कश्मीर की नई फिल्म नीति : वरदान या अभिशाप?

जम्मू-कश्मीर की नई फिल्म नीति को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने 5 अगस्त को आमिर खान, राजकुमार हिरानी और महावीर जैन की मौजूदगी में बड़े धूम-धाम के साथ इस नई नीति की घोषणा की।

फोटो: सोशल मीडिया
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नम्रता जोशी

फिल्म निर्देशक ओनिर की 2010 की एन्थोलॉजी फिल्म ‘आई ऐम’ का ‘बड़ा’ हिस्सा (‘मेगा’ सेग्मेंट) एक कश्मीरी पंडित परिवार की महिला के बारे में है। वह दो दशक से ज्यादा समय से जबरन निर्वासन के बाद एक काम के सिलसिले में श्रीनगर लौटती है। वह अपने बचपन की दोस्त से मिलती है ताकि वह धार्मिक विभाजनों के आर-पार की पीड़ा को समझ सके और यह जान सके कि दोनों ने राजनीतिक उथल-पुथल की वजह से कितनी कीमत चुकाई है। फिल्म का यह हिस्सा कश्मीर में फिल्माया गया था। ओनिर अब इसी कड़ी में एक लघु फिल्म ‘वी आर’ बनाने की तैयारी कर रहे हैं। इसके लिए वह न केवल लोकेशन की तलाश कर रहे हैं बल्कि स्थानीय फिल्म स्टूडेंट्स के साथ फिल्म बनाने की कार्यशाला भी आयोजित कर रहे हैं। वह कहते हैं, “जितना संभव हो सके मैं इस फिल्म के क्रू में स्थानीय लोगों को ही शामिल करना चाहता हूं।”

दुर्भाग्य से, जम्मू-कश्मीर की हाल में जारी नई फिल्म नीति के कारण इस कार्य में अड़चन आ सकती है। जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने 5 अगस्त को आमिर खान, राजकुमार हिरानी और महावीर जैन की मौजूदगी में बड़े धूम-धाम के साथ इस नई नीति की घोषणा की। नई फिल्म नीति के इस व्यापक दस्तावेज का उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को फिल्म उद्योग के लिए एक पसंदीदा जगह बनाना है, जैसा एक दौर में राज्य में फिल्म पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए किया गया था। इसके अलावा इसका उद्देश्य वहां के नागरिकों के लिए आजीविका के अवसर पैदा करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को गति देना और अंततः स्थानीय फिल्म उद्योग को बढ़ावा देना भी है।


मालूम होता है कि जम्मू-कश्मीर की इस नई फिल्म नीति को बनाने में हर चीज पर नजर रखी गई, यहां तक कि जम्मू एवं कश्मीर फिल्म विकास परिषद के गठन से लेकर नई नीति के उद्देश्यों को निर्धारित करने में भी। वित्तीय प्रोत्साहन से लेकर सब्सिडी तक, सुरक्षा मुद्दों से लेकर सिंगल विंडो क्लीयरेंस और ढांचागत विकास तक, हर चीज पर 360 डिग्री की नजर रखी गई है। फिल्मकार जहां इस नई फिल्म नीति को बहुत बारीकी से समझने का प्रयास कर रहे हैं, वहीं इसमें ऐसा क्लॉज (उप-नियम) भी है जिसको लेकर सभी को आशंका है क्योंकि इसके अनुसार, शूटिंग की अनुमति के लिए संबंधित अथॉरिटी के पास स्क्रिप्ट (पटकथा) जमा करानी होगी। ये विशेषज्ञ (एक्सपर्ट) कौन होंगे? किस तरह ये लोग पटकथा की जांच करेंगे? अस्वीकृति के रूप में क्या एक रिड्रेसल मिकेनिजम (निवारण तंत्र) होगा?

इस नई नीति से पहले फिल्म की शूटिंग के लिए अनुमति प्राप्त करने के वास्ते स्थानीय प्रशासन और सेना को एक औपचारिक पत्र देना ही पर्याप्त होता था। अब ऑनलाइन सबमिशन के चलते अन्य चीजों के साथ-साथ यदि “फीचर फिल्म है तो पटकथा का पूरा ब्यौरा और सार, टीवी/वेब-शो और सीरिज है तो विस्तार के साथ उसकी अवधारणा को जमा करना आवश्यक है।”

नई फिल्म नीति का यह दस्तावेज स्पष्ट कहता है कि लोकेशन परमिशन कमेटी और स्क्रिप्ट स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों के आधार पर सिंगल विंडो सेल द्वारा फिल्म की शूटिंग के लिए अनुमति दी जाएगी। स्क्रिप्ट स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष सुप्रसिद्ध व्यक्ति होंगे और इसके अलावा कमेटी में तीन अन्य सदस्य भी होंगे जो फिल्म निर्माण/पटकथा लेखन/कला/संस्कृति या फिल्म निर्माण से संबंधित किसी भी अन्य क्षेत्र से संबंधित होंगे।

