ऋषि कपूर और इरफान खान.. बॉलीवुड के दो ऐसे नाम जिनकी अलग ट्रैक पर चलकर बनी पहचान

देश और दुनिया के दर्शकों ने दो कलाकारों को खो दिया। दोनों अपने तई लोकप्रिय स्टार थे। हिंदी फिल्मों के दर्शक उनकी अनुपस्थिति महसूस करते रहेंगे। जहां इरफान खान बीमारी के ठीक पहले करियर के उरूज पर थे, तो वहीं ऋषि कपूर भी बुजुर्ग किरदारों के रूप में मिलेनियल दर्शकों को भा रहे थे।

फोटो: सोशल मीडिया
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अजय ब्रह्मात्मज

पहले इरफान और फिर ऋषि कपूर...दो दिनों में देश और दुनिया के दर्शकों ने दो कलाकारों को खो दिया। दोनों अपने तई लोकप्रिय स्टार थे। हिंदी फिल्मों के दर्शक उनकी अनुपस्थिति महसूस करते रहेंगे। इरफान खान बीमारी के ठीक पहले करियर के उरूज पर थे। ऋषि कपूर भी बुजुर्ग किरदारों के रूप में मिलेनियल दर्शकों को भा रहे थे। अमिताभ बच्चन के साथ उनके लिए भी भूमिकाएं लिखी जाने लगी थीं। उनके स्वस्थ होकर काम पर लौटने की आस में अनेक निर्माता-निर्देशक बैठे थे।

इरफान लाइलाज गंभीर बीमारी के शिकार थे, इसलिए पता चलते ही उन्होंने सारे काम रोक दिए थे। बीमारी के दौरान उन्होंने बड़े यत्न से ‘अंग्रेजी मीडियम’ पूरी की थी। सोशल मीडिया और मीडिया में दोनों की चर्चाएं हो रही हैं। जाहिर सी बात है कि अस्वाभाविक मृत्यु ने दोनों के प्रति दर्शकों को भावुक कर दिया है। अमिताभ बच्चन ने एक ट्वीट में यह बताने की कोशिश की है कि क्यों इरफान के प्रति हम ज्यादा दुखी हैं? उन्होंने सही लिखा है कि इरफान के खोने का दुख इसलिए ज्यादा है कि उनको मिलने वाले अवसर खो गए। उनकी संभावनाएं उद्घाटित नहीं हो पाईं जबकि ऋषि कपूर के साथ ऐसा एहसास नहीं होता।

ऋषि कपूर के महत्व और योगदान को समझना जरूरी है। पिता राज कपूर ने 1970 में आई ‘मेरा नाम जोकर’ में उन्हें अपने किशोरावस्था की भूमिका दी थी। मासूम ऋषि कपूर ने दी गई भूमिका को अच्छी तरह निभाया था। सभी कहते हैं कि इस फिल्म से हुए नुकसान की भरपाई के लिए राज कपूर ने ‘बॉबी’ जैसी प्रेम कहानी के बारे में सोचा। खुद सोच कर देखें। क्या 21 साल के नए हीरो के साथ किसी और प्रकार के विषय पर फिल्म बनाई जा सकती थी या उचित होता? हम सभी जानते हैं कि ‘बॉबी’ की कहानी ख्वाजा अब्बास ने लिखी थी। राज कपूर के साथ उनका पुराना संबंध था। जिस साल ‘बॉबी’रिलीज हुई थी, उसी साल प्रकाश मेहरा निर्देशित ‘जंजीर’ भी रिलीज हुई थी। ‘जंजीर’ ने फिल्मों में अमिताभ बच्चन को ‘एंग्री यंग मैन’की पहचान दी। अमिताभ बच्चन की कामयाब धमाकेदार एंट्री के बावजूद युवा दर्शकों का एक समूह ऋषि कपूर का दीवाना बना रहा।

