होली आई रे कन्हाई.. से होली खेंलें रघुबीरा.. तक, फिल्मी होली के वो गीत जो आज भी मस्ती से भर देते हैं

नब्बे के दश्क से फिल्मी पर्दे पर होली के रंग कम होने लगे। कई साल तक तो फिल्मों ने होली का कोई यादगार गीत ही नहीं दिया। सच ये है कि अब समाज में होली का त्योहार ही अपना जोश खोता जा रहा है। क्योंकि होली के लिए रंगों से ज्यादा दिलों में जगह की जरूरत होती है।

फोटोः वीडियोग्रैब
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इकबाल रिजवी

होली का खुमार चढ़ते ही हिंदुस्तान की फ़िज़ाओं में एक गीत गूंजने लगता है “ होली आयी रे कन्हाई रंग छलके – सुना दे ज़रा बांसुरी...“ ये गीत 1957 में रिलीज़ हुई हिंदी सिनेमा की कालजयी फिल्म मदर इंडिया का है। तब भारत ऐसा देश हुआ करता था जहां हिंदु मुस्लिम संस्कृतियों के मेल से पनपा समाज एक दूसरे समुदाय को लेकर गहरा लगाव रखता था। तब विकृत इतिहास की कक्षाएं व्हाट्सअप यूनीवर्सिटी पर नहीं चली थीं।

इसलिए होली का सर्वाधिक लोकप्रिय सिनेमाई गीत उस तरह की टीम द्वारा रचा गया जिसकी अब कल्पना मुश्किल है। मदर इंडिया के निर्देशक थे महबूब, संगीतकार नौशाद, गीतकार शकील बदायूंनी और इस गीत को गाया शमशाद बेगम ने। वैसे कोरस में मोहम्मद रफी, मन्ना डे, लता मंगेशकर आदि भी थे। महबूब-नौशाद-शकील-शमशाद ने मिल कर ऐसी रचना तैयार की कि इस गीत के 65 साल के सफर के दौरान कई पीढ़ियां इस गीत को सुन-सुन कर होली को गुलज़ार बनाती रहीं हैं।

फिल्म के निर्माता-निर्देशक महबूब ने इस गीत के फिल्मांकन में भी कलात्मकता और परंपराओं को बखूबी उकेरा है। गीत के सेट में शिव की बड़ी सी मूर्ति है और वहां गांव के लोग होली की मस्ती में सराबोर हैं। इस गीत में जहां सुनील दत्त का गुस्सैल और राजेंद्र कुमार का मुस्कुराता चेहरा दिखता है, वहीं फ्लैशबैक में जाती नरगिस और राजकुमार की जोड़ी पर सादगी भरे प्रणय को होली के बहाने सामने रखा गया है।

(नीचे दिया गया वीडियो इसी गीत का है, जोकि इरोज नाउ म्यूजिक के यूट्यूब चैनल से लिया गया है)


हालांकि बोलते सिनेमा के करीब 91 साल के काल में सिनेमा के पर्दे और होली के गीतों का बहुत मज़बूत, लंबा और रंगीन रिश्ता रहा है। 1931 में भारत में फिल्मों ने बोलना शुरू किया और 1932 में आयी फिल्म ‘गुलरू ज़रीना’ में होली का पहला गीत शामिल हो गया। गीत के बोल थे ‘होरी मुझे खेलन को टेसू मंगा दे’ जिसे संगीत बद्ध किया था संगीतकार बृजलाल वर्मा ने। इसके बाद धीरे-धीरे होली के गीत पर्दे पर अपनी जगह बनाने लगे।

1938 में ए आर कारदार फिल्म बागबान बना रहे थे। अभिनेता नजीर के साथ सितारा देवी का फिल्म में अहम रोल था। कारदार सितार देवी के नृत्य का पर्दे पर इस्तमाल करना चाह रहे थे। बचपन से बनारस की होली में हंगामा मचाने वाली सितारा ने कारदार को राय दी कि फिल्म में होली का कोई गीत शामिल कर लें। कारदार ने ऐसा ही किया। संगीतकार मुश्ताक हुसैन ने “होरी खेलो, होरी खेलो रे श्याम” गीत को तैयार किया जिसे विमला कुमारी के साथ सितारा ने गाया भी और अभिनय भी किया।

