देश की आर्थिक हालत रसातल में पहुंचा दी है मोदी सरकार ने, नई सरकार को सबसे पहले दुरुस्त करना होगा इसे

नरेंद्र मोदी सरकार ने जिस तरह अर्थव्यवस्था का भट्ठा बिठाया, उससे हर वह आदमी चिंतित है जो देश को लेकर सोचता-समझता है। दक्षिण-पश्चिम मानसून से कम बारिश के अनुमान से खाद्य महंगाई ने सिर उठाना शुरू कर दिया है जिसके चौतरफा प्रतिकूल प्रभाव अभी से दिख रहे हैं।

फोटो : Getty Images
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राजेश रपरिया

ऑटोमोबाइल सेक्टर, उपभोक्ता सामानों की बिक्री और कर्ज की स्थिति आदि से अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य का अंदाज हो जाता है। अब चाहे सरकार जिसकी भी बने, उसे अर्थव्यवस्था को इस तरीके से संभालना होगा कि रोजगार बढ़े और आम लोगों की जेब में सचमुच पैसे आएं।

क्या हैं चुनौतियां?

ऑटोमोबाइल सेक्टर आर्थिक विकास का प्रतीक माना जाता है। पर वाहन निर्माताओं के संगठन सोसाइटी ऑफ ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चरिंग (स्याय) ने वाहन बिक्री के जो आंकड़े जारी किए हैं, वे हताश कर देने वाले हैं। वाहनों की बिक्री में 16 फीसदी की महागिरावट दर्ज हुई है। अप्रैल, 2018 में 23.80 लाख वाहनों की बिक्री हुई थी जो अप्रैल, 2019 में घटकर 20.01 लाख रह गई। पिछले 10 साल के दौरान वाहन बिक्री में इतनी चौतरफा गिरावट कभी नहीं देखी गई। यात्री वाहनों में 17 फीसदी, यात्री कारों में 20 फीसदी और यात्री वैनों की बिक्री में 30 फीसदी गिरावटआई है।

दो पहिया वाहनों की बिक्री में 16.36 फीसदी की गिरावट आई है। दोपहिया वाहन निम्न और निम्न मध्य आय वर्ग के लिए जरूरत बन गए हैं। पीछे नकदी और कर्ज का बढ़ता संकट इस गिरावटका सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। यह नोटबंदी के प्रभाव का एक उदाहरण है। खराब मानसून से इस संकट के और बढ़ जाने के आसार हैं।

बिस्कुट, टॉफी, टूथपेस्ट बनाने वाली कंपनियां एफएमसीजी (फास्टमूविंग कंज्यूमर गुड्स) सेक्टर में आती हैं। यह अपनी अर्थव्यवस्था का चौथा सबसे बड़ा सेक्टर है। 2018 में इस सेक्टर का कुल कारोबार 3.4 लाख करोड़ रुपये का था। अरसे से इस क्षेत्र की वृद्धि दर दोहरे अंकों में रही है। इस क्षेत्र के भारी वृद्धि दर की परीकथाओं से अच्छे दिन के सपने बेचे जा रहे थे। लेकिन जनवरी-मार्च, 2019 की तिमाही में आए नतीजे हतोत्साहित करने वाले हैं। इस क्षेत्र की सबसे प्रतिष्ठित कंपनी हिन्दुस्तान यूनिलीवर लि. की बिक्री में कुल 7 फीसदी का इजाफा हुआ है जो पिछले 18 महीनों में सबसे कम वृद्धि दर है।

ग्रामीण क्षेत्र में बिक्री पर ज्यादा असर आया है। सिन्थॉल गुडनाइट- जैसे ख्यात उत्पाद बनाने वाली कंपनी गोदरेज कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स लिमिटेड की बिक्री में महज 1 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है। इस कंपनी का भी कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र में बिक्री उम्मीद से नीचे रही है। कपड़ों में चमक लाने वाले उत्पाद- उजाला व्हाइटनर और मार्गो साबुन बनाने वाली कंपनी ज्योति लेबोरेटरीज की बिक्री में 6.3 फीसदी का ही इजाफा हुआ है। घर-घर में ख्यात डाबर इंडिया लिमिटेड के कारोबार में महज 4.3 फीसदी का इजाफा हुआ है जो पिछले 21 महीनों में सबसे कम है।

