‘रोटी, कपड़ा और मकान’: प्रेम, धोखा और बेरोजगारी की भावुकता से भरी फिल्म जो जीने के लिए समझौते को बयां करती है

रिलीज होने के 45-46 साल बाद भी, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ अपनी प्रासंगिकता की महक बरकरार रखे हुए है। बेरोजगारी का मुद्दा हमारे सामाजिक ढांचे को लगातार परेशान कर रहा है। मनोज कुमार ने मनोरंजन के बड़े-बड़े गुच्छों के साथ अपने स्लोगन की थीम को बांधा था।

फोटो : सोशल मीडिया
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सुभाष के झा

आज जब मनोज कुमार एक तरह से रिटायर हो चुके हैं, तो ऐसे में व्यावसायिक हिंदी सिनेमा में उनके महत्वपूर्ण योगदान की उपेक्षाकरना आसान है। उन्होंने 1967 में फिल्म‘उपकार’ के साथ आधिकारिक रूप से निर्देशन में कदम रखा था। इससे पहले वह देशभक्तिपूर्ण फिल्म‘शहीद’ का परोक्ष तौर पर निर्देशन कर चुके थे। लेकिन ‘उपकार’ के बाद मनोज कुमार ने सितारों से भरी हुई महाकाव्य की तरह जबरदस्त संगीत के साथ बनाई फिल्मों के जरिये सुनहरे पर्दे को जगमगाया। सन 1970 में ‘पूरब और पश्चिम’ आई, 1972 में ‘शोर’ और इसके बाद 1974 में ‘रोटी, कपड़ा और मकान’। कई सितारों वाली ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ प्रेम, विश्वासघात और बेरोजगारी की भावुकता से भरी हुई कहानी थी। इसमें मनोज कुमार की भारत के जन-साधारण पुरुष भारत की भूमिका में वापसी देखी गई जिसमें उस साधारण आदमी की अंतर-आत्मासमाज में बढ़ते भ्रष्टाचार और जीने के लिए समझौता करने के दबाव से जूझने की अक्षमता से छलनी है।

जहां ‘उपकार’ लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे से प्रेरित थी, वहीं ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ का आधार इंदिरा गांधी का ‘गरीबी हटाओ’ स्लोगन था। लिहाजा, फिल्म के एक दृश्य में भारत क्रोध से तमतमाता हुआ यूनिवर्सिटी की अपनी डिग्री को अपने पिता की चिता की आग के हवाले कर देता है। ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के केंद्र में त्रिकोणीय प्रेम कहानी है जिसमें बेरोजगार नायक भारत (मनोज कुमार) को उसकी महत्वाकांक्षी प्रेमिका शीतल (जीनत अमान) धोखा देती है और एक अमीर उद्योगपति मोहन बाबू (शशिकपूर) से शादी करने की राह चुनती है। इसके बावजूद इस फिल्म में एक स्पष्ट राजनीतिक अंतर्धारा है। प्रतीकात्मकता से भरे हुए कथानक में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत का उत्कृष्ट इस्तेमाल किया गया, खासकर ‘मैं ना भूलूंगा’ गाने में। इस गाने में नायक पैसे के लिए अमीर व्यक्ति से विवाह करने वाली और विश्वासघात के कारण अपराध-बोध से ग्रसित नायिका को तंज के साथ पुराने दिनों की याद दिलाता है।

मनोज कुमार इससे इनकार करते हैं कि‘रोटी, कपड़ा और मकान’ का प्रेम त्रिकोण गुरुदत्त की ‘प्यासा’ की याद दिलाता है जिसमें कवि को उसकी प्रेमिका एक अमीर आदमी के साथ शादी करने के लिए छोड़कर चली जाती है। वेश्या गुलाबो (वहीदा रहमान) संवेदनशील कवि के घायल हृदय पर मरहम लगाती है। ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में वह निष्पाप-दिल की तुलसी (मौसमी चटर्जी) है जो भारत के टूटे हुए दिल में एक उम्मीद जगाती है। रिलीज होने के 45-46 साल बाद भी, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ अपनी प्रासंगिकता की महक बरकरार रखे हुए है। बेरोजगारी का मुद्दा हमारे सामाजिक ढांचे को लगातार परेशान कर रहा है। मनोज कुमार ने मनोरंजन के बड़े-बड़े गुच्छों के साथ अपने स्लोगन की थीम को बांधा था। जीनत अमान के अभिनय और लता मंगेशकर की मन-मोहक आवाज के साथ ‘हाय-हाय ये मजबूरी’ गीत आज भी फिल्म का एक मुख्य आकर्षण है। इसी तरह से बढ़ती कीमतों के खिलाफ‘महंगाई मार गई’ गाना भी उतनी ही ध्यान खींचता है।