हिंदी सिनेमा का यह वह दौर था जब फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट बना करती थीं। इसी मुद्दे पर फिल्म जीवन प्रभात (1937) में निर्दशक फ्रैंज ऑस्टन और अभिनेता किशोर साहू में होली के गीत को लेकर लंबी बहस चली। इस फिल्म में “होली आई रे कान्हा” बोल वाला गीत शामिल किया जाना था, लेकिन निर्देशक फ्रेंज ऑस्टन का कहना था कि ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म में होली के रंगों की छटा पर्दे पर नहीं दिखायी जा सकती, जबकि किशोर साहू का कहना था कि गीत के जरिये दर्शक होली की मस्ती को तो महसूस करेंगे। आखिरकार जीत किशोर साहू की हुई और फिल्मों की प्रथम महिला संगीतकार मानी जाने वाली सरस्वती देवी ने गीत को संगीतबद्ध किया।

1940 आते आते फिल्मों में होली के त्योहार को किसी भी भारतीय त्योहार से अधिक अहमियत मिलने लगी थी। हर साल होली को लेकर फिल्मों में तीन से चार गीत आने लगे। फिल्म कटी पतंग का गीत (1971) आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली खेलेंगे हम होली, फिल्म ज़ख्मी (1975) आली रे आली रे आली रे होली आयी मस्तानो की टोली, राजपूत (1982) का होली गीत भागी रे भागी रे बृजबाला कान्हा ने पकड़ा रंग डाला सहित होली के गीतों की एक लंबी श्रृंखला है जो बरसों से होली के त्योहार को मस्ती से सराबोर कर देते हैं।


फिल्मकारों ने पर्दे पर सिर्फ होली दिखाने के लिये ही गीत नहीं रचे बल्कि होली के गीतों को फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया। सुपर हिट फिल्म ' शोले ' में डायरेक्टर रमेश सिप्पी ने स्क्रिप्ट का ताना-बाना ऐसा बुना कि बदले की भावना से भरा हुआ गब्बर रामगढ़ में होली के दिन ही हमला करता है और हमले से पहले गीत के जरिये देर तक होली का खुमार, छेड़-छाड़ और रंग पर्दे पर बिखरते रहे। ये गीत होली के यादगार गीतों में से एक बन गया।

फिल्म सिलसिला (1976) में दो शादी शुदा प्रेमियों के रिश्ते को सार्वजनिक रूप से दिखाना था। फिल्म की कहानी के मुताबिक दो प्रेमियों की भावनाओं को सांकेतिक रूप से रेखांकित करने के लिए फिल्म में होली खेलने की सिचुएशन और गीत का शानदार इस्तेमाल किया गया। और भारतीय सिनेमा को “रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे” जैसा होली का गीत मिला। अमिताभ बच्चन की ही एक और फिल्म बाग़बान में उनकी ही आवाज़ में एक और गीत भी होली के दिन बजना अनिवार्य सा हो गया है। ये गीते है “होली खेंलें रघुबीरा अवध में होली खेलें रघुबीरा”।

लेकिन नब्बे के दश्क से फिल्मी पर्दे पर होली के रंग कम होने लगे। और कई साल तक तो फिल्मों ने होली का कोई यादगार गीत ही नहीं दिया। पिछले दो दश्कों में 'ये जवानी है दीवानी' फिल्म का गीत “बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी” और फिल्म बदरी की दुल्हनिया का गीत “खेलन क्यों ना जाए तू होरी रे रसिया” ही लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच सके।

एक सच्चाई ये भी है कि अब समाज में होली का त्योहार ही अपना जोश खोता जा रहा है। क्योंकि होली के लिए रंगों से ज्यादा दिलों में जगह की जरूरत होती है। लोग अपने में सिमटते जा रहे हैं। इसलिये होली की मस्ती के अवसर भी सिमट गए हैं, जिसकी गवाही फिल्मी पर्दा भी दे रहा है। ऐसे में महबूब, नौशाद, शकील और शमशाद बेगम की चौकड़ी भी होती तो क्या कर लेती!

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