निजता का अधिकार है मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और यह संविधान की धारा 21 का अभिन्न हिस्सा है।

फोटो: नवजीवन
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नवजीवन डेस्क

निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे मौलिक अधिकार माना है। मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संवैधानिक पीठ ने कहा कि निजता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और यह संविधान की धारा 21 का अभिन्न हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ में मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर, जस्टिस जे चेलामेश्वर, जस्टिस ऐआर बोबडे, जस्टिस आर के अग्रवाल, जस्टिस रोहिंग्टन नरीमन, जस्टिस अभय मनोगर स्प्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। इस मामले में कोर्ट में कुल 21 याचिकाएं दायर की गईं थीं। कोर्ट ने 7 दिनों की सुनवाई के बाद 2 अगस्त को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

आधार को अनिवार्य करने वाले सरकार के कदम के खिलाफ दाखिल याचिकाओं की सुनवाई के दौरान निजता के अधिकार का मुद्दा उठा था। हालांकि, आधार से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई 5 जजों की बेंच अलग से करेगी।

मामले की शुरुआत में तीन जजों की पीठ ने 7 जुलाई को कहा था कि आधार से जुड़े सारे मुद्दों पर बड़ी पीठ को फैसला करना चाहिए। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के लिए 5 सदस्यों की संविधान पीठ बनाई थी। फिर 5 सदस्यों वाली संविधान पीठ ने 18 जुलाई को कहा कि इस मुद्दे का फैसला 9 जजों वाली संविधान पीठ करेगी। 9 जजों की पीठ बनाने के पीछ तर्क यह था कि 1954 में 8 और 1962 में 6 जजों की पीठों के फैसले में इसे मौलिक अधिकार नहीं माना गया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया है कि किसी भी व्‍यक्ति की निजी जानकारी पर सरकार का हक नहीं है और लोग अपना निजी डाटा देने से मना कर सकते हैं। लोगों की मर्जी के बिना सरकार उनका बायोमेट्रिक निशान भी नहीं ले सकती। इस फैसले के बाद अब लोगों की निजी जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से केंद्र सरकार को बड़ा झटका लगा है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से अटार्नी जनरल ने कोर्ट में कहा था कि निजता मौलिक अधिकार में शामिल नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार मानने के बाद आधार संबंधित योजनाएं प्रभावित होंगी। सरकार की कुछ अन्य योजनाओं का टकराव भी निजता के अधिकार के साथ हो सकता है।

इस मामले के मुख्य याचिकाकर्ता कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के. एस. पुट्टास्वामी थे। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कि निजता के अधिकार के बिना 'जीने की आजादी' जैसे सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार का कोई अर्थ नहीं है।

सुनवाई के दौरान बीजेपी शासित महाराष्ट्र और गुजरात ने निजता के अधिकार को मूल अधिकार नहीं मानने के पक्ष में दलील दी थी, जबकि कांग्रेस शासित कर्नाटक, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, पुडुच्चेरीऔर तृणमूल कांग्रेस शासित पश्चिम बंगाल का कहना था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है।

निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में चली इस बहस से जुड़े महत्वपूर्ण पड़ाव-

2 अगस्त, 2017: 9 जजों की पीठ ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख।। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र में निजी सूचनाओं के संरक्षण के लिए कड़े दिशानिर्देश बनाए जाने की जरूरत है और निजता को बचाया जाना चाहिए।

19 जुलाई, 2017: सुनवाई के पहले दिन मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता में न्यायाधीश चेलामेश्वर, बोबडे, आरके अग्रवाल, रोहिंटन एफ नरीमन, अभय मनोहर सप्रे, डीवाईचंद्रचूड़, संजय किशन कौल और नजीर ने मौखिक रूप से कहा कि निजता अपने आप में पूर्ण अधिकार नहीं है और हम आंकड़ों और जानकारियों से भरी दुनिया में रहते हैं।

यूआईडीएआई ने कोर्ट को बताया कि आंकड़ों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की पहचान और उसकी सुरक्षा को लेकर कानून तैयार करने के लिए केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण के नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया है।

18 जुलाई, 2017: मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर के नेतृत्व में 5 जजों की एक पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की एक पीठ को पहले यह तय करना चाहिए कि निजता का अधिकार, मौलिक आधार और भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे का अंग है या नहीं।

भारतीय संविधान के अस्तित्व में आने के फौरन बाद एमपी शर्मा मामले में आठ जजों की पीठ का फैसला और 1962 में खड़क सिंह के केस में 6 जजों की पीठ का फैसला- ये सुप्रीम कोर्ट के ऐसे दो ऐसे फैसले हैं जो आजादी के बाद से जारी निजता पर न्यायिक बहस में प्रमुखता से उठते रहे हैं। इन दोनों फैसलों में कहा गया था कि निजता एक मौलिक अधिकार नहीं है।