कई स्तरों पर भावकुतापूर्ण प्लॉट के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक चिंताओं के मिश्रण से गुंथी हुई कहानी फिल्म के अंतिम क्षणों तक, जहां शीतल (जीनत अमान) को प्रायश्चित करने के लिए अपनी जान देनी होती है, दर्शकों को बांधे रखने के अपने उद्देश्य से नहीं भटकती। जब यह फिल्म रिलीज हुई थी तो इसे कम करके आंका गया था लेकिन आज के दिन यह हमारे सामने ढह गए महान भारतीय सपने के लिए लेखक, निर्देशक और अभिनेता की वास्तविक चिंता के रूप में सामने आती है। उनके सिनेमा ने निरपवाद रूप से विभाजन के बाद भारतीयों के मोहभंग के विलाप को दर्शाया। ‘उपकार’ के किसान से लेकर शोर के ‘श्रमजीवी’ पिता तक, मनोज कुमार ने नेहरूवादी सपने के विलोपन को प्रतीक बनाया। ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ में कुमार ने कहानी कहने में एक रूखेपन और पुरुषत्व को समाहित किया। चाहे वह भारत के भाई विजय (अमिताभ बच्चन) के सामाजिक अन्याय के खिलाफ दबे हुए क्रोध को दर्शाना हो जो अपने भाई के साथ निर्णायक टकराव में फूट पड़ता है या जिस तरह से पंसारी के पीछे वाले कमरे में आटे से लथपथ असहाय तुलसी (मौसमी चटर्जी) के साथ बलात्कार किया जाता है (उस समय इस सीन के उत्तेजक फिल्मांकन के लिए तीखी भर्त्सना हुई थी), मनोज कुमार की रचनात्मक आक्रमकता स्वयं अदाकारी की भाव-विह्वल छवियों में प्रकट होती है और मुक्तिका मंचन अप्रत्याशित रूप से बहुत ही ऊंचे स्वर में होता है।

मनोज कुमार को ड्रामा हमेशा बहुत ही तीव्र और गंभीर पसंद था लेकिन वह कहानी के प्लॉट पर बढ़ाए गए वजन के बावजूद अपने चरित्रों को कहीं भी लड़खड़ाने नहीं देते थे। वे सभी (चरित्र) विविधता से तराशे गए उत्कीर्ण रत्न थे। प्रेमनाथ जिन्होंने अपने आप को मनोज कुमार की ‘शोर’ फिल्म में महान परोपकारी खान बादशाह के रूप में अमर कर दिया था, वह ‘रोटी कपड़ा और मकान’ में तलवारबाज सरदार हरनाम सिंह के रूप में लौट आते हैं। इन सभी दिग्गज चरित्रों के बीच अरुणा ईरानी द्वारा निभाए गए एक घटिया व्यापारी की रखैल के पश्चाताप से ग्रस्त हैरान कर देने वाले चरित्र को नजर अंदाज कर देना आसान है। अरुणा पर फिल्माए गए गीत, ‘पंडित जी मेरे मरने के बाद बस इतना कष्टउठा लेना, मेरे मुंह में गंगाजल की जगह थोड़ी मदिरा टपका देना’ मनोज कुमार के सिनेमा में हाशिये पर खड़े उन लोगों को परिभाषित करता है जिनके पास अपनी तकदीर पर हंसने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जब जीनत अमान द्वारा निभाए गए शीतल का चरित्र पैसे की खातिर शादी करने का फैसला लेता है, तो मनोज टेलीविजन पर गाना गाते हैं – और नहीं बस और नहीं, गम के प्याले और नहीं।।।। यह क्षण अपने आम में इतना अनोखा है कि इसमें नायक की जो मनोव्यथा है, वह उसके हृदय से निकलकर स्क्रीन के बाहर आप पर अपना कब्जा जमा लेती है।

