नई लकीर खींच रही हैं महिला प्रधान फिल्में, बस ट्रेड पंडितों की चालबाज शब्दावली पर देना होगा ध्यान

‘छपाक’ और ‘पंगा’ के बाद धारणा गढ़ी जा रही है कि महिला प्रधान फिल्मों के दर्शक नहीं हैं, इसलिए भविष्य के निर्माता-निर्देशक सावधान रहें। ऐसी फिल्में दमदार अभिनेत्रियों के बावजूद नहीं चल पातीं। ऐसे में सिर्फ 2019 की कुछ फिल्मों को लें तो समझने में सुविधा होगी।

फोटोः सोशल मीडिया
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अजय ब्रह्मात्मज

इस साल जनवरी में दो महिला प्रधान फिल्में आईं ‘छपाक’ और ‘पंगा’। दोनों ही फिल्मों की निर्देशक महिलाएं हैं। ‘छपाक’ का निर्देशन मेघना गुलजार ने किया है और ‘पंगा’ अश्विनी अय्यर तिवारी निर्देशित फिल्म है। दोनों ही फिल्मों में मुख्य किरदार महिलाएं हैं। इन्हें हिंदी फिल्मों की श्रेष्ठ अभिनेत्रियों दीपिका पादुकोण (छपाक) और कंगना रनोट (पंगा) ने निभाया। दोनों दक्ष और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियां हैं। उन्होंने अपनी फिल्मों से लगातार अपनी श्रेष्ठता साबित की है।

लेकिन फिल्मों के ट्रेड वर्ल्ड में दोनों ही फिल्मों को फ्लॉप बताने की होड़ लगी हुई है। धारणा बनाई जा रही है कि महिला प्रधान फिल्मों के दर्शक नहीं हैं, इसलिए भविष्य के निर्माता-निर्देशक सावधान रहें। महिलाओं के विषय को लेकर बनी फिल्में दमदार अभिनेत्रियों के बावजूद नहीं चल पातीं। ऐसे वक्त में वे ‘द डर्टी पिक्चर’, ‘कहानी’, ‘तनु वेड्स मनु रिटंर्स’, ‘मणिकर्णिका’, ‘सांड की आंख’ और ‘पद्मावत’ की कामयाबी भूल जाते हैं।

2020 की दोनों महिला प्रधान फिल्मों पर विमर्श करते समय हम सिर्फ पिछले साल यानी 2019 की महिला प्रधान फिल्मों का संदर्भ ले लें तो समझने में सुविधा होगी। पिछले साल ‘मणिकर्णिका’, ‘द स्काई इज पिंक’, ‘जजमेंटल है क्या’, ‘सांड की आंख’, ‘मर्दानी 2’ फिल्मों की मुख्य किरदार महिलाएं थीं। इन सभी फिल्मों ने दर्शकों का ध्यान आकृष्ट किया और ठीक-ठाक कारोबार भी किया। ‘मणिकर्णिका’ के अलावा बाकी फिल्में ‘100 करोड़ी’ क्लब में शामिल नहीं हो सकीं, लेकिन 21 से 35 करोड़ तक के उनके कारोबार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। ये फिल्में थिएटर और बॉक्स ऑफिस पर स्पेस बनाने में सफल रहीं। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि ‘वाश आउट’ हो गईं।

इस साल भी ‘छपाक’ और ‘पंगा’ के बाद ‘गुल मकई’ रिलीज हो चुकी है। 2020 के अगले महीनों में ‘गुंजन सक्सेना- द कारगिल गर्ल’, ‘थप्पड़’, ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ और ‘सायना’ आदि महिला प्रधान फिल्में रिलीज होंगी। अगर महिला प्रधान फिल्मों का बाजार नहीं है तो निर्माता ऐसी फिल्मों में क्यों निवेश कर रहे हैं? हां, हमें इन फिल्मों के सीमित दर्शकों के बारे में सोचना चाहिए। साथ ही देश की महिला दर्शकों को अपनी तरफ से पहल करनी चाहिए, क्यों न शहरों की किटी पार्टी से लेकर गांव-कस्बों के महिला चौपालों तक में इन फिल्मों की चर्चा हो और संगठित तौर पर प्रदर्शन-विवेचना की परंपरा बने।


