अफगान फिल्मकार शाहरबानू सादात की फिल्म ‘द ऑर्फनेज’: बॉलीवुड और अफगान लोगों के रिश्ते को दर्शाती फिल्म

अफगान फिल्मकार शाहरबानू सादात की फिल्म ‘द ऑर्फनेज’ में दिखाया गया है कि कैसे हिन्दी सिनेमा और विशेषरूप से अमिताभ बच्चन अनाथ किशोरों की कल्पना को पंख देते हैं, खासकर कहानी के नायक कुदरत उल्लाह की कल्पनाओं को।

फोटो: सोशल मीडिया
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नम्रता जोशी

विदेश जाने वाले बहुत-से भारतीयों के पास देश के ग्लोबल सॉफ्ट पावर बॉलीवुड के बारे में दुनिया के अनपेक्षित स्थानों और अनजान लोगों से सुनी गई संभवतः एक या दो कहानियां जरूर होंगी। मुझे याद है कि टोरंटो में मुझे वेस्ट इंडीज का एक टैक्सी ड्राइवर मिला था और वह प्रियंका चोपड़ा का जबरदस्त प्रशंसक था। वह भी मेरी ही तरह ए.आर. रहमान के संगीत वाले गीत ‘छैयां-छैयां’ को पसंद करता था।

हालांकि मेरी पसंदीदा कहानी 2019 में एक खिलखिलाती धूप से भरी रविवार की सुबह कान के आर्केड थियेटर से संबंधित है। मैं युवा अफगान फिल्मकार शाहरबानू सादात की फिल्म ‘द ऑर्फनेज’ देखने गई थी। यह फिल्म कान फिल्म समारोह के डायरेक्टर्स फोर्टनाइट साइडबार में दिखाई जा रही थी। इस फिल्म की शुरुआत में अमिताभ बच्चन की 1982 की फिल्म ‘नमक हलाल’ के लोकप्रिय गीत ‘जवानी जानेमन’ को देखकर में पूरी तरह से हैरान रह गई।

फिल्म में गाने में परवीन बॉबी के शुरुआती लटके-झटके के साथ चीजें खत्म नहीं होतीं। सादात की फिल्म अफगानिस्तान के एक अनाथालय में बड़े हो रहे किशोर अवस्था के लड़कों के जीवन के बारे में है। इस फिल्म की कहानी उस वक्त के आसपास बुनी गई है जब अफगानिस्तान एक गणराज्य से इस्लामी राज्य में तब्दील हो रहा था और मुजाहिदीनों ने उस पर नियंत्रण कर लिया था। यह फिल्म हमें दिखाती है कि कैसे हिन्दी सिनेमा और विशेषरूप से बिग बी (अमिताभ बच्चन) इन निराश्रित युवकों की कल्पना को पंख देते हैं, खासकर कहानी के नायक कुदरत उल्लाह की कल्पनाओं को। बॉलीवुड के सितारों का प्रभाव मात्र दीवार पर चिपकी हुई तस्वीरों या पोस्टरों तक अथवा सितारों-जैसे बालों के अंदाज में अपने बाल कटवाने तक ही सीमित नहीं है। बच्चे इनसे इतने प्रभावित होते हैं कि वे इन सितारों-जैसा जीवन दोहराना चाहते हैं।

हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री को भी उऩके मार्गदर्शक के रूप में भी दिखाया गया है। कुदरत उल्लाह की भावनाओं को बिग बी के गानों ने इस कदर प्रभावित किया है कि वह कई बार खुद को ही बहुत सारे गानों के दृश्यों में काल्पनिक रूप से शामिल कर लेता है। जैसे- ‘जाने कैसे कब कहां इकरार हो गया’ (शक्ति) और ‘जिंदगी तो बेवफा है इक दिन तो ठुकराएगी’ (मुकदर का सिकंदर)।


