हाल-ए-पाकिस्तान : अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए जूझते नवाज शरीफ

सत्ता चली गयी है और राजनीति भी खिसकती जा रही है। पार्टी में फूट है, बेटी-बेटा अयोग्य हैं। अब बेगम उनकी आखिरी उम्मीद हैं। यह उम्मीद टूटी शरीफ़ की राजनीति का अंतिम संस्कार हो जाएगा।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ / फोटो : Getty Images
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ / फोटो : Getty Images

पाकिस्तान एक ऐसा देश है जहां सत्ता के लिए चतुर्कोणीय मुकाबला होता है। एक तरफ सेना देश की सत्ता अपने हाथ में रखकर तानाशाही चाहती है, दूसरी तरफ राजनीतिक दल लोकतंत्र की उम्मीद लगाए रहते हैं। लोकतंत्र और तानाशाही के बीच जारी इस लड़ाई ने बीते 70 वर्षों में पाकिस्तान को देश चलाने के किसी एक तरीके पर आम सहमति तय नहीं करने दिया है। और दिलचस्प बात यह है कि सैनिक तानाशाह सत्ता संभालते ही लोकतांत्रिक तरीके अपनाने लगते हैं और लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आए राजनीतिज्ञ तानाशाह बनने लगते हैं। ऐसे हालात में न तो तानाशाह, तानाशाह रह पाए और न ही लोकतांत्रिक सियासतदां, सियासतदां ही रह पाए।

नवाज शरीफ का प्रधानमंत्री पद से हटना भी इसी खेल का एक हिस्सा ही है। शरीफ या सेना कुछ कह तो नहीं रहे, लेकिन सच्चाई यही है कि इस बार भी शरीफ, पाकिस्तानी सेना के साथ अच्छे संबंध नहीं रख पाए, और उन्हें सत्ता से हाथ धोना पड़ा। लेकिन नवाज शरीफ़ के साथ ऐसा पहली बार नहीं हुआ। 1993 में भी तब के सेना प्रमुख ने शरीफ को प्रधान मंत्री से इस्तीफा देने को मजबूर किया था। उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान 1999 में सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने उनकी सरकार का तख्ता पलट दिया था। और अब तीसरी बार, जब वह प्रधान मंत्री बने, तब भी उन्हें कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया गया और एक अदालती फैसले से उन्हें दोषी ठहराकर प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया।

यह भी सच है कि हर बार सेना ने उन्हें सत्ता से बाहर किया है, और हर बार वह सेना की ही मदद से फिर से सत्ता में लौट आए हैं। इस तरह, उनके और पाकिस्तानी सेना के बीच मुहब्बत और नफरत का एक खेल जारी है।

लेकिन, इस बार ऐसा लगता है कि उन्हें पूरी तरह से खारिज करने का फैसला ले लिया गया है। इसीलिए, इस बार उन्हें तो सत्ता से बाहर कर दिया गया है, लेकिन उनकी पार्टी की सत्ता बरकरार है। नवाज़ शरीफ प्रधान मंत्री नहीं हैं लेकिन उनके छोटे भाई पाकिस्तान सबसे बड़ा प्रांत पंजाब के मुख्यमंत्री हैं। उनके अपने ही दूसरे साथी सत्ता सुख भोग रहे हैं। नवाज़ शरीफ़ के लिए यह एक विषम स्थिति है। शरीफ खुद को अयोग्य ठहराए जाने के फैसले के खिलाफ लड़ना चाहते हैं, लेकिन उन्हें अपनी ही पार्टी से पूरा समर्थन नहीं मिल रहा है।

2008 के आम चुनाव पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी सत्ता में आयी थी और नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग-एन विपक्ष में थी। चौधरी निसार अली खान नेशनल असेंबली में नेता विपक्ष थे। नवाज शरीफ ने उन्हें खुद अपनी मर्जी से उन्हें अपना नंबर टू बनाया था। 2013 में, जब नवाज शरीफ तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधान मंत्री बने तो उन्होंने चौधरी निसार अली खान को गृह मंत्रालय जैसी अहम जिम्मेदारी दी। चौधरी निसार को लोग नवाज शरीफ का उप कप्तान कहते थे। लेकिन आज, नवाज शरीफ और उनके बीच गहरी खायी नजर आती है। चौधरी निसार अली खान को नवाज शरीफ के सरकार चलाने के कई तरीके पसंद नहीं आते थे। शायद इसीलिए वह नवाज शरीफ के साथ जीटी रोड की रैली में नहीं थे।

अकेले चौधरी निसार अली खान ही नहीं, पार्टी के कई दूसरे वरिष्ठ नेता भी नवाज़ शरीफ के साथ नहीं हैं। हर किसी की शिकायत है कि नवाज शरीफ अब पार्टी नेताओं की कम और अपनी बेटी मरियम नवाज की ज्यादा सुनते हैं। बड़े बड़े फैसले मरियम करती हैं। मरियम नवाज़ की सोच और पार्टी के वरिष्ठ नेताओँ की सोच में जमीन आसमान का फर्क है। हद तो यह है कि मरियम और उनके चाचा शाहबाज शरीफ के विचार भी आपस में नहीं मिलते। शाहबाज शरीफ भी मौजूदा हालात में सैन्य ताकतों और शासन से लड़ने के पक्ष में नहीं हैं, और कोई बीच का रास्ता निकालने के पक्षधर हैं, लेकिन नवाज शरीफ उनकी बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं।

