आज ‘कबीर सिंह’ के दौर में लोकरुचि और लोकप्रिय धारणा के खिलाफ तर्क देना भी ‘सूडो’ हो जाना है

फिल्मों में कबीर नाम का गलत इस्तेमाल जारी है। इन किरदारों में से कुछ ही मध्ययुगीन भक्त कवि कबीर की परछाई हैं। बाकी सभी खल, निगेटिव और ग्रेशेड के किरदार हैं। आगे और कबीर आएंगे, जो समन्वय, समरसता और समानता के कवि कबीर के नाम को और निगेटिव छवियां देते रहेंगे।

फोटोः सोशल मीडिया
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अजय ब्रह्मात्मज

संदीप रेड्डीवांगा की फिल्म ‘कबीर सिंह’ को रिलीज हुए 15 दिन से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन वाद, विवाद और प्रतिवाद का सिलसिला नहीं थम रहा है। फिल्म लगातार अच्छा कारोबार कर रही है। ट्रेड पंडित इसकी कामयाबी से चौंके हुए हैं। ट्रेड की भाषा में इसे ‘सरप्राइज हिट’ कहते हैं। ‘कबीर सिंह’ ने अभी तक 150 करोड़ से अधिक का कारोबार कर लिया है, इन पंक्तियों के छपने तक हो सकता है कि 200 करोड़ का आंकड़ा पार हो जाए।

इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी और कमाई के तर्क से कुछ समर्थक कह रहे हैं कि फिल्म बहुत अच्छी है, फिल्म को स्त्री विरोधी और मर्दवादी बता रहे आलोचकों को ‘सूडो फेमिनिस्ट’ और न जाने क्या-क्या नाम दिए जा रहे हैं? हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जिसमें लोकरुचि और लोकप्रिय धारणा के विरुद्ध सुसंगत बातें करना भी ‘सूडो’ हो जाना है। ‘कबीर सिंह’ के प्रशंसक और समर्थक ऐसे ही आक्रामक मुद्रा में हैं।

थोड़े से विनम्र समर्थक ‘कबीर सिंह’ के फिल्मी किरदार होने की दुहाई दे रहे हैं। उनके अनुसार यह किरदार मात्र है, जो निगेटिव और ग्रे-शेड का है। समाज में ऐसे अनेक किरदार मिल जाएंगे। क्या फिल्मों में ऐसे किरदारों की कहानियां नहीं आनी चाहिए? ‘कबीर सिंह’ के समर्थन में एक और तबका है। उसके अनुसार शाहिद कपूर ने किरदार को पर्दे पर जीवंत कर दिया है। अभिनेता शाहिद कपूर ने जिस शिद्दत से कबीर सिंह के किरदार को निभाया है, उसकी तारीफ तो होनी ही चाहिए।

कबीर सिंह एक उज्जड, गुस्सैल, उदंड और भावावेशी किरदार है। वह दिल्ली के एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है। पढ़ने में तेज और खेलने में माहिर कबीर सिंह फिल्मों के हीरो की तरह सभी गुणों से संपन्न है। बस एक अवगुण है। उसका गुस्सा नाक पर बैठी मक्खी की तरह कभी भी भिनभिनाने लगता है। वह अपना आपा खो देता है। यह सब प्रीति से नजरें मिलने के पहले की बात है। तब तक उसे किसी लड़की के साथ घूमते या बदतमीजी करते नहीं दिखाया गया है।

एक बार अपने गुस्से पर काबू करने के बजाय उसे उचित ठहराने की वजह से उसे कॉलेज से निकाल दिया जाता है। उसे ‘निष्कासन’ मंजूर है, ‘अनुशासन’ नहीं। कॉलेज से निकलते समय उसकी नजर प्रीति पर पड़ती है और वह कॉलेज में रुकने का फैसला करता है। माफी भी मांग लेता है। यहां से फिल्म उस मर्दवादी जोन में प्रवेश करती है, जो कबीर सिंह के स्त्री विरोधी चरित्र को उजागर करती है। फर्स्ट ईयर की क्लास में टीचर से अनुमति लेकर वह पंजाबी में धमकी भरे स्वर में घोषणा करता है कि ‘प्रीति उसकी बंदी है’। उस पर कोई और नजर न डाले।

हम देखते हैं कि बाद में वह बंदी (कैदी) ही साबित होती है। वह पूरी तरह से कबीर सिंह के कब्जे में है। कबीर सिंह पढ़ाने के बहाने उसे क्लास से बाहर ले जाता है। अति तो तब होती है, जब वह उसे बॉयज हॉस्टल में अपने कमरे में रखता है और कॉलेज का प्रशासन कुछ नहीं कर पाता। प्रीति उसकी मर्जी की बांदी है। कॉलेज से निकलने और कबीर सिंह से बिछड़ने के बाद वह अपने पिता और परिवार की ‘बंदी’ हो जाती है। किसी भी दृश्य में नहीं दिखता कि वह 21वीं सदी की स्वतंत्र और आत्मविश्वास से भरी लड़की है।

वास्तव में यह लेखक और निर्देशक की सोच के अनुसार किया गया चरित्र निर्वाह है। मेडिकल की छात्रा प्रीति न कभी कबीर सिंह की बेजा हरकतों का विरोध करती है और न कभी अपनी इच्छा जाहिर कर पाती है। उल्टा उसके प्रेम में दीवानी हो जाती है और कबीर सिंह को एहसास दिलाती है कि वह उसके बगैर नहीं रह सकती। शादी का फैसला लिया जाता है और फिर प्रीति के परिवार का विरोध सामने आता है। प्रीति की जबरन शादी कर दी जाती है।

