खय्यामः करोगे याद, तो हर बात याद आएगी...

अपने सुमधुर संगीत के लिए लोगों के दिलों में बसने वाले खय्याम ने अपने 90वें जन्मदिन पर बॉलीवुड को एक अनोखा उपहार दिया था। उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई करीब 12 करोड़ रुपये एक ट्रस्ट के नाम कर दिया, जो इससे जरूरतमंद कलाकारों की हर तह की मदद कर रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजीव मित्तल

खय्याम का जाना एक सुकून का अपनी कई सारी जिंदगियों से चले जाना जैसा है। इतना सौम्य, शांत, और सुवास भरा संगीत कि उसमें, भागदौड़, परेशानी और तनाव सब भूलकर खो जाने का मन करे। हिंदी फिल्मों के संगीत में खय्याम की अपनी खास शैली थी, जो उन्हें बड़े-बड़े महारथियों से आतंकित नहीं होने देती थी। परंपरागत रिद्मिक पैटर्न से उनके रिद्म का क्रम बहुत मौलिक और अलहदा हुआ करता था। उनका वाद्य चुनाव और वाद्य संयोजन भी बहुत अलग होता था। खय्याम का मानना था कि स्थायी और अंतरे के संगीत की भी अपनी एक भाषा है। वो भाषा ‘शाम ए गम की कसम’ और ‘फिर न कीजिए मेरी गुस्ताख निगाही का गिला’ और उनके कंपोज किए संगीत में साफ सुनाई देती है।

जालंधर के पास राहोन गांव की मस्जिद के इमाम के बेटे खय्याम पिता की अजान के अलावा रोजाना मंदिर में गाई जाने वाली आरती के तो जैसे शैदाई हो गए थे। बंबई से पहले लाहौर में एक्टिंग की दीवानगी खींच ले गई। फिर बंबई में पंडित अमरनाथ और हिंदी फिल्म की प्रथम संगीतकार जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम की शागिर्दी में संगीत की कोंपल को खाद पानी मिला। फिर लाहौर लौटे और वहां संगीतकार जीए चिश्ती से मिले। चिश्ती साहब उनके संगीत ज्ञान से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपना सहायक बना लिया, लेकिन दिया एक धेला नहीं।

गुजर-बसर करने के लिए मुहम्मद जुहूर हाशमी उर्फ खय्याम ने सेना की नौकरी कर ली और द्वितीय महायुद्ध में अंग्रेज फौज की तरफ से दक्षिण-पूर्व एशिया में कई लड़ाई लड़े। लौटे तो फिर उसी फिल्मी संगीत की दुनिया में। शुरुआत उन्हीं चिश्ती साहब के साथ की। 1946 में कलकत्ता से बंबई आ गए और रोमियो एंड जूलियट में अभिनय भी कर डाला। हुस्नलाल-भगतराम की उन पर विशेष कृपा रही। उन्होंने खय्याम को जोहरा के साथ युगलगान का मौका दिया। हुस्नलाल और भगतराम वही जोड़ी है, जिसने लता मंगेशकर से ‘बड़ी बहन’ फिल्म में-‘चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है’- गवाकर इतिहास ही रच डाला था।

कुछ ही समय बाद खय्याम ने शर्माजी उपनाम रख कई संगीतकारों के साथ मिलकर गाने कंपोज किए। लेकिन उन गानों में खय्याम का असर साफ दिखने लगा था। जैसे 1950 में प्रदर्शित ‘बीवी’ फिल्म में मोहम्मद रफी का गाया- ‘अकेले में वो घबराते तो होंगे।’ फिर ‘हीर रांझा’ में ‘दिल यूं यूं करता है।’ 1949 की पर्दा फिल्म में उन्होंने स्वतंत्र रूप से संगीत दिया, लेकिन ऐसा मौका एकाध बार ही मिला। बाकी तो खय्याम, जो भी फिल्म मिलती, उसमें एक दो गानों में ही संगीत दे कर बरसों काम चलाते रहे।