कुछ सालों पहले की स्थिति कुछ और थी, तब महिला प्रधान फिल्मों के नाम पर कुछ खास विषयों तक ही फिल्में सिमटी रहती थीं। अब गौर करें तो विषय वस्तु, चित्रण और कंसर्न में गुणात्मक विस्तार हुआ है। मशहूर महिलाओं की जिंदगी पर फिल्में बन रही हैं। फिर से ‘छपाक’ और ‘पंगा’ की बातें करें। मेघना गुलजार ने एसिड अटैक सरवाइवर लक्ष्मीअग्रवाल के जीवन और जीत पर यह फिल्म बनाई है। इस फिल्म में दीपिका ने मुख्य भूमिका निभाने के साथ निर्माता की भी जिम्मेदारी निभाई थी। बतौर निर्माता यह उनकी पहली फिल्म थी।

इस फिल्म के रिलीज के कुछ दिनों पहले वह जेएनयू हिंसा के विरोध में हो रही सभा में चली गईं। वहां वह जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष से मिलीं और ध्यान से उन्होंने कन्हैया कुमार के संबोधन को सुना। सभा में जाना उनका निजी फैसला था। कुछ लोगों ने इसे उनके प्रचार अभियान से जोड़ दिया। जेएनयू हिंसा की समर्थक शक्तियों के पक्षधर विरोध में मुखर हो गए। उन्होंने फिल्म के बहिष्कार का आह्वान किया। ट्रेड पंडित और दूसरे यह बताने में असमर्थ रहे कि इस बहिष्कार के आह्वान का कोई असर हुआ या नहीं? और अगर हुआ तो ‘छपाक’ का वास्तव में कितना नुकसान हुआ?

ऐसा कोई भी अनुमान सिर्फ कयास ही होगा। समस्या यह है कि अभी देश जिस तुनकमिजाजी से गुजर रहा है, उसमें अगर आप साथ में नहीं हैं तो विरोध में हैं और अगर विरोध में हैं तो आप देशद्रोही हैं। क्योंकि ‘देशभक्त’ तो सत्ताधारी पार्टी और उसके नुमाइंदे हैं। बहरहाल, दीपिका ने अपने फैसले पर कोई अफसोस नहीं किया। उन्होंने कहा कि तमाम विरोध और बहिष्कार के बाद भी उनका मन नहीं बदला है। उसके पहले भी उन्होंने अपने साक्षात्कारों में यह दोहराया था कि देश की वर्तमान स्थिति से वह दुखी हैं। किसी कलाकार की ऐसी संवेदना की आलोचना करने के बजाय सराहना होनी चाहिए।

‘छपाक’ ने बॉक्स ऑफिस पर क्षमता के मुताबिक प्रदर्शन किया, लेकिन ट्रेड पंडितों की व्याख्या और टीका-टिप्पणी ने इसे पहले दिन से ही कमजोर और फ्लॉप साबित करने के प्रयास आरंभ कर दिए। इसके संदर्भ के साथ भविष्य में भी ट्रेड पंडितों की चालबाज शब्दावली पर ध्यान दीजिएगा। सुविधा और स्वार्थ के मुताबिक समर्थ के हित में इनके विशेषण बदलते हैं। साधारण कलेक्शन को ‘जबरदस्त’ और सामान्य कलेक्शन को ‘नॉट वेरी गुड’ कहकर ये सकारात्मक और नकारात्मक धारणाएं विकसित करते हैं। अगर पहले दिन से यह कहा जाने लगे कि फिल्म नहीं चली तो दर्शकों के बीच का नासमझ तबका इसे सच मान लेगा और यही हो रहा है।