बाद में हमें पता चलता है कि उसका पति तो उसे तीन दिनों के बाद ही छोड़ गया था। आश्चर्य है कि पढ़ी-लिखी मेडिकल स्नातक प्रीति कोई जॉब नहीं करती। वह अपने भाग्य को स्वीकार कर लेती है। मिलेनियल लड़कियां प्रीति के किरदार से सहमति नहीं रखतीं। उनकी राय में अगर कोई ऐसा लड़का उनकी जिंदगी में आए तो वे उसे पुलिस के हवाले कर देंगी।

‘कबीर सिंह’ के समर्थक कभी दबी और कभी खुली आवाज में यह भी कह रहे हैं कि कबीर की तरह टूटकर प्यार करने वाले युवक कम होते हैं। अपनी तमाम बदतमीजियों के बावजूद वह प्रीति से बेइंतहा प्यार करता है। प्रीति उसकी नहीं हो पाती तो वह ‘देवदास’ की तरह खुद को तबाह कर देता है, लेकिन ‘देवदास’ और ‘कबीर सिंह’ में बड़ा फर्क है। कबीर सिंह लंपट, व्यभिचारी और कामुक है। प्रीति से अलग होने के बाद उसे शारीरिक सुकून के लिए लड़कियां चाहिए। सिर्फ शरीर चाहिए। वह डॉक्टर दोस्तों के मरीजों तक को नहीं छोड़ता। जब एक लड़की अंतरंग क्षणों में प्रेम का इजहार करती है तो वह बिफर जाता है। कबीर सिंह के समर्थक उसके इस रवैये से खुश होते हैं। कहते हैं कि प्रेम तो उसने केवल प्रीति से किया है। वाह रे प्रेम?

विपरीत का सौंदर्य आकर्षित करता है, लेकिन ऐसे विपरीत स्वभाव के प्रेमी परस्पर पूरक बनते हैं। कबीर सिंह और प्रीति के साथ ऐसा कुछ भी नहीं होता। पूरी फिल्म में प्रीति एक भी निर्णय लेती नहीं दिखाई पड़ती है। वह कबीर सिंह और अपने पिता की ‘बंदी’ है। वह उनकी मर्जी के खिलाफ कभी नहीं जा सकती। अपनी बात कहती जरूर है, लेकिन उसमें जोर नहीं है। उसकी कमजोर आवाज बताती है कि लेखक और निर्देशक ने उसे स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं देने का फैसला कर लिया है।

फिल्म में कबीर सिंह की मां और प्रीति की मां सारी गतिविधियों के मूक गवाह भर हैं। एक दादी हैं, जो लगता है प्रगतिशील और समझदार हैं। फिल्म की शुरुआत में कबीर के दोहे के उल्लेख के साथ कबीर सिंह के स्वभाव का जिक्र करते समय उसका चारित्रिक गुण बता देती हैं। इसमें कहीं गर्व भी महसूस करती हैं। कबीर सिंह की गुड़िया स्मार्ट रही होगी जो चक्की में नहीं पीसी होगी, लेकिन प्रीति तो शुरू से आखिर तक पिसती ही नजर आती है।

कबीर सिंह जैसे व्यक्ति को सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अध्ययन विश्लेषण में ‘अल्फामेल’ कहा जाता है। अपने आसपास की सभी स्थितियों पर हावी होने के साथ उसे अपने नियंत्रण में रखने के मिजाज की वजह से वह एक हद तक नृशंस, आत्ममुग्ध और अन्यायी हो जाता है। इस फिल्म में कबीर सिंह का मानवीय पक्ष कभी नहीं दिखता। अंतिम दृश्य में विनम्र होने और सामाजिक रूप से सही राह पर लौटने की चाहत में भी उसे कोई ग्लानि या पश्चाताप नहीं होता।

फिल्म के अंतिम दृश्य में निर्देशक सब कुछ सुखद करने की हड़बड़ी में प्रीति को और कमजोर साबित करते हैं। उसे कबीर पर दया आ जाती है। थप्पड़ मारने वाला कबीर सिंह उसके सामने घुटनों के बल बैठा हुआ है। लड़की का दिल पसीजने के लिए इतना ही काफी है। प्रीति को गर्भवती देखने के साथ ही अंदाजा हो जाता है कि उसके पेट में पल रहा जीव कबीर सिंह का ही होगा। हिंदी फिल्मों के निर्देशक हमेशा नायिका को पवित्र, अक्षत और नायक के लिए सुरक्षित रखते हैं। अगर प्रीति अपने पति से गर्भवती होती, तो क्या कबीर सिंह उसे स्वीकार करता? कबीर सिंह के प्रेम और स्वभाव को देखते हुए यह आप तय करें...।

एक और सवाल है मूल फिल्म का नाम और शीर्षक हिंदी फिल्म को दिया जाता, तो क्या फर्क पड़ता? अगर फिल्म का नाम ‘अर्जुन सिंह’ होता, तो क्या होता? हिंदी फिल्म में कबीर नाम का गलत इस्तेमाल जारी है। अनेक फिल्मों के नायक कबीर हैं। उनमें से कुछ ही मध्ययुगीन भक्त कवि कबीर की परछाई हैं। बाकी सभी खल, निगेटिव और ग्रेशेड के किरदार रहे हैं। श्रीजीत मुखर्जी और महेश भट्ट की फिल्म ‘बेगमजान’ में कबीर एक ऐसा गुंडा है, जो पैसे लेकर मुसलमानों और हिंदुओं के समूहों को धमकाता है, आगे और भी कबीर आएंगे, जो समन्वय, समरसता और समानता के कवि कबीर के नाम को नेगेटिव और निंदनीय छवियां देते रहेंगे।

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