अब कोई गर्म हवा-धर्मपुत्र जैसी फिल्म बनाना सोच भी नहीं सकता, जो मानवीय त्रासदी का आईना दिखा सकें

साल 1992 ने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया। उसके बावजूद ऐसी कोई फिल्म बन सकती थी जो अगली पीढ़ी के कठिन सवालों के जवाब खोजती। अब तो इधर, कुछ वर्षों से भारत के भविष्य को अतीत में ले जाने की कोशिशें हो रही हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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गुंजन सिन्हा

सन 2003 में एक पाकिस्तानी फिल्म आई थी ‘खामोश पानी’। इसमें एक महिला आयशा बच्चों को कुरान पढ़ाती है। उसका बेटा जनरल जिया-उल-हक के इस्लामिक कट्टरवाद से ग्रस्त है। बंटवारे के समय आयशा सिख थी। परिवार के चाहने के बाद भी अस्मत बचाने के लिए वह कुएं में नहीं कूदी और भाग गई। अपने अपहरणकर्ता से शादी की और वीरो से आयशा बन कर वह बच गई, लेकिन इतनी खौफजदा कि कभी कुएं के पास भी नहीं जाए। अतीत जानकर उसका कट्टर मुस्लिम बेटा नफरत करने लगा, तब आयशा कुएं में कूद गई। मानवीय त्रासदी की प्रतीक आयशा की भूमिका किरण खेर ने निभाई थी। अब वह बीजेपी सांसद हैं।

2020 की रक्तरंजित फरवरी सवाल करती है- क्या किरण खेर आयशा की वह ऐतिहासिक भूमिका अब भी निभा सकेंगी? हम फिर ‘मुगले आजम’, ‘गर्म हवा’, ‘धर्मपुत्र’ जैसी फिल्में बना सकेंगे? उस दौरान जब बंटवारे के घाव ताजा थे, तब फिल्मकार उससे बचते रहे। बाद में उस पर फिल्में बनीं। उनमें वह अकल्पनीय हिंसा दिखाई देती है। आज के लोगों तक ये फिल्में ऐसे युग से आती हैं, जब समय ही हिंसक था। फिल्मों ने विभाजन का जिक्र तो किया लेकिन यथार्थ से बचती रहीं। सच कहने से ज्यादा बड़ा बोझ था सकारात्मक होने का। गांधी की हत्या, विचारहीन हिंसा, बदलाव की उम्मीद और नई स्थितियों से तालमेल बिठाने में आजादी के बाद शुरूआती दस-बारह साल निकल गए।

बंटवारे की पृष्ठभूमि पर पहली फिल्म थी ‘छलिया’ (1960)। मनमोहन देसाई ने उन अपहृत महिलाओं की दुर्दशा दिखाई, जिनको परिवार ने वापस नहीं लिया। विभाजन की ऐसी ही शिकार शांति (नूतन) से नायक (राज कपूर) को प्यार है। नायक प्यार की कुर्बानी देकर शादीशुदा शांति को उसके परिवार से मिलाता है। फिल्म राजनीति से परहेज करती है और मानवीय त्रासदी पर फोकस करती है।

विभाजन पर यश चोपड़ा ने ‘धर्मपुत्र’ (1961) बनाई। एक अविवाहित मुस्लिम मां अपने शिशु को हिंदू परिवार में छोड़ जाती है। वर्षों बाद उसका बेटा कट्टरपंथी हिंदू बन जाता है। मुसलमानों को भगाने की साजिश में शामिल है, जबकि स्वयं एक मुस्लिम की संतान है। फिल्म में हिंदू कट्टरवाद के खिलाफ नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता है। उसमें साहिर लुधियानवी का क्लासिक गीत ‘तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा’ आज एक भूला हुआ तराना है। साहिर का सवाल- ये किसका लहू है, कौन मरा? – आज भी अनुत्तरित है। इन्हें गुनगुनाना अभी के निजाम में गुनाह है। फसाद तो तब भी हुए थे जब ‘धर्मपुत्र’ रिलीज हुई थी। अब तो बनना ही कठिन है। अंधे राष्ट्रवाद के खिलाफ यश चोपड़ा और साहिर ने सद्भाव का प्रयास किया। फिल्म फ्लॉप हुई और तनाव ऐसा हुआ कि वर्षों यह विषय किसी ने नहीं उठाया।