12 जुलाई, 2017: जस्टिस चेलामेश्वर की सलाह पर वरिष्ठ वकील श्याम दीवान और अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने संयुक्त रूप से मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर से आग्रह किया कि आधार योजना की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए जल्द 5 जजों की पीठ का गठन किया जाए। मुख्य न्यायाधीश ने वकीलों से सहमति जताई और सुनवाई की तारीख 18 जुलाई तय की।

9 जून, 2017: सुप्रीम कोर्ट ने पैन से आधार को जोड़ने की वैधता का समर्थन किया। हालांकि, जिनके पास आधार नहीं था उन्हें इस मामले में फैसला आने तक आधार बनवाने की अनिवार्यता से छूट दी गई।

19 मई, 2017: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में विभिन्न लोगों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई के लिए सहमति जताई। इनमें एनसीपीसीआर की पूर्व अध्यक्ष और मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित शांता सिन्हा की वह याचिका भी थी जो उन्होंने 30 जून से कल्याणकारी योजनाओं और लाभों के लिए आधार को अनिवार्य किए जाने की सरकारी अधिसूचनाओं के खिलाफ दायर की थी।

27 अप्रैल, 2017: वरिष्ठ वकील श्याम दीवान ने जस्टिस एके सिकरी और अशोक भूषण की पीठ से कहा कि आयकर कानून में जोड़े गया अनुच्छेद 139ए पैन से आधार को जोड़ना अनिवार्य बनाता है, जो सही नहीं है। केंद्र ने इसके जवाब में कहा कि आधार के लिए फिंगरप्रिंट और आंखों की पुतली की छाया लेना नागरिक के शरीर से हस्तक्षेप नहीं है क्योंकि किसी व्यक्ति का अपने शरीर पर अधिकार संपूर्ण नहीं है।

27, मार्च 2017: मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने मौखिक रूप से कहा कि बैंक खाता खुलवाने, आयकर रिटर्न भरने या मोबाईल कनेक्शन के आवेदन जैसी गैरकल्याणकारी गतिविधियों में सरकार द्वारा आधार को अनिवार्य करने का फैसला गलत नहीं है।

लोकसभा ने हाल ही में एक वित्त विधेयक पारित कर आयकर रिटर्न भरने और पैन बनवाने के लिए आधार को अनिवार्य कर दिया था।

25 अप्रैल, 2016: आधार कानून, 2016 (आर्थिक और अन्य सब्सिडी, लाभ और सेवाओं का लक्षित वितरण) का मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट के अधीन आया जब सांसद जयराम रमेश ने इसे धन विधेयक के रूप में पेश किए जाने का विरोध करते हुए इसे सरकार की बेशर्मी और बदनियती करार दिया था।

15 अक्टूबर, 2015: सुप्रीम कोर्ट ने महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना कानून, सभी प्रकार की पेंशन योजनाओं, कर्मचारी भविष्यनिधि और प्रधानमंत्री जनधन योजना में आधार कार्ड के ऐच्छिक उपयोग की सीमा बढ़ा दी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू ने कहा कि आधार कार्ड का ऐच्छिक उपयोग तब तक जारी रहेगा जब तक इस मामले में कोर्ट का अंतिम फैसला नहीं आ जाता।

8 अक्टूबर, 2015: आधार कार्ड योजना के चलते नागरिकों की निजता में हस्तक्षेप से जुड़े विवादों पर सुप्रीम कोर्ट ने अलग संवैधानिक पीठ के गठन का फैसला लिया। 15 अक्टूबर 2015 को से सुनवाई का फैसला लिया गया।

7 अक्टूबर, 2015: क्या कोई व्यक्ति सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से हासिल करने के लिए ऐच्छिक रtप से अपनी निजता का अधिकार छोड़ आधार के लिए पंजीकरण करा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल को संवैधानिक पीठ को भेजा।

11 अगस्त, 2015: तीन जजों की पीठ ने आदेश दिया कि आधार का मकसद तभी बेहतर तरीके से पूरा होगा जब सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में न तो इसे अनिवार्य किया जाएगा और न इसकी शर्त रखी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि यह अंतरिम आदेश तब तक लागू रहेगा जब तक आधार में पंजीकरण के लिए बायोमेट्रिक के इस्तेमाल और निजता में दखल के संवैधानिक मसले को लेकर पांच जजों की संवैधानिक पीठ आपना फैसला नहीं सुना देती।

6 अगस्त, 2015: तीन जजों की पीठ ने आधार से जुड़ी याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रखा। निजता संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार है या नहीं, इस मसले पर केंद्र ने बड़ी पीठ के गठन की मांग की।

22 जुलाई 2015: केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि निजता का अधिकार संविधान में स्थापित कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इसलिए अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए।

21 जुलाई, 2015: आधार कानून को निजता का हनन बताकर चुनौती देने वाली याचिकाओं पर जस्टिस जे चेलामेश्वर, एसए बोबडे और सी नागप्पन ने कहा कि विभिन्न योजनाओं के लिए आधार कार्ड की मांग करना सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर, 2013 के उस अंतरिम आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है जिसमें आधार को ऐच्छिक रखा गया था।

Published: 24 Aug 2017, 2:24 PM
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