महिला प्रधान फिल्मों में बढ़ी है दर्शकों की दिलचस्पी, आने वाले दिनों में पर्दे पर दिखेंगी कई रीयल लाइफ स्टार्स

इन दिनों महिला चरित्रों को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मों के प्रति दर्शक खासा उत्साह दिखा रहे हैं। हिंदी सिनेमा में लंबे समय से महिला चरित्रों पर केंद्रित फिल्में बनती रही हैं, लेकिन उन्हें कभी बायोपिक या महिला प्रधान फिल्म के तौर पर प्रचारित नहीं किया गया।

फोटोः सोशल मीडिया
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अजय ब्रह्मात्मज

हाल-फिलहाल में महिला चरित्रों को केंद्र में रखकर बनी फिल्मों के प्रति दर्शकों ने उत्साह दिखाया है। कभी काल्पनिक तो कभी वास्तविक महिला चरित्रों की कहानी दिलचस्प होती है। पिछले साल आई कंगना रनोट की फिल्म ‘मणिकर्णिका’ ऐतिहासिहक चरित्र महारानी लक्ष्मी बाई पर आधारित थी और तापसी पन्नू तथा भूमि पेडणेकर की फिल्म ‘सांड की आंख’ निशानेबाज प्रकाश और चंद्रो तोमर के संघर्ष और विजय को लेकर बनी थी। इन दोनों फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षाकृत ढंग का व्यवसाय किया। इनकी सराहना भी हुई।

इस साल फरवरी में रिलीज हुई दीपिका पादुकोण की ‘छपाक’ एसिड अटैक की शिकार और सरवाइवर लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन से प्रेरित प्रेरणास्पद फिल्म थी। जेएनयू हिंसा के विरोध में चल रही सभा में दीपिका के जाने से ‘छपाक’ का विरोध और विवाद हुआ था। फिर भी यह फिल्म चर्चा में रही और दर्शकों को पसंद आई।

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय से महिला चरित्रों को केंद्र में रखकर फिल्में बनती रही हैं। उन्हें कभी बायोपिक या महिला प्रधान फिल्म के तौर पर प्रचारित नहीं किया जाता था। इन फिल्मों में कुछ ऐतिहासिक और कुछ मिथकीय संदर्भ की महिलाएं होती थीं। ऐतिहासिक चरित्रों से हम सभी वाकिफ हैं। मिथकीय देवियों और लोकप्रचलित कथाओं पर आधारित ‘सती’ सीरीज की अनेक फिल्मों का उल्लेख किया जा सकता है। इन फिल्मों में महिला चरित्रों के संघर्ष के साथ उनकी नैतिकता, पवित्रता, सतीत्व और सेवा भाव पर अधिक जोर रहता था।

अभी पलट कर देखें तो इनमें से अधिकांश फिल्में रूढ़िवादी प्रतीत होंगी, लेकिन महिलाओं की महिमा के बखान की इन कहानियों का तब सामाजिक संदर्भ होता था। गांव-देहात और कस्बों के दर्शक इन फिल्मों को खूब देखते थे। दर्शकों में महिलाओं का प्रतिशत भी अच्छा रहता था। अब ऐसी फिल्में बिलकुल नहीं बनतीं।

आधुनिक महिला चरित्रों पर केंद्रित फिल्मों की शुरुआत शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ से मान सकते हैं। साल 1994 में आई इस फिल्म में फूलन देवी की कहानी थी। चंबल इलाके की फूलन दलित समुदाय की महिला थी। शोषण और बलात्कार से पीड़ित होकर वह चंबल की घाटियों में चली गई थी। उसने अपना एक गैंग बनाया और गांव के ठाकुरों से हिंसात्मक बदला लिया। शेखर कपूर ने ‘बैंडिट क्वीन’ में फूलन देवी का रियलिस्ट चित्रण किया था, जिसे सीमा विस्वास ने बखूबी निभाया था। इस फिल्म को उस साल सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। ‘बैंडिट क्वीन’ के बाद दस्यु सुंदरियों पर अनेक फिल्में आईं, लेकिन उनमें से कोई भी भाव और प्रभाव के लिहाज से उस स्तर तक नहीं पहुंच सकीं।

‘बैंडिट क्वीन’ की रिलीज के ठीक बाद हिंदी फिल्में शहरी फैमिली मेलोड्रामा के भंवरजाल में उलझ कर विदेशों की धरती पर पहुंच गईं। आप्रवासी भारतीयों के लिए डॉलर सिनेमा का चलन बढ़ गया। महिला चरित्र के प्रति रुझान का नया सिलसिला 2011 से आरंभ होता है। सन 2011 में विद्या बालन अभिनीत ‘द डर्टी पिक्चर’ आई थी। यह फिल्म दक्षिण की अभिनेत्री सिल्क स्मिता के जीवन पर आधारित कही जाती है। हालांकि निर्देशक मिलन लूथरिया ने कभी ऐसा दावा नहीं किया, क्योंकि ‘द डर्टी पिक्चर’ सिल्क स्मिता समेत अनेक चर्चित और विवादास्पद अभिनेत्रियों के जीवन के रेशे लेकर बुनी गई थी।