नागरिकता संशोधन कानून के बाद जो फिल्म सबसे ज्यादा याद आती है, वह है एमएस सथ्यू की ‘गर्म हवा’। अशांति की आशंका से यह आठ महीने सेंसर में रुकी रही। यह इस्मत चुगताई की कहानी पर है। बंटवारे के कारण हिंदू और मुसलमान बंटे ही, हर मुस्लिम परिवार भी बंट गया। एक हिस्सा मातृभूमि छोड़ गया, दूसरा नहीं गया। हिंदू और मुस्लिम दोनों में उदार और कट्टर जमातें बन गईं। खुशवंत सिंह के चर्चित उपन्यास ‘ट्रेन टु पाकिस्तान’ पर पामेला रुक्स ने इसी नाम से फिल्म बनाई। यह पंजाब के एक गांव की कहानी है। सिख और मुसलमान- दोनों ही वीभत्स हत्याओं से त्रस्त हैं। लोग असहाय हैं।

अलग-अलग समुदायों के तारा सिंह (सनी देओल) और सकीना (अमीषा पटेल) की कहानी है ‘गदरः एक प्रेम कथा’। उन्मादी भीड़ से बचाई गई सकीना और तारा सिंह के बीच प्यार में धार्मिकता विलेन है। अमृता प्रीतम के उपन्यास पर 2003 में बनी ‘पिंजर’ भी विभाजन आधारित फिल्मों के बीच प्रसिद्ध रही। इसमें भी प्रेम सांप्रदायिक दुर्भाव का शिकार है। विभाजन के माहौल पर सबसे उल्लेखनीय कृति थी- ‘तमस’। भीष्म साहनी के उपन्यास पर गोविंद निहलानी ने यह धारावाहिक बनाया था। इसमें सभी समुदायों की तकलीफ का यथार्थ चित्रण है।

विभाजन आधारित सिनेमा-साहित्य में सआदत हसन मंटो, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम, राजिंदर सिंह बेदी आदि का जोड़ अब नहीं मिलता। मिल भी नहीं पाएगा क्योंकि विभाजन का दर्द उन लोगों ने खुद झेला था। हमारे लिए वह सुनी सुनाई बात है। फिर भी हाल की कई फिल्मों में विभाजन की छाया है। जैसे ‘शहीद-ए-मोहब्बत’, ‘बूटा सिंह’, ‘भाग मिल्खा भाग’, ‘खतरनाक इश्क’, ‘बेगम जान’, इत्यादि।

भारत बनाम पाकिस्तान थीम पर बनी फिल्मों में असली मुद्दा राष्ट्र कम और धर्म ज्यादा होता है। बॉलीवुड ने भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान के बीच दूरी घटाने की कोशिशें भी कीं। ‘अमर अकबर एंथोनी’ का दृश्य जब 15 अगस्त, 1947 को गांधी की मूर्ति के नीचे एक मां के तीनों बच्चे तूफान में बिछड़ते हैं, भारत के सांप्रदायिक बिखराव का प्रतीक है। बच्चे अलग-अलग धर्मों में पलते हैं। अंत में आपस में मिलते हैं। आईएस जौहर की फिल्म नास्तिक (1954) का नायक दंगों को देख नास्तिक बन जाता है। बदला लेने की उसकी यात्रा तीर्थयात्रा बन जाती है।

कुछ फिल्मों में एक साझी संस्कृति और लोकप्रिय इतिहास है। फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ (1960) इस दौर की सिरमौर है। मुगल शासक संस्कृति से अविभाज्य हैं। अकबर होली खेलते हैं। इस संस्कृति में तुलसी दास को मस्जिद में सोने से कोई दिक्कत नहीं (मांग के खाइबो, मसीत में सोइबो)। रसखान कृष्ण के गीत लिखते हैं, नजीर होली गाते हैं। लेकिन अभी के दौर में ऐसे किसी नजीर, रसखान, अकबर या तुलसी का होना संभव नहीं।