फिल्मकार उत्पल बोरपुजारी कहते हैं, “मैं इस सिद्धांत के बिल्कुल खिलाफ हूं कि अगर एक फिल्म आपसे सब्सिडी नहीं मांग रही है तो भी उसके लिए पटकथा जमा करना आवश्यक है। हालांकि व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो यह एक भविष्योन्मुख फिल्म नीति प्रतीत होती है।” उनके अनुसार, इस नीति में जो स्पष्ट नहीं है वह है सुरक्षा का पहलू। वह कहते हैं, “क्या तब भी पटकथा जमा करनी होगी जब प्रोडक्शन आपसे सब्सिडी नहीं बल्कि मात्र सुरक्षा मांग रहा है (जो कश्मीर में आवश्यक है)। चूंकि कश्मीर में किसी भी फिल्म की शूटिंग पर्याप्त सुरक्षा के बिना संभव नहीं है, इसलिए यह संदेह का एक बिंदु है जिसको स्पष्ट करना आवश्यक है।”


अपना नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर एक अन्य फिल्म निर्देशक कहते हैं, “इसके कारण स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए कश्मीर में शूटिंग करना असंभव हो जाएगा।” ओनिर कहते हैं, “वे राज्य में शूटिंग किए जाने वाले विषय-वस्तु पर नजर बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं।” एक और फिल्मकार सवाल उठाते हुए कहते हैं, “केंद्रीय सरकार ने फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण (ट्रिब्यूनल) को खत्म कर दिया है। अब वे फिल्मों को पटकथा के स्तर पर ही सेंसर करना चाहते हैं। फिर सेंसर बोर्ड होने का क्या मतलब रह जाता है?”

कश्मीर नैरेटिव के ‘प्रबंधन’ को अलग कर दिया जाए तो जिस बात से ओनिर को सबसे ज्यादा नाराजगी है वह यह है कि कहीं भी (जम्मू-कश्मीर और यूपी के अलावा) शूटिंग के वास्ते अनुमति प्राप्त करने के लिए पटकथा को जमा करना आवश्यक नहीं है। पटकथा जमा करने की आवश्यकता केवल तभी पड़ती है जब फिल्म निर्माता किसी फिल्म के लिए फंड या अनुदान की इच्छा रखते हों। वह कहते हैं, “मैं अगर सब्सिडी नहीं चाहता हूं तो उन्हें मेरी पटकथा की क्या जरूरत है?”

बहुत से लोगों की राय है कि यह नीति फिल्म इंडस्ट्री को प्रोत्साहन देने के बजाय लोगों को ही कश्मीर से दूर न कर दे। सिवाय केवल उन लोगों के जो किसी प्रकार का वित्तीय प्रोत्साहन चाहते हों और कुछ विशेष प्रकार की “सेफ” फिल्म बना रहे हों, वे ही पटकथा को साझा करेंगे।

कुछ लोग इसके पीछे बहुत बड़ी साजिश की बात कह रहे हैं। हो सकता है कि कश्मीर एक टेस्टिंग ग्राउंड हो; अगर फिल्मकार कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे और चुप रहेंगे तो पटकथा जमा करने का यह नियम सभी जगह लागू किया जा सकता है। इनमें से एक फिल्मकार का कहना है, “वे सिनेमा पर अपना नियंत्रण करना चाहते हैं और वे ऐसा काम के स्तर पर नहीं बल्कि सोच के ही स्तर पर करना चाहते हैं।”

ओनिर और भी अन्य कारणों से उदास हैं क्योंकि वह न केवल क्रू बल्कि स्थानीय कलाकारों और कश्मीरी भाषा के असली लहजे तथा वहां के लोगों को ही शामिल करने की सोच रहे थे। अभी वह इसी बात पर अडिग हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए वह अपनी फिल्म की पटकथा जमा नहीं करेंगे। अगर जरूरत पड़ी तो वह उसका रूप-रंग बदल देंगे और कहीं और शूटिंग करेंगे। वह कहते हैं, “यह बहुत दुख की बात है लेकिन अगर कोई भी विकल्प नहीं बचा तो उन्हें यह निर्णय लेना ही पड़ेगा।” एक और फिल्मकार कहते हैं, “अगर लोग चाहें तो वे केरल में ही एक और जम्मू-कश्मीर रिक्रिएट कर देंगे।” इस चिंता को लेकर सब एकमत हैं कि आगे भविष्य में गेमचेंजर बनने के बजाय पटकथा जमा करने का यह उप-नियम लाभ के बजाय बहुत अधिक हानि कर सकता है और फिल्म संस्कृति के विकास की प्रक्रिया में अति-आवश्यक प्रोत्साहन को सक्षम करने के बजाय बाधिक ही करेगा।

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