शकील बदायूंनी: जिंदगी और मोहब्बत के गीत लिखने वाला शायर, जिसके नगमे प्यार करने वाले आज भी गुनगुनाते हैं

जहां एक तरफ फिल्मों में शकील बदायूंनी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी, वहीं साहित्य की दुनिया में भी उनकी शोहरत खुशबू बनकर फैल रही थी। उनकी गजलों को उनके समकालीन गायक-गायिकायों ने ही नहीं बल्कि उनके बाद वाली पीढ़ी के गायकों ने भी स्वर दिये।

फोटोः सोशल मीडिया
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इकबाल रिजवी

उत्तर प्रदेश के बदायूं में आज ही के दिन साल 1916 में जन्मे शकील बदायूंनी को परिवार में धार्मिक माहौल मिला। इसका गहरा असर उन पर जीवन भर रहा। इन धार्मिक संस्कारों की वजह से ही शायरी की बुलंदियों पर चढ़ते रहने के बावजूद शकील ने कभी शराब को हाथ नहीं लगाया। जब शकील फिल्मों में गीत लिखने लगे तो उनके धार्मिक संस्कारों ने ही कई कालजयी गीत लिखवाए।

मिसाल के लिये- “मन तड़पत हरि दर्शन को आज” और “ओ दुनिया के रखवाले सुन दर्द भरे मेरे नाले (बेजू बावरा)”, “इंसाफ का मंदिर है ये भगवान का घर है (अमर)”, “जय रघुनन्दन जय गोपाला (घराना)”, “बेकस पे करम कीजिये सरकारे मदीना (मुगले आजम)”।

भारत की आजादी से पहले वाले दशक में साहित्य में प्रगितशीलता की ऐसी आंधी चलना शुरू हुई कि उससे बचने वाले साहित्यकार चर्चा में ही नहीं आते थे। गरीबों, गुलामों, मजदूरों, किसानों और जुल्म के शिकार लोगों के हालात पर लिखने वाले ही साहित्य की दुनिया में शोहरत हासिल कर रहे थे। ऐसे में फिराक गोरखपुरी, जिगर मुरादाबादी और शकील ही ऐसे नाम थे जो जिंदगी और मोहब्बत की शायरी करके भी लोगों के दिल में समाए रहे।

मुशायरों की दुनिया में धाक जमाने के बाद शकील ने जब फिल्मी दुनिया का रुख किया तो पहली फिल्म मिली ‘दर्द’ (1947)। इसके सभी गीत न सिर्फ उस वक्त हिट रहे। बल्कि 72 साल बाद भी इस फिल्म का एक गीत “अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का” आज भी भुलाए नहीं भूलता। फिल्म ‘दर्द’ के संगीतकार थे नौशाद और यहीं से शकील और नौशाद की दोस्ती की ऐसी बुनियाद पड़ी की शकील ने करीब 95 प्रतिशत फिल्मों में नौशाद के संगीत में ही गीतों की रचना की।

मोहब्बत ऐसी भावना है जिस पर शकील जीवन भर लिखते रहे। साहित्यिक गीत भी और फिल्मी नगमे भी। ये काम दूसरे गीतकारों ने भी किया, लेकिन शकील के गीतों का लहजा उन्हें सबसे अलग खड़ा करता है।

“ज़िंदाबाद...ज़िंदाबाद..ऐ मोहब्बत ज़िंदाबाद”, “बचपन की मोहबब्त को दिल से ना जुदा करना”, “मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए”, “जब दिल से दिल टकराता है मत पूछिये क्या हो जाता है”, “नैन लड़ जईहें तो मनवा में खटक होइबे करी”, “ना जाओ सइंया छुड़ा के बइयां”, “जब चली ठंडी हवा जब चली काली घटा”, “कल रात ज़िंदगी से मुलाकात हो गयी”, “हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं” ऐसे ही गीत हैं जो कालजयी हैं।

शकील ने नौशाद के बाद सर्वाधिक हिट गीत संगातकार रवि के लिए लिखे। ‘चौदहवीं का चांद’, ‘दो बदन’, ‘घराना’, ‘नर्तकी’, ‘फूल और पत्थर’ जैसी म्यूजिकल हिट फिल्में रवि और शकील की जोड़ी के खाते में ही जाती हैं। शकील को तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड मिला. इसमें दो बार ‘चौदहवीं का चांद’ और ‘घराना’ के लिए रवि के संगीत में यह उपलब्धि हासिल हुयी।

बहुत नफासत और सलीके से जिंदगी गुजारने वाले शकील बहुत शौकीन मिजाज व्यक्ति थे। वे खास पकवान बनाने के लिए बावर्ची लखनऊ से बुलाते थे। शिकार खेलने के लिए नौशाद सहित कई फिल्मी हस्तियां शकील के साथ जीप में सवार हो कर मुंबई से मध्य प्रदेश पहुंचती थीं। पान खाने के शौकीन शकील घर से निकलते वक्त हमेशा चांदी की डिबिया में पान साथ रखते थे।

जहां एक तरफ फिल्मों में शकील की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी, वहीं साहित्य की दुनिया में भी उनकी शोहरत खुशबू बन कर फैल रही थी। उनकी गजलों को उनके समकालीन गायक गायिकायों ने ही नहीं बल्कि उनके बाद वाली पीढ़ी के गायकों ने भी स्वर दिये। अब भला बेगम अख्तर की गाई शकील की इन गजलों को कोई कैसे भुला सकता है। ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, और मेरे हमनफस मेरे हमनवा मुझे दोस्त बने के दगा ना दे

शकील का सिक्का चल ही रहा था कि 54 साल की उम्र में टीबी के रोग की चपेट में आने से 20 अप्रैल 1970 को उनकी मौत हो गयी। उनकी मौत के बाद न तो फिल्म जगत ने और न ही अदब की दुनिया ने कभी शकील की शायरी का मूल्यांकन किया। लेकिन जन जन में लोकप्रिय होने वाले साहित्यकार किसी मूल्यांकन के मोहताज नहीं होते। शकील की रचनाएं आज भी ना जाने कितने होठों पर मचलती रहती हैं।

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