1953 में बनी ‘फुटपाथ’ फिल्म ने खय्याम को बेहतरीन संगीतकार के रूप में स्थापित कर दिया। इस फिल्म में तलत महमूद के गाए ‘शाम ए गम की कसम’ उनके फिल्मी गायन के सर्वश्रेष्ठ गानों में गिना जाता है। इस गाने की ताजगी का अहसास गीत की प्रस्तावना के संगीत से पता चल जाता है। जैसे एक उदास सिम्फनी हवा में तैरती हुई शाम को और उदास बना जाए।

इस गाने की धुन आज भी फिल्म संगीत के इतिहास में एक नई तकनीक का सूत्रपात मानी जाती है, जिसमें परंपरागत गजल वाद्य यंत्रों की जगह स्पेनिश गिटार और डबल बास से रिद्म दी गई। ‘फुटपाथ’ फिल्म के लेखक जिया सरहदी के सुझाव पर खय्याम ने शर्माजी की जगह ‘खय्याम’ नाम से संगीत देना शुरू किया।

बहरहाल, बंबइया सिनेमा की भेड़चाल के चलते ‘फुटपाथ’ के संगीत की अपार सफलता के बावजूद खय्याम छोटी-मोटी फिल्मों में ही संगीत देने को मजबूर थे और वो भी कभी-कभार। साठ के ही दशक के अंत में खय्याम को एक शानदार मौका मिला वो थी फिल्म ‘फिर सुबह होगी’। राजकपूर-माला सिन्हा के अभिनय वाली यह महत्वपूर्ण फिल्म खय्याम को साहिर के कहे पर मिली। साहिर साहब का मानना था कि दोस्तोवेस्की के जगप्रसिद्ध उपन्यास ‘क्राइम एंड पनिशमेंट’ पर बन रही इस फिल्म की संवेदना को केवल खय्याम ही समझ सकते हैं। फिर उनके चयन में राजकपूर तक शामिल हुए और एक शाम खय्याम ने कुछ ऐसी धुन उन्हें सुनाई कि वो उनके नाम पर राजी हो गए।

‘फिर सुबह होगी’ के सभी गीत सराहे गए। चाहे ‘वो सुबह कभी तो आएगी’, या ‘चीन ओ अरब हमारा, हिन्दुस्तां हमारा’, या ‘फिर न कीजिए मेरी गुस्ताख निगाही का गिला’..या ‘आस्मां पे है और जमीं पे हम’.. साहिर और खय्याम की जोड़ी ने एक तरह से चमत्कार ही कर डाला।

लेकिन इस फिल्म ने भी सफलता के दरवाजे नहीं खोले। सफल और बेहद सुंदर संगीत देने के बावजूद खय्याम को बहुत ही सीमित काम मिलने का एक कारण यह भी रहा कि खय्याम अन्य संगीतकारों के विपरीत, फिल्म के कथानक पर बहुत ध्यान देते थे। पसंद आने पर ही उस फिल्म में संगीत देने की हामी भरते थे। इसके चलते उनके हाथ से ‘बरसात की रात’ जैसी फिल्म तक निकल गई क्योंकि खय्याम उसकी कव्वाली किसी और की धुन पर बनाने को तैयार नहीं हुए।

सातवें दशक में खय्याम को अपने संगीत के लिए नई गायिका मिलीं जगजीत कौर। बाद में वो उनके जीवन से भी जुड़ीं, लेकिन अन्य संगीतकारों ने उनकी उपेक्षा ही की जबकि फिल्म ‘शगुन’ में जगजीत कौर ने अद्भुत गाने गाए थे। ‘शगुन’ के बाद ‘शोला और शबनम’ और ‘मोहब्बत इसको कहते हैं’ खय्याम के संगीत की मधुरता से लबालब रहीं। सातवें दशक की एक और महत्वपूर्ण फिल्म उनके खाते में आई ‘आखिरी खत’, जो राजेश खन्ना की शुरुआत की फिल्म थी।


