लघु फिल्म ‘संडे’: चेहरे की भंगिमाओं, मुस्कुराहट और स्पर्श की कहानी

अरुण फुलारा की लघु फिल्म ‘संडे’ अपने आप में गुम एक समलैंगिक अधेड़ उम्र के व्यक्ति कांबले के बारे में है जो दोहरी जिंदगी जी रहा है। वह अपने पड़ोस में हज्जाम का काम करने वाले लड़के जान पर आसक्त है।

फोटो: सोशल मीडिया
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गरिमा सधवानी

अरुण फुलारा की लघु फिल्म ‘संडे’ अपने आप में गुम एक समलैंगिक अधेड़ उम्र के व्यक्ति कांबले के बारे में है जो दोहरी जिंदगी जी रहा है। वह अपने पड़ोस में हज्जाम का काम करने वाले लड़के जान पर आसक्त है। वह उसके सैलून में हर रविवार को बस इसलिए जाता है ताकि वह उसे देख सके। मजेदार बात यह है कि फुलारा को इस फिल्म के बारे में विचार एक सैलून में ही आया जब एक नाई द्वारा उनके गाल को छूने पर उन्हें सनसनी महसूस हुई। उन्हें इस बात की उत्सुकता हुई किअगर एक व्यक्ति समलैंगिक हो और किसी नाई के प्रति आसक्त हो तो ऐसी छुअन का उस पर क्या प्रभाव पड़ेगा। व्यक्तिगत स्तर पर अकेलेपन से निपटने के बाद, फुलारा यह जानते थे कि उन्हें इस कहानी को बाहर लाना है। वह कहते हैं, “इस फिल्म का जन्म वास्तव में वहीं (सैलून) से हुआ।”

लेकिन वह इस फिल्म को एक विस्तार से भरे कथानक या बहुत सारे संवादों के साथ जटिल नहीं बनाना चाहते थे। वह दर्शकों को केवल यह महसूस करना चाहते थे कि जब कांबले उस कुर्सी पर बैठा होता है तो वह क्या देखता है और क्या महसूस करता है। वह इसका सारा श्रेय कलाकार श्रीकांत यादव को देते हैं जिन्होंने बहुत ही जटिल भावनाओं को अपने अभिनय के सूक्ष्मभावों के जरिये अभिव्यक्त किया। शूटिंग के दौरान मुख्य फोकस सिनेमेटोग्राफी पर था। फुलारा इसमें कांबले के उत्साह को ‘रह-रह कर और चोरी-छिपे देखने’ के जरिये दिखाना चाहते थे। वह ऐसा चित्रण करना चाहते थे जो एक ऐसे किशोरवय के प्रेम की तरह हो जो प्रेम में तो है लेकिन उस प्रेम की अभिव्यक्ति से शर्माता है।

दिल से रोमांटिक फुलारा को पुरानी हिंदी फिल्मों और गानों से प्रेरणा लेनी पड़ी। फिल्म में वह रोमांटिसिज्म के बारे में बातें करते हैं: कांबले को एक ऐसी पृष्ठभूमि के बीच दिखाया गया है जिसमें एक व्यक्ति अपने प्रेमी के साथ बकबक कर रहा होता है और वहीं, एक बच्चा शोर से भरे और परेशान करने वाला वीडियो गेम खेल रहा होता है। और इतने शोर और कोलाहल के बावजूद कांबले को अगर कुछ दिखता है तो वह है जान। दिलचस्प बात यह है कि फुलारा का ऑरिजनल आइडिया यह था कि जब कांबले दाढ़ी बनवा रहा हो तो पृष्ठ भूमि में ‘सागर किनारे दिल ये पुकारे’ गाना बजे लेकिन उन्हें इस गीत के इस्तेमाल का अधिकार नहीं मिला।

पुराने हिंदी गानों के अलावा, ‘संडे’ लघु फिल्म पर यूरोपीय सिनेमा के सौंदर्य शास्त्र का प्रभाव भी था जिसमें एक चरित्र को केवल अवलोकन और न्यूनतम संवादों के जरिये उभारा जाता है। फुलारा कहते हैं, “एक फिल्म तब ही अधिक आडंबरहीन और स्पष्ट बनती है।”और जब ‘संडे’ बनकर तैयार हो गई तो फुलारा ने उम्मीद की थी कि यह फिल्म एक खास तरह के दर्शकों के साथ ही प्रतिध्वनित होगी, यानी वे दर्शक जो सिनेमा को जानते हैं जिन्होंने बहुत सारा अंतरराष्ट्रीय सिनेमा देखा है और जो फिल्म समारोहों में जाते रहे हैं। लेकिन अपनी सूक्ष्मता और गूढ़ता के बावजूद यह फिल्म सभी उम्मीदों को पार कर गई। फुलारा कहते हैं किउन्हें दर्शकों से फीडबैक मिला और उन्होंने (दर्शकों ने) बताया कि“फिल्म वास्तव में बहुत कुछ कहे बिना ही बहुत कुछ कहती है और किरदार के प्रति अंतरंग तथा सच्ची बनी रहती है।”

