‘साहो’ समीक्षा: न निर्देशन, न नरेशन, बस ‘बाहुबली’ प्रभास की ‘फैन सेवा’ करती फिल्म

संक्षेप में कहा जाये तो ‘साहो’ एक्शन थ्रिलर है जिसे बहुत ज्यादा खींचा गया है। कहानी का ‘रहस्य’ बहुत स्पष्ट है, निर्देशन और नरेशन दोनों लचर।

फोटो : सोशल मीडिया
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प्रगति सक्सेना

बहुत सारा ग्लैमर, चमक धमक, एक्शन, षड्यंत्र है, लेकिन ये सब जल्द ही उबाऊ और बेहूदा लगने लगता है। ऐसा ही होता है जब हॉलीवुड की क्लासिक स्टाइलाइज्ड फिल्मों से प्रेरित होकर हमारे यहां फ़िल्में बनायीं जाती हैं। दरअसल इस तरह की हॉलीवुड फिल्मों में ग्लैमर और मारधाड़ के साथ-साथ एक सूक्ष्म और जटिल अंतर्कथा भी चलती है, किरदारों में तमाम तरह के शेड्स होते हैं जो दरअसल उस फिल्म को प्रभावशाली बनाते हैं। लेकिन, हमारे यहां इस तरह की फ़िल्में ऊपरी चमक धमक और एक्शन सीक्वेंस से आगे निकल ही नहीं पातीं। ‘साहो’ भी इसकी एक मिसाल भर है।

बेशक, सुजीथ द्वारा निर्देशित ‘साहो’ में ‘बाहुबली’ से दर्शकों के दिलों पर छाये दक्षिण भारतीय अभिनेता प्रभास की स्क्रीन प्रेजेंस प्रभावशाली है। लेकिन, उनकी दक्षिण भारतीय लहजे में बोली गयी हिंदी कहीं कहीं क्यूट लगती है तो कहीं हास्यप्रद, खासकर रोमांटिक सीन्स में।

नील नितिन मुकेश एक अच्छे अदाकार हैं, लेकिन बदकिस्मती से उन्हें उनके योग्य भूमिकाएं अब तक नहीं मिल पाईं। बहरहाल, अगर वाकई इस फिल्म में किसी की तारीफ़ होनी चाहिए तो वो हैं चंकी पांडे जो अब तक के अपने एक्टिंग करियर में कुछ ख़ास हासिल नहीं कर पाए हैं। लेकिन ‘साहो’ में उनकी स्क्रीन प्रेजेंस असरदार है और एक्टिंग नियंत्रित जबकि एक विलेन के तौर पर वे थोड़ा लाउड हो सकते थे।

श्रद्धा कपूर समेत बाकी सब अदाकार फिल्म में महज़ परछाईं भर हैं, ताकि प्रभास के किरदार को उभारा जा सके। एक बात प्रभास की स्क्रीन प्रेजेंस के बारे में ज़रूर होनी चाहिए। फिल्म की चाहे कितनी आलोचना की जाये, लेकिन प्रभास अपने स्वाभाविक सांवले रंग के साथ असरदार लगते हैं। और तो और, सिर्फ यही बात उनके स्टंट और मारधाड़ वाले ‘सुपर मैन’ जैसे किरदार को एक इंसानी क्वालिटी देती है। हिंदी फिल्मों के गोरी त्वचा से अभिभूत चिकने चुपड़े नायक प्रभास से कुछ सबक ले सकते हैं।

फिल्म पर वापस आते हैं, हालांकि फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जिसका खास ज़िक्र किया जाए। गैंगस्टर्स की दुनिया में असली डॉन के उत्तराधिकारी की खींचतान पर केन्द्रित ये एक प्रतिशोध की कहानी है। फिर विलेन्स की इस दुनिया में हीरो (या एंटी हीरो) यानी असली डॉन का पदार्पण होता है, जो उनसे ज्यादा चालाक और षड्यंत्रकारी है—इसी का नाम है साहो...

और बीच में (जैसा कि उपेक्षित ही है) बहुत सारा एक्शन (जो कभी कभी हास्यास्पद होने की हद तक पहुंच जाता है), विस्फोट वगैरह हैं। कुछ अच्छे एक्शन सीक्वेंस हैं जो स्पेशल इफेक्ट्स में महारथ को साबित करते हैं।

शंकर एहसान लॉय, मुहम्मद गिबरान, तनिष्क बागची, गुरु रंधावा और बादशाह का संगीत बकवास और फीका है। दरअसल ये संगीत बहुत मशीनी लगता है। लगभग ‘असंगीत’ और एक्शन से बोझिल इस फिल्म में ज़रा ‘आउट ऑफ़ प्लेस’ भी। हिंदी फ़िल्मी संगीत ने एक भव्य दौर देखा है। उसका ऐसा पतन दुखी कर जाता है, कम से कम शंकर एहसान लॉय से ये उम्मीद नहीं थी।

संक्षेप में, ‘साहो’ एक ऐसा एक्शन थ्रिलर है जो कुछ ज्यादा खींचा गया है जिसका ‘रहस्य’ दरअसल ज़ाहिर सा रहता है फिल्म के दौरान। फिल्म की कहानी, निर्देशन, नरेशन सब लचर ही है। किरदार रोबोट जैसे लगते हैं यहाँ तक कि श्रद्धा कपूर भी जो अपनी चंद फिल्मों में कुछ भाव परवान रोल कर चुकी हैं।

फिल्म के कुछ संवाद हैं जिनमें इस इतनी महंगी फिल्म का सार निहित है। श्रद्धा कपूर गोलियों की बौछार के बीच ‘साहो’ यानी प्रभास से पूछती हैं, “ये कौन लोग हैं?”

प्रभास जवाब देते हैं, “फैन्स’

वो फिर पूछती हैं, “लगता है, ये तुम्हें मारना चाहते हैं?”

साहो जवाब देता है, “हाँ, डाई-हार्ड फैन्स हैं।”

ये फिल्म उन्ही फैन्स के लिए प्रभास की ‘फैन-सर्विस’ है, बास।

तो, अगर आप प्रभास के फैन हैं, या अगर आप अब तक बाहुबली के असर से बाहर नहीं निकल पाए हैं या फिर अपने हिंसक और बोझिल वातावरण को बेवकूफाना मारधाड़ में भूलना चाहते हैं, तो ये फिल्म देखें, वरना ‘साहो’ समय और पैसे की बर्बादी भर है।

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