सिनेमा

फिल्मों की लव स्टोरी के लिए अब एक लड़का और एक लड़की की ज़रूरत नहीं...

फिल्म ‘फायर’ और ‘गर्लफ्रेंड’ से बिलकुल अलग ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ इस सदी की एक लड़की की कहानी है, जिसे दूसरी लड़की अच्छी लगती है। वह इस बात को जब दुनिया के सामने जाहिर करती है, तो प्रेम की पींग बढ़ा रहा उसका प्रेमी ही उसके समर्थन में खड़ा मिलता है।

अजय ब्रह्मात्मज

फरवरी की एक तारीख को सोनम कपूर, अनिल कपूर और राजकुमार राव की फिल्म ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ रिलीज हुई है। रोमांस को नए दृष्टिकोण से देखती इस फिल्म के प्रति आम दर्शकों का रवैया बहुत उत्साहजनक नहीं है, लेकिन लगभग सभी समीक्षकों ने इस फिल्म के ‘बोल्ड सब्जेक्ट’ की तारीफ की है। शैली चोपड़ा धर की फिल्म समलैंगिक रोमांस पर है। यह पंजाब के मोगा शहर की पृष्ठभूमि में है।

फिल्म ‘फायर’ और ‘गर्लफ्रेंड’ से बिलकुल अलग ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ इस सदी की एक लड़की की कहानी है, जिसे दूसरी लड़की अच्छी लगती है। वह इस बात को जाहिर करती है, तो प्रेम की पींग बढ़ा रहा प्रेमी ही उसके समर्थन में खड़ा मिलता है। हिंदी फिल्मों के इतिहास में लव स्टोरी के संदर्भ में यह एक बड़ा शिफ्ट है। मालूम नहीं इस जमीन की कहानियां आगे कैसा विस्तार लेंगी या उनके निरूपण में किस तरह के नए जज्बात आएंगे?

फिलहाल इस फिल्म को दर्शकों ने रिजेक्ट तो नहीं किया है, क्योंकि रिलीज के वीकेंड पर इसके दर्शक बढ़े। धारा 377 के निरस्त के बाद इस फिल्म का महत्व बढ़ जाता है। इस बार मुंबई में आयोजित ‘प्राइड मार्च’ में भागीदारों की संख्या पिछले सालों से बहुत ज्यादा थी। यह कहीं न कहीं इस तथ्य का संकेत है कि समाज में एलजीबीटीक्यू के प्रति सहमति और स्वीकृति बढ़ी है।

आज की प्रेम कहानियों में खलनायक स्वयं नायक और नायिका ही होते हैं। हर वक्त उनका आंतरिक संघर्ष जारी रहता है। दुविधा और द्वंद्व ही उनके प्रेम के बाधक और खलनायक बन जाते हैं। आने वाले सालों में प्रेम और रोमांस के किस्सों में नई तब्दीलियां आएंगी। हो सकता है यह प्यार अधिक टैकी और डिजिटल हो जाए। उसकी अस्थिरता ही प्रेम बनाए रखने की वजह बने। प्रेमी एक-दूसरे को ‘आई लव यू’ कहने के लिए इमोजी से आगे की कोई कूट भाषा अपनाएं।

कार्तिक आर्यन और कृति सैनन की फिल्म ‘लुका छुपी’ का इन दिनों जोर-शोर से प्रचार चल रहा है। यह छोटे शहर के प्रेमियों की कहानी है। लड़का और लड़की प्रेम करते हैं, लेकिन शादी नहीं करते हैं। वे लिव इन रिलेशन में रहना चाहते हैं। चूंकि छोटे शहर में सभी उन दोनों को जानते हैं, इसलिए वे पास के दूसरे शहर में इरादों को अंजाम देते हैं।

उनके लिव इन रिलेशन में तब कॉमिकल पेच आता है, जब उनके परिवार भी इसमें शामिल हो जाते हैं। दो व्यक्तियों के साथ रहने का फैसला दो परिवारों के साथ रहने से मजेदार घटनाक्रमों से गुजरता है। रोमांस और प्रेम की यह नई और रोचक स्थिति है। यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों का प्रेम कैसे परवान चढ़ता है या उनके बीच कैसी गलतफहमियां और दिक्कतें पैदा होती हैं?

अगर समकालीन प्रेम और रोमांस की बात की जाए, तो इसकी भूमिका पिछली सदी के आखिरी दशक में लिखी जाती है। ठीक 30 साल पहले सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ आई थी। फिर ‘कयामत से कयामत तक’ और फिर ‘लव स्टोरी’... इन फिल्मों ने अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के बदले की कहानियों और हिंसक भावनाओं से ऊबे दर्शकों को भीनी राहत दी थी। नए युवा कलाकारों को दर्शकों ने भी अपना लिया था। गोविंदा के होने के बावजूद हिंदी फिल्मों में मौजूद रूमानियत की वीरानी खत्म हुई थी और एक नया सिलसिला आरंभ हुआ था।

नए प्रेमियों की मुश्किलें अलग थीं। हालांकि परिवार और माता-पिता के विरोध का फार्मूला चालू रहा, लेकिन माहौल बदलने से चुनौतियों का रंग-ढंग अलग हो गया। उन्हें सूरज बड़जात्या ने ‘हम आपके हैं कौन’ और आदित्य चोपड़ा ने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में नई रोशनी में पेश किया। परिवार की पृष्ठ भूमि और सहमति से प्रेम की पूर्णता को नया स्वर मिला।