इंजीनियर, एमबीए और अब फिल्मकार फुलारा सिनेमा और कहानी कहने की ताकत पर विश्वास करते हैं। उनके अनुसार, फिल्मकार और एनिमेशन करने वाले तो खिलौनों, कारों और श्रेक जैसे चरित्रों के प्रतिभी सहानुभूति पैदा करने में सक्षम होते हैं।

हालांकि, जिन चरित्रों के बारे में बहुत कम बातें की जाती हैं उन्हें सामने लाने के आग्रह के साथ फुलारा ने कुछ मौकों का इस्तेमाल किया। उदाहरण के लिए, कांबले और जान के बीच में उम्र का फासला है और साथ ही वे जिस सामाजिक परिवेश से आते हैं, उसमें भी अंतर है। जो नाई है वह मुस्लिम है लेकिन पात्रों के धर्म और जाति को पूरी तरह से पृष्ठ भूमि में रखा गया है।

फुलारा कहते हैं, “अब इस बात पर जागरूकता है कि जिस तरह की कहानियां हम अपनी फिल्मों में देखते हैं, वह हमारे समाज के एक बड़े हिस्से के साथ न्याय नहीं करती हैं।” इसलिए, उनका नायक विशेषाधिकार वर्ग से नहीं है, और वह उस वर्ग या सेक्सुअल या आयु वर्ग से भी नहीं आता है जिसके पास ताकत है। साथ ही, फुलारा बताते हैं कि फिल्म के लिए शोध के क्रम में वह उन लोगों से मिले जिन्हें ‘समझौता’ करना पड़ा था, वे अपनी बंद जिंदगी से बाहर नहीं आ सके और उनका जीवन हेटरोसेक्सुअल शादियों में समाप्त हो गया। लेकिन यह फिल्म केवल सेक्सुअलिटी के बारे में नहीं है। फुलारा के अनुसार, यह उन अंतरंग क्षणों के बारे में और उस छुअन के बारे में है जिसका अनुभव कांबले हर रविवार करता है और जो उसके सामान्य जीवन में नहीं है। यह भी एक वजह है कि फुलारा ने इस फिल्म को एक खास शैली में वर्गीकृत नहीं किया।

फिल्म के शानदार दृश्यों में एक दृश्य यह है जब कांबले घर लौटता है और आईने में अपना चेहरा देखते हुए अपनी मूंछों पर हाथ फेरता है। यह दृश्य स्क्रिप्ट में नहीं था, यह कलाकार की खुद की ईजाद थी। यह दृश्य मर्दानगी को बनाए रखने और अंततः खुद को गले लगाने के बीच उसके आंतरिक द्वंद को करीब-करीब इंगित करता है। यह दृश्य दर्शकों को कांबले की सामान्य जिंदगी के अंदर झांकने का मौका देता है। फिल्म में बस यही एकमात्र दृश्य है जो हमें सैलून के बाहर देखने को मिलता है। फुलारा बताते हैं कि वह सैलून की दुनिया से बाहर किरदार को निर्मित नहीं करना चाहते थे और न ही उसकी जिंदगी और परिवार के बारे में बात करना चाहते थे क्योंकि यह हमें उन क्षणों से परे ले जाता जिनका अवलोकन हम तब कर पाते हैं जब वह कुर्सी पर बैठा होता है।

इन दिनों फुलारा अपनी दूसरी लघु फिल्म ‘माई मदर्सगर्लफ्रेन्ड’ पर काम कर रहे हैं। वह इसमें दो उम्रदराज कामकाजी महिलाओं के बीच के रोमांटिक रिलेशनशिप और जब उनमें से एक के बेटे को इस बारे पता चलता है तो फिर क्या होता है, इसको एक्सप्लोर कर रहे हैं।

‘संडे’ से एकदम विपरीत, इसमें ज्यादा संवाद होंगे और यह एक ज्यादा रोचक पटकथा के साथ सामने आएगी। इस लघु फिल्म के लिए उन्होंने पिछले वर्ष कशिश क्यूदृष्टि फिल्म की ग्रांट जीती थी। यह फिल्म कशिश फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर के लिए मई में पूरी हो जाएगी। इसके अलावा फुलारा कुछ फीचर और लघु फिल्म की स्क्रिप्ट के साथ-साथ एक डॉक्युमेंट्री पर भी काम कर रहे हैं जिसे उन्होंने पिछले वर्ष कुमाऊं में शूट किया था। साथ ही वह अपनी पहली फीचर फिल्म ‘माई होम इज इन द हिल्स’ के लिए निर्माताओं की तलाश कर रहे हैं

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