यूपी में सामाजिक न्याय बनाम हिंदुत्व की लड़ाई में आगे निकला भगवा, महंगाई, बेरोजगारी, छुट्टा मवेशी के मुद्दे हवा हुए

चुनाव के दरम्यान पिछड़े वर्ग के नेताओं ने सपा का दामन पकड़ा तो प्रदेश की सियासत में हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय की लड़ाई आमने-सामने थी। लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि विपक्ष उस लड़ाई में पीछे रह गया।

फोटोः सोशल मीडिया
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साढ़े तीन दशक बाद उत्तर प्रदेश में नई इबारत लिखी गई है। वर्ष 1989 के बाद यह पहली बार होगा जब प्रदेश में किसी पार्टी की सत्ता में लगातार दूसरी बार वापसी हुई है। भाजपा गठबंधन 268 सीटों पर आगे है। समाजवादी पार्टी ने 130 सीटों पर बढ़त बनायी हुई है। सत्तर से ज़्यादा सीटों पर बहुत कम अंतर से मुकाबला चल रहा है। नतीजों से साफ है कि दिखाई कुछ भी दिया हो, अंदर ही अंदर चुनाव में हिंदुत्व का एजेंडा चला है। महंगाई, बेरोज़गारी, छुट्टा मवेशी जैसे मुद्दे और जातीय समीकरणों के मिथक धराशायी हो गए। चुनाव विश्लेषकों की भी यही राय है। चुनाव के दरम्यान पिछड़े वर्ग के नेताओं ने सपा का दामन पकड़ा तो प्रदेश की सियासत में हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय की लड़ाई आमने-सामने थी। लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि विपक्ष उस लड़ाई में पीछे रह गया।

वरिष्ठ पत्रकार सुभाष चंद्र कहते हैं कि सपा और बसपा जाति आधारित राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी समझे जाते हैं। उनसे मुकाबला करने के लिए भाजपा भी सजातीय नेताओं के जरिए विभिन्न वर्गों के वोटरों पर डोरे डालने में जुटी। किसान आंदोलन का असर दिख रहा था। चुनाव के समय से ही जाट लैंड में भाजपा विरोधी लहर ने खूब चर्चा बटोरी थी। चुनाव के पहले चरण की 58 सीटों में से 45 सीटों पर सत्ताधारी दल का कब्जा संकेत देता है कि भाजपा के लिए हिंदुत्व का एजेंडा यहां भी ढाल बना। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव की सभाओं में उत्साहित भीड़ दिखी। पर वह नतीजों में तब्दील नहीं हो सकी। आश्चर्यजनक तरीके से बसपा दो सीटों तक सिमट कर रह गयी है। यह संकेत देता है कि पार्टी के सॉलिड वोट बैंक समझे जाने वाले वोटरों ने भी अब उनसे किनारा कर लिया है।

प्रतीक कुमार कहते हैं कि पश्चिमी यूपी में महिलाओं की सुरक्षा बड़ा मुददा है। जिस तरह पिछली सपा सरकार में महिलाओं के साथ अपराध बढ़े थे। खासकर उनकी वजह से पश्चिमी यूपी की एक बड़ी आबादी प्रभावित थी। महिलाओं के लिए खुद का सम्मान बचाना एक बड़ी चुनौती थी। भाजपा गुंडागर्दी पर क़ाबू के नाम पर इसे मुद्दा बनाकर उभारने में कामयाब रही। इन सीटों के नतीजों में उसकी झलक दिखायी देती है। मुख्तार अंसारी सरीखे माफियाओं पर कार्रवाई ने भी आम जनता को प्रभावित किया। अभी तक की सरकारों ने अपराधियों के खिलाफ इतनी हिम्मत नहीं दिखायी थी।

