कोरोना: ‘कंटेजियन’ और ‘वायरस’ से क्या कोई सीख मिली, वैसे तो पूरा देश सिर्फ दर्शक ही बना हुआ है

आखिर, हम महामारियों की फिल्में क्यों देखते हैं? सामान्य दिनों में तो ऐसी फिल्मों में थ्रिलर जैसा रोमांच होता है। किरदारों का डर दशकों में रोमांचक स्फुरण पैदा करता है। वास्तव में यह एक प्रकार का विरेचन है जो दर्शकों को उनके दैनंदिन तनाव से मुक्त करता है।

फोटो : सोशल मीडिया
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अजय ब्रह्मात्मज

इस लॉकडाउन में आम लोग ही नहीं, पूरा देश सिर्फ दर्शक बनकर रह गया है। दर्शक क्या देखें? सरकार ने तय किया है कि सभी ‘रामायण’ देखें। भक्ति, श्रद्धा और सबूरी की तंद्रा में रहें। कोई सवाल न करे। किसी बदइंतजामी के बारे में कोई न पूछे। सरकार के फैसले एक तरफ...ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के जरिये बड़ी संख्या में एक तबका महामारी, आपदा और विभीषिका से संबंधित फिल्में देख रहा है।

विदेशों में ऐसी फिल्मों की लंबी परंपरा रही है। उन्होंने अपने देश और महाद्वीप की विभीषिकाओं पर उल्लेखनीय फिल्मों का निर्माण किया है। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध पर अलग-अलग दृष्टिकोण से विभिन्न प्रसंगों को लेकर अभी तक फिल्में आती रही हैं। हॉलीवुड के कुछ प्रयोगशील फिल्मकारों ने महामारी और विभीषिकाओं की संभावनाओं और परिणामों को लेकर भी फिल्में बनाईं। इनमें उनके साम्राज्यवादी और नस्लवादी मनोवृत्ति भी जाहिर होती रही है।

अमेरिका और उसके पिट्ठू देशों के कई फिल्मकार तारक और उद्धारक की भूमिका में नजर आते हैं। उनके लिए अफ्रीका और एशिया महाद्वीप के नागरिक सभ्यता के निचले पायदान पर खड़े हैं और वे दुनिया की प्रगति को अपनी जीवन शैली, अंधविश्वास और मान्यताओं से पीछे खींचते रहते हैं। दरअसल, इन फिल्मों में वे पिछड़े देशों का मखौल उड़ाते हैं। वहीं कुछ फिल्मकारों ने तकनीक, विज्ञान और आधुनिक जीवनशैली के विरोधाभास और विडंबनाओं को लेकर सार्थक फिल्में बनाई हैं। विश्वयुद्ध के प्रसंगों में भी उन्होंने गुनाहगार देशों और नेताओं को माफ नहीं किया। खुद पर और मित्र देशों पर उंगलियां उठाईं।

उन्होंने विश्वयुद्ध के दौरान लिए गए सही प्रतीत हो रहे फैसलों के मानव विरोधी परिणामों का भी जिक्र किया है। महामारियों की बात करें तो फिलहाल चर्चित ‘कंटेजियन 11’ के अलावा ‘आउटब्रेक’, चिल्ड्रेन ऑफमेन’, ‘द सेवेंथ सील’, ‘28 डेज लेटर’, ‘12 मंकीज’, ‘ट्रेन टु बुशन’, ‘93 डेज’ अदि फिल्मों को देखा जा सकता है। इनमें से कुछ सच्ची घटनाओं का काल्पनिक विस्तार हैं तो कुछ कपोल कल्पना हैं। बाइबिल की मान्यताओं और धारणाओं पर भी उनकी कथाएं बुनी गई हैं। इस संदर्भ में हम अन्य विधाओं की हैरत अंगेज फिल्मों को शामिल नहीं कर रहे हैं।

भारत में भी हिंदी समेत सभी भाषाओं में इन महामारियों की फिल्में बनती रही हैं। पिछले साल आई ‘वायरस’ इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय फिल्म है। इस फिल्म को केरल में फैले नीपा वायरस की सच्ची घटनाओं के आधार पर बनाया गया है। भारत में ‘राइज ऑफ जोंबी’, ‘अजान’, ‘गो गोवा गोन’, ‘आई’, ‘दसावतारम’ और ‘घोस्ट स्टोरीज’ आदि फिल्मों का जिक्र किया जा सकता है।

आखिर, हम महामारियों की फिल्में क्यों देखते हैं? सामान्य दिनों में तो ऐसी फिल्मों में थ्रिलर जैसा रोमांच होता है। किरदारों का डर दशकों में रोमांचक स्फुरण पैदा करता है। वास्तव में यह एक प्रकार का विरेचन है जो दर्शकों को उनके दैनंदिन तनाव से मुक्त करता है। और फिर पिछले कुछ दशकों में युवा दर्शकों का ऐसा समूह तैयार हुआ है जो फिल्मों के नियमित कहानियों से ऊब चुका है। वह वैसी कल्पनाओं और भविष्य की संभावनाओं में यकीन करता है। सामान्य दर्शक भविष्य के गर्भ में छिपे भूचालों का अनुमान नहीं लगा सकते। उन्हें ऐसी फिल्में झन्नाटेदार उद्रेक देती हैं। इससे अलग आज के माहौल में ऐसी फिल्मों की बढ़ती दर्शकता का भी तर्क है।