‘रोटी, कपड़ा और मकान’ को ढीला-ढाला आंकना गलत था। सच तो यह है कियह फॉर्मूला सिनेमा के सभी ‘माल-मसालों’ को एक बड़े नजरिये के दायरे में समेट लाता है। प्लॉट में ड्रामा और टकराव को बहुत ही बारीकी से गढ़ा गया है। विशद चीजों को संपादित किया गया और किसी भी तरह के फालतू क्षण के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा गया। अद्वितीय फिल्मकार की यह समृद्ध कृति‘रोटी, कपड़ा और मकान’ ‘ज्वलंत मुद्दों’ पर अपने स्टैंड के लिए दृढ़ता से खड़ी है। अमिताभ बच्चन और मौसमी चटर्जी द्वारा विशेषतौर से निभाए गए चरित्र भ्रष्ट राजनीति और राजनेताओं जिन्होंने मध्यवर्ग की आकांक्षाओं को ध्वस्तकर दिया है, के प्रतिनिराशावाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन फिर भी फिल्म का स्वर निराशाजनक नहीं होता है। यहां तक जब भारत पूर्णतया कुंठा में अपनी ग्रेजुएशन की डिग्री को पिता की चिता की आग में फेंक देता है, तब भी हमें मालूम है किवह इस अंधेरे में से रोशनी ढूंढ ही लेगा। यही सिनेमा का जादू होता है। हम तकलीफ में भी सपने देख सकते हैं और उम्मीद भी कर सकते हैं।

‘रोटी, कपड़ा और मकान’ के बारे में मनोज कुमार ने कहा था : “जब मैं आठवीं कक्षा में था, एक सीनियर विद्यार्थी, जिसका नाम दीवान था, ने स्कूल के कार्यक्रम में एक गाना गाया था, ‘मांग रहा है हिंदुस्तान रोटी कपड़ा और मकान’।” वहीं से यह विचार मुझे मिला। रोटी, कपड़ा और मकान अभी सामयिक है। यह फिल्म 1972 में एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट से प्रेरित थी। एक युवा ग्रेजुएट को जैसे ही डिग्री मिलती है तो वह वाइस-चांसलर के सामने ही उसको फाड़ देता है। इसी ने मुझे डिग्रीऔर जॉब के बारे सोचने को विवश किया। जिस समय मैंने शशिकपूर, जीनत अमान, मौसमी चटर्जी और अमिताभ बच्चन के साथ यह फिल्म बनाई उस समय, इसे एक मल्टी-स्टारर फिल्म कहा गया। मैं सितारों को नहीं अभिनेताओं को साइन करता हूं। अमित को जब मैंने साइन किया था तो वह स्टार नहीं था। मैं पहला फिल्म मेकर था जिसने उसे एक रोल का ऑफर दिया था जबकि वह उस समय कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहा था। जब मैं अपनी फिल्मों ‘पूरब और पश्चिम’, ‘यादगार’ और ‘पहचान’ की शूटिंग कर रहा था तो वह मुंबई आया था। उसने कुछ फिल्में साइन की थी लेकिन उसे रिप्लेस कर दिया गया था। मुझे याद है कि मैंने राजकमल स्टूडियो में उससे कहा था कि वह कोलकाता वापस नहीं लौटे क्योंकि मेरे पास उसके लिए एक खास रोल है। इस तरह से अमित के कॅरियर में ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ आई। मौसमी की भूमिका।।। मैंने कोलकाता में उसे तरुण मजूमदार की बांग्ला फिल्म‘बालिका वधू’ में देखा था। वह साधारण औरत के बलात्कार का प्रतीक बनी। जहां तक संगीत का सवाल है तो इसका श्रेय लक्ष्मीकांत और उनके सहयोगी प्यारेलाल को जाता है।”

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