटेन’ ने दो मर्दों के बीच के संबंध को खूबसूरती से दर्शाया था और फिल्म इतनी चर्चित हुई कि आज भी जब सेम-सेक्स संबंधों पर फिल्मों की बात होती है तो एक मिसाल के तौर पर इसका नाम लिया जाता है।

अमूमन ‘सेम सेक्स’ संबंध जैसे संवेदनशील विषय पर हिंदी फिल्म देखने को नहीं मिलती। यहां ये जिक्र करना जरूरी है कि शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ का कथानक औरतों में ‘सेम सेक्स’ संबंधों पर आधारित है, मर्दों के बीच संबंधों पर नहीं। ये भी जिक्र करना जरूरी जान पड़ता है कि पिछले सालों में हिंदी सिनेमा में ऐसे संबंधों पर बात करने की कोशिश हुई है लेकिन मुझे कोई एक ऐसी सार्थक या मुख्यधारा की फिल्म याद नहीं पड़ती जिसमें मर्दों के बीच ऐसे रिश्तों को दर्शाया गया हो।

हां, एक फिल्म है, ‘अलीगढ’ लेकिन वह भी एक समलैंगिक प्रोफेसर की जिंदगी पर आधारित है, लेकिन उसके किसी ऐसे रिश्ते को खुलकर हाईलाइट नहीं करती। तो क्या ये भी हमारे ताकतवर पुरुष प्रधान समाज को ही बिंबित नहीं करता जो मर्दों के बीच रिश्तों को पुरुषों की कमजोरी समझता है? ये सवाल पूरी फिल्म के दौरान कौंधता रहा। खासकर तब जब फिल्म की मुख्य किरदार अपने रिश्ते के लिए पिता और भाई की मंजूरी के लिए अपनी खुशी दाव पर लगाने को तैयार हो जाती है।

इस फिल्म में सेम सेक्स रिश्तों के निजी नहीं बल्कि सामाजिक पहलू को दिखाने का साहस किया गया है। फिल्म इन रिश्तों के कई बहुत अहम् पहलुओं से जूझती है, जो हमारे समाज में वर्जित तो हैं लेकिन दबे-छिपे चलन में भी हैं। फिल्म की मुख्य किरदार स्वीटी की दुविधा ‘नार्मल’ है भी या नहीं- बहुत नाज़ुक तरीके से दिखाई गई है।

हालांकि विषय नया है और कोशिश साहसिक, लेकिन फिल्म इतनी धीमे चलती है कि उबाऊ हो जाती है। राजकुमार राव एक अच्छे अभिनेता हैं- यह तो साबित हो ही चुका है, लेकिन एक लेखक और नाटककार के रोल में बहुत सतही दीखते हैं, क्योंकि ये किरदार खुद में ही बहुत वास्तविक नहीं लगता। हां मगर सोनम कपूर काबिले तारीफ हैं इस बात के लिए कि उन्होंने ऐसा किरदार चुना। आम तौर पर हिंदी फिल्मों की अभिनेत्रियां अपनी इमेज को लेकर काफी सतर्क रहती हैं, लेकिन सोनम ने हर बार इमेज के परे जाकर अपने किरदार चुने हैं।

हालांकि सोनम एक औसत अभिनेत्री हैं। सोनम ने एक छोटे से शहर में शर्मीली और बेहद अकेली लड़की के किरदार को बहुत संवेदनशीलता से निभाया है जो अपने सेक्सुअल प्रेफेरेंस को लेकर बहुत सकुचाई रहती है और खुद को समाज में ‘मिसफिट’ समझती रहती है।

लेकिन अगर आप ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ से ‘ब्रोकबैक माउंटेन’ जैसी सुंदर और दिल छू जाने वाली फिल्म या ‘कॉल मी बाई योर नेम जैसी संगीतात्मक फिल्म की उम्मीद कर रहे हैं तो आपको बेहद निराशा होगी, क्योंकि शैली चोपड़ा धर के निर्देशन में बनी ये एक औसत फिल्म है।

फिल्म का संगीत भी काफी औसत है। अनिल कपूर, जूही चावला, सीमा पाहवा और मधुमालती कपूर इस नाज़ुक से विषय पर बनी फीकी सी फिल्म में कुछ मसाला जरूर जोड़ते हैं। लेकिन हां, आप उन लोगों का दर्द और दुविधा समझने के लिए ये फिल्म देख सकते हैं जो समाज के दबाव में जीवन भर एकाकी और ‘मिसफिट’ होने के दर्द से जूझते रहते हैं, वह भी महज इसलिए कि उनका सेक्सुअल प्रेफरेंस अलग है।

‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ एक ‘वर्जित’ और ‘असामान्य’ रिश्ते की बात करती है और मोटे तौर पर उन लड़कियों की उलझन और अकलेपन को दिखाती है जो समाज के डर से अपनी स्वाभाविक इच्छाओं और झुकाव को दबा लेती हैं और जीवन भर एक ऐसे इंसान के साथ रहने को अभिशप्त हैं जिसके प्रति उन्होंने कभी कोई शारीरिक या दिली आकर्षण महसूस ही नहीं किया। महज अपने कथानक की वजह से ही इस फिल्म को एक बार देखना तो बनता है।

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