राजधानी की नौ सीटों पर मिला जनादेश भी यही संकेत देता है और इसी जनादेश की छाप पूरे प्रदेश में दिख रही है। लखनऊ की नौ सीटों में से सात सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को विजय मिलती दिख रही है। जबकि पिछले चुनावों में इनमें से आठ सीटों पर भाजपा का कब्जा था। राजधानी में भाजपा ने अपना पुराना रिकार्ड दोहराया है। सिर्फ लखनऊ उत्तर विधानसभा सीट पर भाजपा को मात मिली है। पिछले चुनाव में लखनऊ मध्य विधानसभा सीट से विजयी हुए मंत्री ब्रजेश पाठक मौजूदा चुनाव में लखनऊ कैंट से प्रत्याशी थे। वह जीत गए हैं। सरोजनीनगर विधानसभा क्षेत्र से पूर्व पुलिस अधिकारी राजेश्वर सिंह 12 हजार से अधिक मतों से सपा प्रत्याशी अभिषेक मिश्रा को पछाड़ चुके हैं।


वर्ष 2017 में अवध क्षेत्र की 127 सीटों में भाजपा का 100 सीटों पर कब्जा था। इस बार उन्हें 84 सीटों का फायदा हुआ है। इस इलाके में सबसे बड़ा मुददा रामजन्म भूमि का है। यह इस इलाके में निर्मित हो रहा है। यह लोगों की भावना से जुड़ा हुआ है। अवध क्षेत्र में लखनऊ, सुल्तानपुर, प्रयागराज, बाराबंकी,अयोध्या, अम्बेडकर नगर, प्रतापगढ़, बहराइच, बलरामपुर, गोंडा, हरदोई आदि जिले आते हैं।

चुनाव विश्लेषक गोरखनाथ राव कहते हैं कि यह मत मानिए कि अब सिर्फ सवर्ण वर्ग ही भाजपा का वोटर है। नतीजे बता रहे हैं कि पिछड़े, अतिपिछड़े और दलित मतदाताओं का भी एक वर्ग भाजपा के साथ आ गया है। एमवाई फैक्टर ने सपा का साथ दिया है। इसी वजह से पार्टी को पिछले चुनाव की अपेक्षा मौजूदा चुनाव में बढ़त हासिल हुई है। पर अतिपिछड़ा वर्ग के ज्यादातर मतदाताओं ने सपा को नकार दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर कयास लगाए जा रहे थे कि रूहेलखंड में भी भाजपा को नुकसान हो सकता है। पर भाजपा को यहां 10 सीटों का नुकसान हुआ है। पिछले चुनाव में यहां की 25 सीटों में से 23 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। इससे साबित होता है कि राजनीतिक कलेवर को देखकर कयास लगाए जाते हैं। उनकी अपेक्षा सरकार के जमीनी कामों के आधार पर जनता वोट देती है।

बुंदेलखंड में भाजपा फिर एक बार बड़ी ताकत बनकर उभरी है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां की 19 सीटों पर भगवा लहराया था। इस बार सिर्फ तीन सीटों का नुकसान होता दिख रहा है। सपा को दो और बसपा को एक सीट का फायदा होता दिख रहा है। स्थानीय समाजसेवी ब्रजेन्द्र कहते हैं कि बुंदेलखंड में बसपा का बेस वोट बैंक काफी तादाद में है। पर 2017 के नतीजों से समझा जा सकता है कि वह वोटर तब भाजपा का रूख कर चुका था और मौजूदा नतीजे भी इसी तरफ इशारा कर रहे हैं।

सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने वाले लाभार्थियों ने इस चुनाव में अहम भूमिका निभायी है। भाजपा ने बसपा को उसके ही गढ़ में करारी मात दी है। 2012 के नतीजों की बात करें तो बसपा ने बुंदेलखंड की सात सीटों पर कब्जा जमाया था। यह वह दौर था, जब बसपा की सत्ता में वापसी नहीं हुई थी। उस समय सपा ने पांच सीटों पर कब्जा जमाया था। मौजूदा चुनाव में सपा को भी इस इलाके से काफी उम्मीद थी। अन्य पिछड़ा वर्ग बहुल इस इलाके में एससी मतदाता भी अहम भूमिका निभाते हैं।

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Published: 10 Mar 2022, 6:00 PM