गौरतलब है कि ऋषि कपूर अपने समकालीन लोकप्रिय स्टारों के मुकाबले में कभी नहीं आए। कवरेज और लेखों में भी उनकी तुलना धर्मेंद्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, जितेंद्र और मिथुन चक्रवर्ती से नहीं की गई। वह तमाम अभिनेताओं के बीच अलग ट्रैक पर चलते रहे। उनके प्रशंसक उन्हें देखते और सराहते रहे। यह खुद में बड़ी बात है क्योंकि उनके आगे-पीछे बड़े भाई रणधीर कपूर समेत अनेक अभिनेता आए और चले गए। वे सभी दो-चार फिल्मों में चमके और फिर लुप्त हो गए। निश्चित ही ऋषि कपूर का व्यक्तिगत आकर्षण और अदाकारी का अंदाज दर्शकों को लुभाता रहा। उन्होंने रोमांटिक हीरो की लकीर जल्दी नहीं छोड़ी। करियर के उत्तरार्ध में उन्हें मल्टीस्टारर फिल्म में अमिताभ बच्चन सरीखे अभिनेताओं के साथ आना पड़ा तो भी उनका रोमांटिक ट्रैक चलता रहा।

इन फिल्मों में अमिताभ बच्चन के किरदार से पैदा हो रहे तनाव को उनकी रोमांटिक जोड़ी तोड़ती और दर्शकों को राहत प्रदान करती थी। ऋषि कपूर की फिल्मों में 23 नई हीरोइन लॉन्च हुईं। इन सभी में नीतू और जयाप्रदा के साथ उनकी जोड़ी ज्यादा पसंद की गई। 1973 में जब वह ‘बॉबी’ में डिंपल कपाड़िया के साथ आए तो दोनों की केमिस्ट्री देखकर सभी को लगा था कि यह रोमांटिक जोड़ी लंबे समय तक चलेगी। लेकिन ‘बॉबी’ की रिलीज के तुरंत बाद डिंपल कपाड़िया ने राजेश खन्ना से शादी कर ली। इससे ऋषि कपूर को बड़ा झटका लगा। उस समय चल रही ज्यादातर हीरोइनें अंदाज और मजाज में उनसे बड़ी लगती थीं, इसलिए ऋषि कपूर को बार-बार खुद के लिए नई जोड़ीदार की तलाश करनी पड़ी। उनकी फिल्मों से आई 23 हीरोइनों में से चार-पांच की ही पारी लंबी चली। हां, नीतू सिंह के साथ उनकी जोड़ी ऑनस्क्रन और ऑफस्क्रीन बनी रही।

ऋषि कपूर ने एक फिल्म का डायरेक्शन भी कि या था। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही उन्हें पता चल गया था कि वह अपने पिता का अनुसरण नहीं कर सकते। पुलओवर पहने, गले में मफलर डाले और गिटार-डफली बजाते हीरो की भूमिकाओं वह ऊबने लगे थे। उन्होंने ऐसी भूमिकाएं निभानी बंद का दीं। तभी खानत्रयी- आमिर, शाहरुख और सलमान, ने आकर उनका मैदान मार दिया था। फिर, वह बुजुर्ग भूमिकाओं में आने लगे। इन भूमिकाओं में उन्हें फिर से पसंद कि या जाने लगा। नई पीढ़ी के वह चहेते बने। खासकर ‘अग्निपथ डीडे’, ‘कपूर एंड संस’, ‘102 नॉट आउट’, ‘दो दूनी चार’, ‘चिंटूजी’, ‘राजमा चावल’ आदि फिल्मों में उन्हें अलग-अलग अंदाज की भूमिकाओं में भी पसंद किया गया। ‘अग्निपथ’ की निगेटिव भूमि का में मिली चौतरफा तारीफ से वह गदगद थे। उनकी ख्वाहिश थी तीनों- ऋषि, नीतू और रणबीर, किसी फिल्म में साथ आएं। अभिनव कश्यप की फिल्म ‘बेशर्म’ में उन्हें यह मौका मिला लेकिन ‘बेशर्म’ ने उन्हें और उनके प्रशंसकों को शर्मिंदा कर दिया।