नवाज शरीफ़ का मानना है कि तीन बार वह पाकिस्तान के प्रधान मंत्री रह चुके। उम्र सत्तर साल तक पहुंच गई। उनकी राजनीतिक पारी अब आखिरी दौर में है। अब आखिरी अंतिम दौर में उनके केवल दो ही लक्ष्य हैं। एक तो वह अपनी राजनीतिक विरासत अपनी बेटी मरियम को सौंपना चाहते हैं। और, दूसरा यह कि वे पाकिस्तान में जारी गृहयुद्ध की आखिरी पारी खेलना चाहते हैं। ये दोनों ही लक्ष्य आग का दरिया हैं, जिन्हें पार करना फिलहाल नवाज शरीफ के लिए मुश्किल नजर आ रहा है। इसीलिए शायद वह अपने अस्तित्व के लिए ही लड़ रहे हैं।

नवाज़ शरीफ के अयोग्य घोषित होने के बाद नेशनल असेंबली (पाकिस्तानी संसद) की जो सीट खाली हुई है, उसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी कुलसुम नवाज को उम्मीदवार बनाया है। हालांकि, वह चाहते थे कि उनकी जगह उनकी बेटी मरियम नवाज उनकी सीट पर उम्मीदवार हों, लेकिन पनामा लीक केस में मरियम नवाज पर भी चुनाव लड़ने की पाबंदी लगा दी गयी है। नवाज के लिए ये आदेश खुद के अयोग्य होने से ज्यादा दुख देने वाला है।

एक आम राय यह है कि जिन लोगों ने बड़ी मुश्किल से नवाज शरीफ से सत्ता और चुनाव से बाहर किया है, वे लोग उनकी राजनीतिक वारिस मरियम नवाज को भी बाहर करने के पक्ष में हैं। ऐसे में वे लोग नवाज शरीफ की पत्नी कुलसुम नवाज के लिए सत्ता के दरवाजे कैसे खोलेंगे? लेकिन, यह भी सच है कि कुलसुम नवाज सिर्फ एक गृहिणी हैं और उन पर न तो कोई आरोप है और न ही उनके नाम कोई संपत्ति है। ऐसे में अगर वे चुनी जाती हैं तो नवाज शरीफ बिना समय गंवाए उन्हें प्रधानमंत्री बना देंगे। इसलिए सैना के लिए कुलसुम नवाज फिलहाल एक चुनौती हैं, क्योंकि उनके बहाने शरीफ परिवार का सत्ता पर कब्जा रहेगा।

दूसरी तरफ अदालत के आदेश के बाद नवाज ने अपने भाई शाहबाज शरीफ को पार्टी का अध्यक्ष तो बना दिया है, लेकिन उनके इस फैसले को नवाज शरीफ के परिवार में ही अच्छा नहीं माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस तरह पार्टी पर शाहबाज शरीफ का कब्जा हो जाएगा। यहां ध्यान देने की बात यह है कि चौधरी निसार अली खान और शाहबाज शरीफ की दोस्ती जगजाहिर है। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इससे पहले जब भी चौधरी निसार अली खान और नवाज शरीफ के बीच मतभेद हुए हैं, तो सुलह शाहबाज शरीफ ने ही करायी है। लेकिन इस बार वे भी सुलह जल्दी में नहीं हैं, क्योंकि माना जाता है कि शाहबाज शरीफ भी नवाज शरीफ को दबाव में रखना चाहते हैं।

शाहबाज शरीफ जानते हैं कि अगर नवाज शरीफ पर दबाव कम हुआ तो वह न उन्हें पार्टी अध्यक्ष पद देंगे और न ही जरूरत पड़ने पर प्रधानमंत्री बनने देंगे। यह भी खबर है कि नवाज शरीफ के 70 सांसद नवाज शरीफ से बगावत के लिए तैयार बैठे हैं। वह नवाज शरीफ की लड़ाई में शामिल नहीं होना चाहते और उन्होंने शाहबाज शरीफ के नेतृत्व को भी स्वीकार कर लिया है।

इस बीच शाहबाज शरीफ की पत्नी तहमीना दुर्रानी कई ट्वीट की भी पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में काफी चर्चा रही। तहमीना ने ये सारे ट्वीट जीटी रोड रैली के खिलाफ किए थे। इससे पहले भी वह अहम राजनीतिक मौकों पर नवाज़ शरीफ के खिलाफ ट्वीट करती रही हैं। हालांकि, शाहबाज शरीफ ये कहते रहे हैं कि उनकी पत्नी के ट्वीट्स से उनका कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन यह भी एक मजबूत राय है कि इसमें शाहबाज शरीफ की सहमति शामिल होती है। इन ट्वीट्स के बहाने ही शाहबाज शरीफ, सेना और दूसरे शासन को ये आभास दिलाते हैं कि उनका नवाज शरीफ की सरकार विरोधी नीतियों से कोई लेना-देना नहीं है।

इसमें कोई शक नहीं कि नवाज़ शरीफ अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। सत्ता और ताकत उनके हाथों से चली गयी है और राजनीति भी उनसे खिसकती नजर आ रही है। पार्टी में बगावत सिर उठा रही है, बेटी और बेटे अयोग्य ठहराए जा चुके हैं। ऐसे में अब बेगम ही उनकी आखिरी उम्मीद हैं। अगर यह उम्मीद भी टूट गयी तो नवाज़ शरीफ़ और उनके परिवार की राजनीति का अंतिम संस्कार हो जाएगा। वे दूसरे राजनीतिक दलों से मदद की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन इस लड़ाई में कोई भी उनका साथ देने को तैयार नहीं है। ऐसे में सियासी तन्हाई ही उनका एकमात्र सहारा है।

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