साझा विरासत पर कुठाराघात अचानक नहीं हुआ। कई फिल्में धार्मिक पहचानों, आग्रहों पर जोर देती रहीं। ब्राह्मण पेशवा और मुस्लिम राजकुमारी की प्रेम कहानी सिर्फ प्रेम नहीं। फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ (2015) में भगवा ध्वज भारत के नक्शे पर लहरा रहा है। ‘पद्मावत’ फिल्म ने भी सांप्रदायिकता को कुरेदा। अखंड भारत असंभव दिखने के साथ हिंदू राष्ट्रवाद उग्र हो रहा है। कालचक्र पीछे ले जाने को आतुर है।

आजादी के समय विभाजन के घाव हरे थे, तो फिल्मकारों ने उन्हें नहीं छुआ। पाकिस्तान में कुछ फिल्में बनीं, जैसे सैफुद्दीन सैफ की ‘करतार सिंह’ (1959), रजा मीर की ‘लाखों में एक’ (1967) और सबीहा की ‘खामोश पानी’ (2003)। अधिकांश में मानवता पर राष्ट्रीय/धार्मिक पूर्वाग्रह हावी मिलते हैं। हर मुस्लिम दयालु, हर हिंदू नकारात्मक। भारत में ठीक उलटा। यहां से सभी पाकिस्तानी बुरे दिखाई देते हैं। लेकिन 2003 के ‘खामोश पानी’ का मौन 2020 के दिल्ली के क्रंदन से कहां अलग है?

वेलेंटाइन के महीने में दो युवा बेटों की लाशें लेकर आ रहे एक पिता का पथरीला मौन चैनलों के कानफाड़ू शोर से ज्यादा असहय है। होली सामने है, दिल्ली गम में डूबी हुई है। अत्याचार की बेहिसाब कहानियां लिए दिल्ली, किस मुंह से होली का स्वागत करे! दंगे पूरे देश की पीड़ा हैं। भारत ज्यादा हिंसक होता जा रहा है। आज का हिंदुत्व गांधी के ‘ईश्वर अल्ला तेरो नाम’ या ‘वैष्णव जन’ वाला हिंदुत्व नहीं है। यह पाकिस्तान के प्रति नफरत से भरा है। कई फिल्में अल्पसंख्यकों की चिंताओं को दिखाती हैं। वे खुद को दूसरे वर्ग का नागरिक महसूस करने के लिए बाध्य किए जाते हैं। “पाकिस्तान जाओ” उनके खिलाफ श्मशान साधना का नया कापालिक मंत्र है।

फिल्म ‘नसीम’ में उग्र हिंदुत्व से डरा एक बेटा पिता से पूछता है, “आप पाकिस्तान क्यों नहीं गए?” पिता के पास ऐसा कोई जवाब नहीं है जिससे वह बेटे को संतुष्ट कर सके। 1992 ने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया। उसके बावजूद ऐसी कोई फिल्में बन सकती थीं, जो अगली पीढ़ी के कठिन सवालों के जवाब खोजती। लेकिन अब तो पिछले कुछ वर्षों से भारत के भविष्य को अतीत में ले जाने की कोशिशें हो रही हैं।

आज हम ऐसे दौर में हैं, जब विभाजन झेलने वाले लोग समाप्त हो चले हैं। कुलदीप नय्यर, भीष्म साहनी, प्राण, मंटो, बलराज साहनी जैसे लोगों ने खुद झेला था। इसलिए उनका रुख ज्यादा मानवतावादी था। उनकी रचनाएं और फिल्में मानवीय पहलू उजागर करती हैं। आज सरकार के पास हिंदुत्व के पक्के और जिद्दी कार्यक्रम हैं। लेकिन लोग नाराज हैं और वे नफरत के लिए तैयार नहीं हैं।

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