इरफान बिल्कुल अलग पृष्ठभूमि से फिल्मों में आए। जयपुर में कॉलेज के दिनों में रंगमंच करने के बाद अभिनेता बनने की इच्छा जगी। उम्मीद कम थी कि परिवार से अनुमति मि लेगी लेकिन मां राजी हुईं और उन्हें खुशी-खुशी जाने दिया। वहां से एनएसडी पहुंचे। दिल्ली महानगर में शुरू के उनके दिन और असुरक्षा और डर के थे। छोटे शहर से बड़े शहरों में आया हर महत्वाकांक्षी शख्स ऐसे डर से गुजरता है। एनएसडी में कुछ साथी बने। सुतापा सि कदर मिली जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। इरफान के व्यक्तित्व के निर्माण में सुतापा सिकदर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने इरफान को संभाला, संवारा और निखरने का पूरा मौका और सहयोग दिया। वह नेपथ्य में रहकर इरफान को प्रेरित और प्रोत्साहित करती रहीं।

वर्तमान प्रसिद्धि तक आने में इरफान को अपमान, तिरस्कार और रिजेक्शन के पड़ावों को पार करना पड़ा। इरफान के कैरियर पर नजर डालें तो उन्हें मुंबई आने तक कुछ छोटी फिल्में मिल चुकी थीं। उनकी‘कमला की मौत’, ‘एक डॉक्टर की मौत’ और ‘दृष्टि ’ जैसी फिल्में आने को तैयार थीं। याद करें तो ये फिल्में पैरेलल सिनेमा के तलछट के रूप में नजर आती हैं...पैरेलल सिनेमा के अवसान काल की इन फिल्मों से उन्हें पेशेवर फायदा नहीं हुआ। उन्हें आजीवि का और अपने को बचाए रखने के लिए टीवी में जाना पड़ा। उन्हें थिएटर करना नहीं था। इस मामले में वह एकदम स्पष्ट थे। श्याम बेनेगल के टीवी शो ‘भारत एक खोज’ में अलबरूनी की भूमि का से उन्होंने शुरुआत की। ‘चाणक्य’,‘चंद्रकांता’, ‘बनेगी अपनी बात’ और छोटे-बड़े टीवी शो से वह आगे बढ़ते रहे। लगातार टीवी शो करने से आई एकरसता से वह पक रहे थे। तभी उन्हें आसिफ कपाड़िया की फिल्म ‘वारियर’ मिली। इस फिल्म में मिले मौके से उनकी खास पहचान बनी।

देश-विदेश के निर्देशकों ने गौर किया। फिल्में मिलने लगीं। एनएसडी के उनके दोस्त तिग्मां शु धूलिया ने ‘हासिल’ में उन्हें भूमिका दी। इस भूमिका में वह पसंद किए गए। फिर विशाल भारद्वाज की ‘मकबूल’मिली। दोनों फिल्मों से उनकी दिशा और मंजिल का संकेत दे दिया। हालांकि वह उन दिनों मेनस्ट्रीम हिंदी सिनेमा में भी जोर-आजमाइश करते रहे लेकिन उनकी पहचान अलहदा किस्म के अभि नेता के रूप में ठोस होती गई। 2006 में आई मीरा नायर की ‘नेमसेक’ से उन्हें व्यापक पहचान मिली। इस फिल्म से इरफान के रेन्ज का पता चला। ‘नेमसेक’ ने उनके लिए पश्चिम की फिल्मों के द्वार खोल दिए। हिंदी में भी उनकी भूमि काओं पर ध्यान दिया जाने लगा। धीरे-धीरे इरफान भरोसेमंद अभिनेता के रूप में उभरे और प्रचलित नायकों से अलग छवि और मुद्राओं के साथ वह फिल्मों में नजर और पसंद आए।

‘द लंच बॉक्स’, ‘हिंदी मीडियम’, ‘किस्सा ’ आदि फिल्मों में हम देखते हैं कि वह एक साथ अनेक धरातलों पर मौजूद थे। अमेजॉन प्राइम की एक वेब सीरीज की शूटिंग के दौरान उन्हें अपनी बीमारी का पता चला। बीमारी की गंभीरता और लंबे इलाज की सच्चाई को समझते हुए उन्होंने फिल्मों में अभिनय के सारे काम रोक दिए। बीमारी के दिनों में लंदन से उन्होंने एक पत्र इन पंक्ति यों के लेखक को भेजा था जो जून, 2018 में सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपा था। उस पत्र को ध्यान से पढ़ें तो इरफान ने अनिश्चितता के मध्यआगत का संकेत दे दिया था। आखिरकार 29 अप्रैल, 2020 को उनका स्टॉप आ गया और वह जिंदगी की गाड़ी से उतर गए।

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