यह सेक्टर ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ती भारी मांग से काफी फल-फूल रहा था। पर इन कंपनियां का कहना है कि शहरों से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्र में बिक्री अधिक प्रभावित हुई है। अब खराब मानसून की सूचना से इन कंपनियों की चिताएं बढ़ गई हैं जबकि 2019 के लिए इस क्षेत्र की वृद्धि दर का अनुमान 14-15 फीसदी लगाया गया था।

ग्रामीण क्षेत्र में कुल खर्च का 50 फीसदी हिस्सा एफएमसीजी उत्पादों पर ही खर्च होता है। ग्रामीण क्षेत्र में गिरते उपभोक्ता उत्पादों की बिक्री का संदेश साफ है कि गांवों के लोगों में खरीदने की क्षमता कम हुई है। मतलब, वास्तविक ग्रामीण आय में न के बराबर वृद्धि हुई है और महंगाई बढ़ी है। नई सरकार के सामने इस दुष्चक्र को तोड़ने की भारी चुनौती होगी।

खराब मानसून का सबसे ज्यादा असर किसानों और खेती पर पड़ता है। उत्पादन लागत बढ़ती है, उसके बाद भी उत्पादन घटता है और आय की जगह किसानों और ग्रामीणें की उधारी बढ़ जाती है। कमजोर मानसून का असल असर तो बाद में दिखाई देगा, पर अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ना शुरू हो गया है। इस मनोदशा से निपटना नई सरकार के लिए आसान नहीं होगा। देश की लगभग 67 फीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है।

उपाय क्या हैं?

मंदी-गिरावट का असल कारण बहुत बड़ी आबादी का बढ़ती आय, संपदा और विकास के कामों से वंचित होना है। आय संपदा कुछ ही हाथों में कैद होकर रह गई है। अर्थव्यवस्था की जड़ता को तोड़ने का एक ही उपाय है कि गरीबों-वंचितों की आय को बढ़ाया जाए।

इसका समाधान न्याय-जैसी योजना से ही हो सकता है। इस योजना में देश के पांच करोड़ गरीब परिवारों को 72 हजार रुपये सालाना, यानी 6 हजार रुपये महीने की नकद आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव है। इस योजना के लागू होने से गरीब की आय बढ़ेगी जिससे नई मांग और नया निवेश बढ़ेगा।

नई सरकार न्याय जैसी योजना लागू करती है और मनरेगा- जैसी योजना ज्यादा कारगर ढंग से लागू की जाती है, तब ही अर्थव्यवस्था का गहरा संकट दूर हो सकता है। इसे लागू करने में 3.6 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। इतना फंड आएगा कहां से, यह हल्ला वे लोग ही मचा रहे है जिनके राज में पिछले पांच साल में बड़े लोगों के 5 लाख करोड़ रुपये कर्ज बट्टे खाते में डाल दिए गए हैं।

गैर बैंकिग वित्तीय संस्थाओ (एनबीएफसी) पर भी बड़ा संकट मंडरा रहा है। यह चेतावनी केंद्र सरकार के आला अधिकारी कॉरपोरेट मामलों के सचिव इंजेती श्रीनिवास ने दी है। उन्होंने कहा है कि गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनी क्षेत्र के कर्ज में कमी, उन पर अधिक उधारी और कुछ बड़ी कंपनियों की गलती के कारण एनबीएफसी क्षेत्र की स्थिति नाजुक है और यह संकट के मुहाने पर बैठा है।

  • एनबीएफसी क्षेत्र के संकट को मिटाने के लिए आरबीआई को तेजी से फंड मुहैया कराना चाहिए। इसके साथ ही आडिट व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है।
  • नोटबंदीऔर गलत तरीके से लागू जीएसटी ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों की कमर तोड़ दी है। इन उद्योगों के साथ निर्यातकों के लिए इन्सेंटिव पैकेज की व्यवस्था तुरंत करना जरूरी है।
  • अपना निर्यात काफी घट गया है और इसे बढ़ाना निहायत जरूरी है।

गलत तरीके से लागू की गई जीएसटी ने छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े उद्योगपतियों तक की कमर तोड़ दी है। मोदी सरकार ने राजनीतिक दबाव के तहत जीएसटी में कई संशोधन किए हैं। जरूरत यह है कि जीएसटी दरों को व्यावहारिक तरीके से लागू किया जाए। इसे सचमुच टैक्स सुधार की तरह लागू करना जरूरी है।

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