बजट 2020ः असली मसला बजट की विश्वसनीयता और भरोसे का तार-तार होना है

बजट में सरकारी घाटे को काबू में दिखाने के लिए नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जैसे बड़े टैक्स रिफंड रोकना, जरूरत से ज्यादा अग्रिम टैक्स वसूलना, साल का अग्रिम माल भाड़ा वसूल कर लेना, ब्याज अदायगी टाल देना। पर खामियाजा भी अगले बजट में सरकार को ही भुगतना पड़ता है।

फोटोः सोशल मीडिया
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राजेश रपरिया

बजट में प्रस्तुत केंद्र सरकार के आय-व्यय के हिसाब-किताब में थोड़ा बहुत अंतर आना कोई नई बात नहीं है। केंद्रीय बजट में अनुमान, संशोधित और वास्तविक ब्योरे होते हैं। बजट अनुमान के वास्तविक आंकड़ों के आने में दो साल का समय लगता है। जैसे वित्त वर्ष 2019-20 के बजट में 2017-18 के आय-व्यय के वास्तविक ब्योरे और वित्त वर्ष 2018-19 के संशोधित आंकड़े। लेकिन बजट की प्राप्तियों के मद में जमीन-आसमान का अंतर आए, ऐसा कम ही होता है और बजट की विश्वसनीयता पर आंच नहीं आती है। पर चालू वित्त वर्ष 2019-20 के बजट के अब तक जो आधिकारिक-अनाधिकारिक ब्योरे सामने आए हैं, उनसे बजट की विश्वसनीयता और भरोसे के तार-तार होने का आसन्न खतरा है।

इस साल आय या प्राप्तियों को लेकर जो भी सूचनाएं आ रही हैं, वे मोदी सरकार के लिए शुभ नहीं हैं। दुनिया भर में ख्यात समाचार एजेंसी रायटर्स ने आयकर विभाग के अनेक अधिकारियों के हवाले से बताया है कि विकास दर में तीव्र गिरावट और कॉरपोरेट टैक्स में भारी राहत देने के कारण इनकम और कॉरपोरेट टैक्स का संग्रह पिछले साल के कर संग्रह से कम रहेगा। एजेंसी के अनुसार, इस साल इनकम और कॉरपोरेट टैक्स संग्रह पिछले साल के संग्रह 11.50 लाख करोड़ रुपये से कम रहेगा। यह पिछले 20 सालों में दूसरा अवसर होगा जब बीते साल के इनकम और कॉरपोरेट टैक्स संग्रह से चालू साल में कम हो जाएगा। सरकारी दलील है कि सितंबर महीने में कॉरपोरेट टैक्स को 1.45 लाख करोड़ रुपये की राहत देने से कर संग्रह में गिरावट आई है।

टैक्स संग्रह को लेकर जो भी गैर-आधिकारिक अनुमान आए हैं, उनमें भी कम-से-कम दो-ढाई लाख करोड़ रुपये कम टैक्स संग्रह के अनुमान हैं। कम टैक्स संग्रह का मुख्य कारण सामान्य विकास दर में आई गिरावट है। बजट में टैक्स संग्रह का आकलन 12 फीसदी सामान्य विकास दर पर आधारित है जबकि अब आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वित्त वर्ष में सामान्य विकास दर 7.5 फीसदी रहने वाली है। इसमें भी टैक्स अदा करने वाले क्षेत्रों में वृद्धि दर गिरावट सामान्य विकास दर से ज्यादा है। इससे बजट के टैक्स संग्रह के अनुमान चरमरा गए हैं जबकि जुलाई में बजट बनाते समय अर्थव्यवस्था में धीमेपन के संकेत मिलने शुरू हो गए थे, यानी बजट की नींव ही कमजोर थी।

विकास दर के बजट अनुमान की जो फजीहत हुई है, उससे बजट की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। वित्तीय संस्थान कई बार विकास दर के अनुमान लगाने को विवश हैं और त्रासदी यह है कि हर ताजा अनुमान में इन संस्थानों को विकास दर घटानी पड़ती है। मसलन, भारतीय रिजर्व बैंक को ही लीजिए जिसके वक्तव्यों से बाजार ऊपर-नीचे हो जाता है। यह बैंक पिछली फरवरी से अब तक पांच बार विकास दर के अनुमान पेश कर चुकी है और हर बार उसे विकास दर का अनुमान घटाना पड़ा है।