आठवें दशक के मध्य में खय्याम का सितारा फिल्म ‘कभी-कभी’ ने बुलंदी पर पहुंचा दिया। ‘मैं पल दो पल का शायर हूं’ और ‘कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है’ जैसे गाने देश भर में छा गए थे। इस फिल्म के बाद यश चोपड़ा ने उन्हें अगली दो फिल्मों ‘त्रिशूल’ और ‘नूरी’ में भी लिया। लेकिन कथानक मनमुआफिक न होने की वजह से खय्याम ने यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ नहीं की। नौवें दशक में खय्याम को एक के बाद एक चार फिल्मों ‘थोड़ी सी बेवफाई’, ‘उमराव जान’, ‘रजिया सुल्तान’ और ‘बाजार’ ने बुलंदी के शिखर पर पहुंचा दिया।

सबसे पहले बात करें ‘उमराव जान’ की। इसकी सबसे खास बात यह है कि खय्याम ने इस फिल्म में लता से नहीं गवाया जबकि लता ने ही ‘बाजार’ फिल्म में ‘दिखाई दिए यूं कि बेखुद किया’ जैसी अद्भुत गजल गाई थी। खय्याम का मानना था कि अगर वो लता से ‘उमराव जान’ में गवाते हैं तो उसमें ‘पाकीजा’ का अक्स दिखाई पड़ता। इसलिए उन्होंने आशा को लिया और आशा भोंसले ने भी इस फिल्म में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। ‘इन आंखों की मस्ती के’, ‘दिल चीज क्या है’ और ‘ये क्या जगह है दोस्तों’ के तो कहने ही क्या। इतना ही नहीं, फिल्मों के लिए नए तलत अजीज ने भी ‘जिंदगी जब भी तेरी बज्म में’ गाकर तहलका मचा दिया।

‘बाजार’ फिल्म में खय्याम फिर शिखर पर थे। इसमें आवाज लता की थी। तलत अजीज के साथ लता का गाया ‘फिर छिड़ी बात फूलों की’ बेहद मधुर गाना था। भूपेंद्र का गाया ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी’ के तो कहने ही क्या। फिर लता की गाई ‘दिखाई दिए यूं’ तो मील का पत्थर साबित हुई।

खय्याम ने जगजीत कौर से ‘उमराव जान’ में खुसरो काअमर गीत ‘काहे को ब्याही बिदेस’ और ‘बाजार’ फिल्म ‘देख लो आज हमको’ से इतना शानदार गवाया कि अफसोस होता है अन्य संगीतकारों की सोच पर। ‘थोड़ी सी बेवफाई’ के ‘हजार राहें जो मुड़ के देखीं’ गाने में किशोर-लता और गुलजार तीनों के हुनर को अद्भुत तरीके से पिरोया खय्याम ने।

‘रजिया सुल्तान’ खय्याम के संगीत की सुवास से लबालब थी। इसमें लता फिर सर्वश्रेष्ठ थीं। ‘ऐ दिल ए नादां’ के तो क्या कहने। जैसे रेगिस्तान में संगीत उड़ रहा हो और कब्बन मिर्जा से गवाया ‘आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करे’ तो वास्तव में खुदाई सौगात है।

गजलों के कंपोजीशन में तो खय्याम बेमिसाल ही थे। उनमें वो मेलोडी का बहुत ही कोमल पक्ष लेते थे, जिसकी वजह से गजल अपनी पारंपरिक स्वर रचना से बिलकुल अलग बेहद कर्णप्रिय बन जाती थी। खय्याम ने अपने इसी हुनर का इस्तेमाल बेगम अख्तर की गाई ‘मेरे हमसफर मेरे हमनवां’ गजल में किया था।

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