एक समूह कहता है कि महामारियों की फिल्में देखकर दर्शक खुद को सचेत और तैयार कर सकते हैं। सलाह और सूचनाओं में निर्देश और जानकारी जरूर रहती है लेकिन जब ऐसी स्थिति में फंसे किरदारों को हम देखते हैं तो उसके साथ एकाकार हो जाते हैं। फिर हम अपने बचाव की मानसिक तैयारी करने लगते हैं। महामारी भावनात्मक उधेड़बुन और असमंजस का समय होता है। उनसे राहत के लिए भी ऐसी फिल्में देखी जाती हैं।

हम यहां भारत में देखी जा रही ‘कंटेजियन’ और ‘वायरस’ की विस्तृत चर्चा करेंगे। 2011 में आई ‘कंटेजियन’ भारत समेत पूरी दुनिया में देखी जा रही है। स्टीवन सोडरबर्ग की इस फिल्म में बेथ एब्फोम वायरस की पहली शिकार होती है। वह हांगकांग- मकाओ से शिकागो में रुकती हुई अपने शहर पहुंचती है। शहर पहुंचने के साथ ही उसे दौरा पड़ता है। वह बेहोश हो जाती है। जल्दबाजी में उसका पति उसे अस्पताल पहुंचाता है मगर डॉक्टर उसे बचा नहीं पाते। पति अस्पताल से घर के रास्ते में है तो उसे पता चलता है कि बेटे को भी दौरा पड़ रहा है। वह जल्दी से घर पहुंचता है, लेकिन तब तक बेटा गुजर चुका है। डॉक्टर पति को आइसोलेशन में क्वॉरेंटाइन के लिए रख लेते हैं। वह अपनी बेटी से भी नहीं मिल पाता है लेकिन वह इसे अपना सौभाग्य मानता है कि बेटी उस समय घर पर नहीं थी।

यहां से तहकीकात शुरू होती है। अमेरिका की एजेंसियां वायरस के क्लस्टर और इंडेक्स रोगी की खोज में लगते हैं। साथ ही वैक्सीन बनाने की भी तैयारी चलती है। फिल्म में कई अंतर्कथाएं भी हैं। परस्पर संबंधों के पेच हैं। अमीर दशों की साजिशें भी हैं। यह फिल्म अपने निहित पूर्वाग्रह के बावजूद दर्शकों को महामारी से आगाह करती है।

अभी बहस चल रही है कि इस फिल्म के पूर्वानुमानों पर अमेरिका और अन्य देशों ने समय से ध्यान दिया होता और उचित तैयारी की होती तो दुनिया में यह महामारी इस भयंकर तरीके से नहीं फैलती। ‘कंटेजियन’ में बीमारी का स्रोत ‘गलत समय पर एक गलत चमगादड़ और गलत सुअर के संयोग’ से इस वायरस का जन्म होता है। वह बेथ एम्बोफ के प्लेट में सज कर आता है। फिर उसके जरिये महामारी अमेरिका पहुंचती हैं। विडंबना देखें कि इस फिल्म के मेडिकल सलाहकार डॉ डब्ल्यू जॉन लिप्किन स्वयं कोरोना वायरस के शिकार हो गए हैं। वह पॉजिटिव पाए गए हैं। इस फिल्म के कलाकार अभी कोरोना वायरस के बचाव के जरूरी उपाय बता रहे हैं।

भारत में 2019 में बनी आशिक आबू की फिल्म ‘वायरस’ भारतीय दर्शकों के अधिक करीब है लेकिन भाषाई भिन्नता से बनी स्वाभाविक दूरी के कारण हिंदी के दर्शकों ने यह फिल्म नहीं देखी है। इस फिल्म में केरल के कोट्टयम के पास एक कसबे में पहला रोगी संक्रमण का शिकार होता है। वहां एक नर्स संक्रमित होती है। जिला अस्पताल में आने के बाद उस नर्स के साथ अन्य मरीज भी संक्रमण के शिकार होते हैं। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक टीम रोगियों के उपचार के साथ संक्रमण के क्लस्टर और इंडेक्स रोगी की तलाश में जुटे हैं। तमाम संक्रमित रोगियों के संपर्क में आए व्यक्तियों को सावधान किया जाता है। इस पड़ताल और पूछताछ में दूसरी अंतर्कथाएं भी प्रकट होती हैं जो मानव स्वभाव के विभिन्न पहलुओं को चित्रित करती हैं।

‘वायरस’ 2018 में केरल में हुए नीपा वायरस के प्रकोप को लेकर बनी फिल्महै। इसमें नर्स का किरदार वास्तविक घटनाओं से लिया गया है। बाकी किरदार फिल्म की जरूरत और विषय के विस्तार की मांग से जोड़े गए हैं। यह फिल्म स्वास्थ्य कर्मियों की कर्मठता, प्रतिबद्धता और समर्पण को भी जाहिर करती है। टीम भावना से कैसे एक प्रकोप को काबू में किया गया। इसके क्लाइमेक्स में स्वास्थ्य मंत्री हृदयस्पर्शी बात कहती हैं कि ज्यादातर संक्रमण दूसरों की मदद की वजह से हुए।

‘कंटेजियन’ और ‘वायरस’- दोनों फिल्मों को देखने से हम इस ‘वायरस’ जनित महामारी के प्रकोप को समझ सकेंगे और अभी बढ़ती जा रही लापरवाही से बच सकेंगे। हमें नहीं मालूम कि अपनी जड़ों की तरफ प्रयाण कर रहे हजारों मजदूरों में से कितने संक्रमित होकर अपने गांव लौट रहे हैं। यह भारी संकट और विपदा का समय है। अतिरिक्त सावधानी और लॉकडाउन के संपूर्ण पालन से ही मुमकिन बचाव किया जा सकता है।

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