बतौर निर्माता दीपिका पादुकोण ने प्रचलित हथकंडे नहीं अपनाए। उन्होंने मासूम कलाकार की तरह माना कि मैंने एक सार्थक फिल्म बनाई है। अब दर्शकों की जिम्मेदारी है कि वे इसे आगे बढ़ाएं। दूसरे, ट्रेड पंडित किसी फिल्म की लागत के बरअक्स उसके कलेक्शन की बातें नहीं करते। ‘छपाक’ के साथ रिलीज हुई ‘तान्हाजी- द अनसंग वारियर’ के निर्माता फिल्म इंडस्ट्री के सिद्धहस्त खिलाड़ी थे। उन्होंने अपनी फिल्म की हवा बनाई। संयोग से उनकी फिल्म दर्शकों ने पसंद भी की। मीडिया और सोशल मीडिया पर ‘तान्हाजी- द अनसंन वारियर’ और ‘छपाक’ के कारोबार की तुलना भी होने लगी। अगर दोनों फिल्मों की लागत बताकर उनके कलेक्शन की बात की जाती तो राय कुछ और बनती। तथ्य भी अलग नजर आते।

दूसरी फिल्म ‘पंगा’ अश्विनी अय्यर तिवारी और कंगना रनोट की युगल कोशिश है। इस काल्पनिक कहानी में कबड्डी खिलाड़ी रह चुकी जया निगम की वापसी और प्रतिष्ठा को बहुत बारीक तरीके से चित्रित किया गया है। हम सभी जानते हैं कि भारतीय मध्यवर्गीय समाज में शादी के बाद लड़कियों को पारिवारिक और भावनात्मक दबाव में अपना करियर त्यागना पड़ता है। ‘पंगा’ ऐसी ही एक कहानी है, लेकिन यह उस दायरे से बाहर निकलती है। जया निगम फैसला करती है कि वह कबड्डी के खेल में वापस आएगी। निरंतर अभ्यास, परिवार के समर्थन और दोस्त मीनू की गाइडेंस में वह अपनी जिद में सफल होती है।

इस फिल्म में पति को सहयोगी और समर्थक किरदार के तौर पर रखा गया है। कुछ दर्शकों की राय में अमूमन ऐसा होता नहीं है। उनके अनुसार अश्विनी अय्यर तिवारी को चाहिए था कि वह पति को नेगेटिव शेड दें। ऐसे दर्शकों को जया निगम की वापसी कठिन नहीं लगी, क्योंकि उसे विरोध और अवरोध कम मिले। यह फिल्म वास्तव में व्यक्ति की निजी लड़ाई के ऊपर ज्यादा फोकस करती है। समाज के समर्थन के बाद भी कई बार व्यक्तिगत दुविधा से ऐसी वापसी संभव नहीं हो पाती। ‘पंगा’ फिल्म में जया की जय को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। हां, कंगना रनोट के बावजूद इस फिल्म का बहुत अधिक नहीं चल पाना चकित करता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है इस फिल्म को बिल्कुल दर्शक नहीं मिले। इस फिल्म ने भी ठीक-ठाक कारोबार किया।

अतः इस धारणा से हमें निकलना चाहिए कि महिला प्रधान फिल्मों के दर्शक नहीं है... दर्शक हैं, कम संख्या में हैं। दर्शकों को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि दीपिका पादुकोण के जेएनयू जाने और उसके परिणाम में फिल्म के बहिष्कार के आह्वान से फिल्म पर कोई खास असर पड़ा। ‘छपाक’ मध्यम श्रेणी की फिल्म थी। इसी श्रेणी में ‘पंगा’ को भी रख सकते हैं। अगर सत्ताधारी पार्टी के विरोध में जाने से दीपिका पादुकोण की फिल्म नहीं चली तो सत्ताधारी पार्टी की समर्थक कंगना रनोट की ‘पंगा’ को कुछ ज्यादा कारोबार करना चाहिए था।

दरअसल, फिल्मों का कारोबार बिल्कुल अलग समीकरणों से कम और ज्यादा होता है। हिंदी फिल्मों के दर्शक अभी इतने जागरूक और एक्टिव नहीं हुए हैं कि वे राजनीतिक और सामाजिक चेतना से प्रेरित होकर फिल्में देखने/ न देखने के फैसले ले सकें। दर्शकों और फिल्मों का डायरेक्ट रिश्ता बनता है।

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