थोड़ा और आगे बढ़ने पर करण जौहर ने प्रेमी और दोस्त के द्वंद्व को ‘कुछ कुछ होता है’ में प्रस्तुत किया। इस द्वंद्व से वह अभी तक नहीं निकल सके हैं। लेकिन उनकी इस अनुभूति और जिज्ञासा ने सदी बदलने के साथ स्त्री-पुरुष संबंधों में आ रहे बदलावों को बारीकी से रखा। हिंदी फिल्मों का मशहूर संवाद अलग-अलग शब्दों और पदों में एक ही भाव रखता है- लड़का-लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।

दरअसल, सदियों पुरानी रूढ़िवादी सोच को हिंदी फिल्मों और भारतीय समाज ने लगभग साथ ही बदला और स्वीकार किया। इस सदी के आरंभ में फरहान अख्तर ने ‘दिल चाहता है’ में वैसे तो तीन दोस्तों की कहानी दिखाई और सुनाई थी। लेकिन फिल्म में तीन युवकों की प्रेम कहानी भी थी। तीनों के प्रेम की अलग कहानियां थीं। प्रेम में कनफ्यूजन और फैसला न ले पाने का असमंजस अच्छी तरह व्यक्त किया गया था।

समय के साथ इस सदी की हिंदी फिल्मों में यह कन्फ्यूजन बढ़ता ही जाता है। पहले की तरह समर्पित प्रेमी परदे पर और समाज में कम होते जा रहे हैं। शहरी आपाधापी और तनावपूर्ण जीवन में प्रेम की परेशानियां बहुआयामी हो गई हैं। इसके अलावा प्राथमिकताएं बदली हैं। लड़के ही नहीं लड़कियां भी करियर के प्रति सचेत होकर फैसले ले रही हैं। आत्मनिर्भरता बढ़ी है दोनों की।

इस आत्मनिर्भरता की वजह से कोई भी रिश्ता अब विवशता में ढोया नहीं जा रहा है। आर्थिक बराबरी से ही सामाजिक बराबरी की बुनियाद है। इस बुनियाद के मजबूत होने के साथ प्रेमियों के फैसलों और साथ रहने में केवल प्रेम ही कारण नहीं रह गया है। आज के प्रेमी चांद-सितारे तोड़ कर लाने की बातें नहीं करते और न ही सपनों में जीते हैं। ठोस जमीन पर प्यार पनपने में समय लगता है, इस प्रेम का एहसास भी जल्दी से नहीं होता।

इधर की फिल्मों में हीरो और हीरोइन दोनों ही कमिटमेंट से डरते हैं। यह डर उन्हें प्रेम में होने के बावजूद दीर्घकालिक रिश्ते (शादी) के लिए जल्दी तैयार नहीं होने देता। शादी के मंडप से भागते/भागती हीरो/हीरोइनों को हमने पिछले सालों में देखा है। तात्कालिकता पर जोर दिया जा रहा है।

यही वजह है कि कमिटमेंट के पहले वे लिव इन रिलेशन में रह कर एक-दूसरे को परख लेना चाहते हैं। लिव इन रिलेशन को खत्म करने में तलाक जैसे ही भावनात्मक झटके लग सकते हैं, लेकिन उसके साथ कोई कानूनी झंझट और वित्तीय तार नहीं जुड़ा होता। सिर्फ एक सूटकेस उठाना होता है।

मिलेनिअल पीढ़ी के प्रेमी इस धारणा और सोच से असहमत हो सकते हैं, लेकिन उनके प्रेम संबंधों में अस्थिरता बनी रहती है। इम्तियाज अली ने ‘तमाशा’ में आधुनिक प्रेम के नए पहलुओं को समझने और बताने की कोशिश की है। सोशल मीडिया के दैनंदिन जीवन में प्रवेश के बाद से प्रेम और रोमांस का रहस्य समाप्त हो रहा है। प्रेमी-प्रेमिका पहले भी अंतहीन बातें करते थे।

आज-कल कोर्टशिप के दौरान फेसबुक, व्हाट्सएप और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से प्रेमी-प्रेमिका खुद के सारे मनोभाव उजागर कर देते हैं। जिज्ञासा खत्म हो जाती है। एक-दूसरे को समझने और जानने की जरूरत नहीं रह जाती। साथ रहना शुरू करने के बाद कुछ भी उद्घाटित नहीं होता।

इसके अलावा आजकल के प्रेम और रोमांस में बाहरी दबाव और बाधाएं नहीं होतीं। पहले की फिल्मों में माता-पिता, अभिभावक, परिवार और समाज प्रेम की प्रगति में खलनायक बन जाते थे। उनसे लड़ने और प्रेम को बचाए रखने में ही नायक-नायिका की ऊर्जा खर्च होती थी। अब नायक और नायिका को मिलने के लिए किसी यत्न या बहाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। परिवार से दूर स्वतंत्र होने की वजह से वे खुद के मालिक होते हैं। डर, बाधा और मुश्किलों के नहीं रहने से प्रेम में जोश और आनंद भी कम हो जाता है।

गौर करें, तो आज की प्रेम कहानियों में खलनायक स्वयं नायक और नायिका ही होते हैं। हर वक्त उनका आंतरिक संघर्ष जारी रहता है। दुविधा और द्वंद्व ही उनके प्रेम के बाधक और खलनायक बन जाते हैं। आने वाले सालों में प्रेम और रोमांस के किस्सों में नई तब्दीलियां आएंगी। हो सकता यह प्यार अधिक टैकी और डिजिटल हो। उसकी अस्थिरता ही प्रेम बनाए रखने की वजह बने। प्रेमी एक-दूसरे को ‘आई लव यू’ कहने के लिए इमोजी से आगे की कोई कूट भाषा अपनाएं।

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