फिल्म समीक्षा: सलमान खान, सेक्स और स्टंट से फिल्म बनाने की कोशिश है ‘रेस 3’

ऐसी दुनिया कहां है जहां बेशुमार पैसा है, शराब, सेक्स और हथियार हैं और सारे एक ही जैसे उबाऊ किरदार एक ही जगह पर हैं? यानी फिल्म पूरी तरह से आपको एक ऐसी ख्याली दुनिया में ले जाती है कि आपको एक हद के बाद कोफ़्त होने लगती है।

फोटो: सोशल मीडिया
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प्रगति सक्सेना

फिल्म की शुरुआत से ही ये ख्याल आपको खाने लगता है कि फिल्म निर्देशक आखिरकार कैसे इतने बड़े बजट में इतनी वाहियात फिल्म बना सकते हैं? फिल्म में सलमान खान और जैकलीन फ़र्नांडिज़ सुपरमैन और सुपरवुमन की तरह आसमान में उड़ते हुए एक एक्शन सीन में एंट्री लेते हैं।

इस फ्रेंचाइज की पहली दो फिल्मों को देखते हुए इस फिल्म से भी कोई ख़ास उम्मीद नहीं थी, और ये पहले से ही ज़ाहिर था कि फिल्म में दगा, दुष्टता, साजिश, सेक्स और स्टंट की भरमार होगी। लेकिन आज के दौर में जब हिंदी में कुछ अच्छी फिल्में बनायी जा रही हैं, और फिल्म निर्माता नए-नए विषयों को चुन रहे हैं, तो ज़रा सी उम्मीद थी कि शायद ये पहले की ‘रेस’ और ‘रेस 2’ से थोड़ी अलग हो।

बदकिस्मती से ‘रेस 3’ पहली दो फिल्मों से भी खराब है। ‘रेस’ और ‘रेस 2’ में अच्छा संगीत था और थोड़ा-बहुत सस्पेंस भी। लेकिन ‘रेस 3’ संगीत भी अच्छा नहीं है , कहानी भी ख़ास नहीं और संवाद लचर हैं। संवादों का नमूना देखें - 'आवर बिजनेस इज़ आवर बिज़नेस, नन ऑफ़ योर बिजनेस’ या फिर ‘कैसे मिली कब मिली, ये पूछने का न तो तुम्हे कोई हक है न कोई अधिकार...’,अब क्या हमें ये मान लेना चाहिए कि हिंदी फिल्म निर्देशकों को हिंदी आती ही नहीं क्योंकि ‘हक’ और‘अधिकार’ का मतलब तो एक ही होता है।

और वैसे भी, ये फिल्म किस दुनिया की बात कर रही है - ऐसी दुनिया कहां है जहां बेशुमार पैसा है, शराब, सेक्स और हथियार हैं और सारे एक ही जैसे उबाऊ किरदार एक ही जगह पर हों? यानी फिल्म पूरी तरह से आपको एक ऐसी ख्याली दुनिया में ले जाती है कि आपको एक हद के बाद कोफ़्त होने लगती है।

फिल्म की कहानी (अगर है तो) शमशेर सिंह (अनिल कपूर) के परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है जो इलाहाबाद के हंडिया जिले में हथियार बनाता है। उस पर आतंकवादियों को गैर-कानूनी ढंग से हथियार सप्लाई करने का झूठा इलज़ाम लगता है तो वह भारत छोड़ कर अल शिफा द्वीप पर बस जाता है और वहीं पर अपना हथियार बनाने का कारोबार शुरू कर देता है। वह हर गैर-कानूनी काम करता है लेकिन अपने देश में खुद को निर्दोष साबित कर वापिस हंडिया जाना चाहता है।

उसके जुड़वां बच्चों सूरज (साकिब सलीम), संजू (डेज़ी शाह) और चचेरे भाई सिकंदर (सलमान खान) के बीच पारिवारिक झगड़े, प्रॉपर्टी को लेकर खींचतान और साज़िश का सिलसिला शुरू होता है। बीच में सिकंदर का वफादार यश (बॉबी देओल) भी शामिल हो जाता है। आगे की कहानी में बहुत से तोड़-मोड़ आते हैं, जिनकी अब तक दर्शकों को आदत हो चुकी है।

फिल्म में एक्टिंग की कोई ख़ास गुंजाईश नहीं है, न ही अभिनेता एक्टिंग के मूड में लगते हैं। डेज़ी शाह से अभिनय की उम्मीद करना बेकार है। साकिब सलीम को ये बताया जाना चाहिए कि मसल्स वगैरह बना कर एक फिल्म तो पायी जा सकती है, लेकिन अच्छा शरीर अभिनय के हुनर का विकल्प नहीं है। जैकलीन ने कभी अभिनय किया ही नहीं और न ही उनमें कोई सुधार नज़र आता है। वे संवाद ऐसे बोलती हैं मानो भाषा पर एहसान कर रही हों। ऐसा लगता है जैसे सलमान भी बेमन से अभिनय कर रहे हों। बॉबी देओल के बारे में कोई ख़ास बात नहीं कही जा सकती। और अनिल कपूर जैसे काबिल अभिनेता का टैलेंट बेकार हुआ है।

अब वक्त आ गया है कि सलमान खान फिल्मों और किरदारों के चयन को गंभीरता से लें। बेशक वे फिलहाल बहुत लोकप्रिय हैं, लेकिन अगर वे बिना सोचे समझे फ़िल्में करेंगे तो यह लम्बे वक्त तक नहीं चलेगा।

फिल्म में चंद बातें हैं जो दर्शकों (खासकर सलमान के फैन्स को) पसंद आएंगी। मसलन, जैकलीन का पोल डांस ‘एक बार सेल्फिश होकर देखो ना..’ गाने की कोरिओग्राफी। एक अरसे बाद एक छोटे से रोल में मिलिंद गुनाजी और फिल्म के क्लाइमेक्स में सलमान और बॉबी दोनों का अपनी टीशर्ट फाड़ कर आकर्षक देह का प्रदर्शन। लेकिन दुखद ये है कि ये सब बातें मिलाकर एक अच्छी फिल्म नहीं बनाई जा सकती।

आखिर तक आते-आते आपको शानदार जगहों पर आलीशान कारों को टकराते, टूटते और जलते और गैर-ज़रूरी स्टंट देख कर कोफ़्त होने लगती है। तमाम धायं-धायं और बॉक्सिंग वगैरह के बीच फिर ये सवाल पीछा करने लगता है कि इतना पैसा, वक्त और मेहनत बर्बाद करने की बजाय फिल्म निर्माता कुछ दिमाग और रचनात्मकता का इस्तेमाल ही कर सकते थे। फिल्म बनाना आख़िरकार एक रचनात्मक प्रक्रिया ही तो है।

फिल्म के बारे में संक्षेप में उसी के एक संवाद के ज़रिये बताया जा सकता है - ‘क्या करें, बेवकूफी का कोई इलाज नहीं है!’

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Published: 16 Jun 2018, 8:35 AM