बजट में आय-खर्च के अलावा बजट भाषण में सरकार की नीतियों की चर्चा होती है, नए कार्यक्रमों की बड़ी घोषणाएं होती हैं। पिछले कई बजटों और अन्य मंचों से कई घोषणाएं की गईं, जैसे, स्मार्ट सिटी, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्किल इंडिया। यह भी बार-बार दावा किया गया कि इनसे करोड़ों रोजगार पैदा होंगे। लेकिन कितने रोजगार सृजित हुए, यह बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों से जग-जाहिर है। अब तो मोदी सरकार ने इनका नाम लेना ही लगभग बंद कर दिया है।

साल 2022 तक किसानों की आय दो गुनी करने, 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनाॅमी और इंफ्रास्ट्रक्चर में 100 लाख करोड़ रुपये के निवेश की घोषणाएं बजट में की गई थीं। पर किसानों की आय 2022 तक दो गुनी हो जाएगी, इस पर अधिकांश कृषि विशेषज्ञों को भरोसा नहीं है। अर्थव्यवस्था की जो गति है, उसे देखकर 2024 तक भारतीय अर्थव्यवस्था 5 ट्रिलियन डॉलर की बन पाएगी, यह कोई भी जानकार मानने को तैयार नहीं है। ऐसी हवाई घोषणाओं से आम जन का भरोसा छिटकता है और कार्यशैली पर भरोसा टूटता है।

मौजूदा खाद्य महंगाई भी सरकार की अकुशल कार्यशैली का नतीजा है। रिकॉर्ड गेहूं का भंडार होने के बाद भी बाजार में गेहूं-आटे के दाम बढ़े हैं। लोकसभा के चुनावों को देखते हुए सरकार ने गेहूं की रेकॉर्ड खरीदारी की जिससे बाजार में गेहूं की आपूर्ति कम हो गई और दाम बढ़ गए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गेहूं की आपूर्ति बढ़ाने से बेवजह बढ़े गेहूं के दामों पर अकुंश लग सकता था। महंगे प्याज ने भी सरकारी प्रबंध नीति की कलई खोल कर रख दी है। प्याज आयात के निर्णय में विलंब से समय से प्याज नहीं आ सकी और प्याज के दाम बेकाबू हो गए। और अब जब प्याज आ गई है, तब उसका कोई लेवाल नहीं है। अब सरकार आयातित प्याज बांग्लादेश को निर्यात करने की जुगत में लगी हुई है।

सरकारी घाटा बजट की सफलताः विफलता का एक स्वीकार्य पैमाना बन गया है। सरकारी घाटे को कृत्रिम ढंग से कम रखने की परिपाटी पुरानी है। सरकार खुद उधार न लेकर सरकारी उपक्रमों के माध्यम से उधार लेती है जिसे तकनीकी भाषा में ऑफ बजट उधारी कहा जाता है। इससे बजट में सरकारी घाटा का आकार कम हो जाता है। लेकिन अब इसे काबू में दिखाने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जैसे बड़े टैक्स रिफंडों को रोकना, कहकर जरूरत से ज्यादा अग्रिम टैक्स हासिल करना, पूरे साल का अग्रिम माल भाड़ा वसूल कर लेना, ब्याज अदायगी को टाल देना। पर खामियाजा भी अगले बजट में सरकार को ही भुगतना पड़ता है। इन सब विकल्पों से बजट की गरिमा, साख और विश्वसनीयता कम होती है।

अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्था ने बजट को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की आवश्यकता जताई है। आगामी बजट में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती तो है ही, उससे भी बड़ी चुनौती बजट को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की है, तभी उसका वांछित लाभ अर्थव्यवस्था, निवेशकों और उपभोक्ताओं को मिल पाएगा और बेरोजगारी और महंगाई को काबू करने में सरकार सफल हो पाएगी।

(लेखक अमर उजाला के पूर्व कार्यकारी संपादक)

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