‘द डर्टी पिक्चर’ की कामयाबी ने हिंदी में महिला प्रधान फिल्मों की जमीन और दिशा तय की। उसके बाद देश में विख्यात महिला चरित्रों को लेकर फिल्म बनाने के अनेक प्रयास हुए। किसी समय इंदिरा गांधी पर भी बायोपिक बनाने की घोषणा हुई थी। अभी मनीष गुप्ता उनकी बायोपिक के प्रयास में जुटे हैं। फिल्म शुरू करने के पहले वह कानूनी अड़चनों को निपटाने और संबंधित व्यक्तियों से सहमति जुटाने में लगे हैं।

पिछले कुछ सालों में महिला चरित्रों पर आधारित फिल्मों को याद करें तो इनमें प्रियंका चोपड़ा अभिनीत ‘मैरी कॉम’, सोनम कपूर की ‘नीरजा’ और ऐश्वर्या राय की ‘सरबजीत’ का उल्लेख करना पड़ेगा। अलग-अलग स्तर पर तीनों फिल्मों ने दर्शकों को प्रभावित किया था। बीच में श्रद्धा कपूर की फिल्म ‘हसीना’ आई, लेकिन दर्शकों ने उसे नोटिस नहीं किया।

अब अगर इस साल और आगे आने वाली फिल्मों का जिक्र करें तो सबसे पहले जान्हवी कपूर की ‘गुंजन सक्सेनाः द कारगिल गर्ल’ रिलीज होगी। यह देश की पहली महिला पायलट की साहसी कथा है, जिसने कारगिल युद्ध के समय लड़ाकू विमान उड़ाया था। शरण शर्मा निर्देशित इस फिल्म का निर्माण धर्मा प्रोडक्शन ने किया है। यह अगले महीने 24 अप्रैल को रिलीज होगी। विद्या बालन की ‘शकुंतला देवीः ह्यूमन कंपयूटर की रिलीज तारीख आठ मई है। सोनी पिक्चर्स के लिए इसका लेखन और निर्देशन अनु मेनन ने किया है।

कंगना रनोट की ‘थलाएवी’ की शूटिंग चल रही है। इस फिल्म के लिए कंगना ने अपना वजन बढ़ाया है, ताकि वह जयललिता की कद-काठी में आ सकें। ‘थलाएवी’ के निर्देशक ए. विजय हैं और इसका निर्माण शैलेश आर. सिंह कर रहे हैं। बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल पर बन रही बायोपिक में पहले श्रद्धा कपूर थीं। अब साइना की भूमिका परिणीति चोपड़ा निभा रही हैं। इस फिल्म का निर्देशन अमोल गुप्ते कर रहे हैं। फिल्म का निर्माण टी सीरीज कर रही है।

वहीं भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान रहीं मिताली राज के जीवन पर ‘शाबाश मितु’ बन रही है। फिल्म का निर्देशन राहुल ढोलकिया कर रहे हैं। फिल्म में क्रिकेटर मिताली राज की भूमिका तापसी पन्नू निभाएंगी। यह 2021 में रिलीज होगी और इसकी रिलीज की तारीख अभी से 5 फरवरी तय कर दी गई है। इन फिल्मों के अलावा और भी कुछ फिल्में गुपचुप बन रही होंगी।

एक बात तो निश्चित है कि महिला चरित्रों की फिल्में दिलचस्प और प्रेरक होती हैं। भारतीय समाज में महिलाएं नेतृत्वकारी भूमिकाओं में कम आ पाती हैं। कुछ महिलाएं अपनी जिद और दृढ़ता से कामयाब जरूर होती हैं, लेकिन कामयाबी तक के सफर में उन्हें अपने परिवार, मित्र मंडली, संस्थान और टीम द्वारा खड़े किए गए अवरोधों को पार करना पड़ता है। ‘पंगा’ में काल्पनिक खिलाड़ी के चरित्र के जरिए अश्विनी अय्यर तिवारी ने एक महिला के संघर्ष को पेश किया था।

गौर करें तो पाएंगे कि ज्यादातर खिलाड़ी और जांबाज महिलाओं को ही निर्माता-निर्देशकों ने फिल्मों के लिए चुना है। दरअसल, विवादों से बचने के लिए ऐसे चरित्रों को चुनना सुविधाजनक होता है। देश के बदले माहौल में नारी सशक्तीकरण के इस दौर में उम्मीद की जा सकती है कि इन फिल्मों को दर्शकों का सकारात्मक प्रतिसाद मिलेगा। दर्शक अपने देश की नायिकाओं से परिचित होंगे और अभिनेत्रियों को कुछ दमदार चरित्र निभाने के अवसर मिलेंगे।

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