बाद में मैंने एक लंबे साक्षात्कार के दौरान सादात से पूछा था कि उनके किरदारों की भांति क्या बिग बी और बॉलीवुड उनके अपने बचपन में कोई महत्वपूर्ण स्थान रखते थे। उनका जवाब था, “नहीं, मैं बॉलीवुड से बहुत दूर थी।” लेकिन उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया कि देश के बाकी बहुत सारे हिस्सों पर इनकी जबरदस्त पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। उन्होंने कहा, “हम लोग हर वक्त अमिताभ बच्चन की बातें करते थे और जब हम गाड़ी चला रहे होते थे तो बस हम 1970 और 1980 के दशकों के तथा राजकपूर से लेकर बच्चन तक के सभी भारतीय गाने गाया करते थे।”

बाद में जब सादात ने इस श्रृंखला की दूसरी फिल्म पर काम शुरू किया जो अनवर हाशमी की अप्रकाशित डायरियों पर आधारित थी, तो उन्होंने फैसला किया कि वह राजकपूर, अमिताभ बच्चन से लेकर शाह रुख खान तक की सभी फिल्में देखेंगी। उन्होंने बताया कि उन्होंने तकरीबन चार सौ फिल्में देखीं। कभी-कभी उनमें से कुछ सब-टाइटल के बिना भी होती थीं लेकिन उन्हें पटकथाएं बहुत ही सरल लगीं और भाषा समझने में आसान लगी, बहुत सारे शब्द तो फारसी-जैसे ही थे।

सादात के साथ हुई इस बातचीत की रिकॉर्डिंग ने मुद्रण का रूप नहीं लिया। लेकिन इस रिकॉर्डिंग की याद पुनः तब ताजा हो गई जब मैंने काबुल के पतन और सादात के काबुल से पेरिस जाने के प्रबंध के बारे में पढ़ा। यह इतना ही लंबा तनाव भरा ऑपरेशन था कि स्वयं यह बॉलीवुड की फिल्म की कहानी-जैसा ही लग रहा था।

जहां बॉलीवुड लगातार तूफानों की चपेट में बना हुआ है, मैंने इस रिकॉर्डिंग को फिर एक बार और सुना। बॉलीवुड की सारी ताकत और गौरव को धूल में मिला दिया गया है, भले ही वह चाहे अभी भी अकल्पनीय हिंसा, कोलाहल और आघात के बीच भी कितने ही नाउम्मीदों के अनजान जीवन में लगातार खशिु यां लाता है।

‘द ऑर्फनेज’ में बॉलीवुड को गरीब और अनाथ बच्चों के लिए एक राहत के रूप में दिखाया गया है। अफगानिस्तान के लोग भावनाओं की अभिव्यक्ति बहुत ज्यादा नहीं कर पाते। सादात कहती हैं, “अगर आप उनके चेहरों को देखेंगे तो आप ठीक से नहीं बता सकते कि वे खुश हैं या उदास हैं। आप नहीं बता सकते कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। और फिर बॉलीवुड के प्रति प्यार में एक विरोधाभास है। चाहे प्यार हो, गुस्सा हो, बदला हो या लड़ाई हो; हर कोई उन फिल्मों में भावनाओं को एक बहुत ही ऊंचे स्तर पर महसूस कर रहा है।”


हमारी फिल्मों में दिखाए जाने वाले अतिरेक मेलोड्रामा का वास्तव में अफगानों पर क्या असर होता है? सादात कहती हैं, “वे पर्दे पर अपना रोजमर्रा का जीवन देखने में कोई रुचि नहीं रखते...लेकिन वे जो देखना पसंद करेंगे, वह कुछ ऐसा होना चाहिए जो वास्तविक न हो। कुछ ऐसा हो जो सच्चाई की ही दिशा बदल देता हो।” बिग बी और शाह रुख खान के अलावा सादात बताती हैं कि एक और भारतीय सुपर स्टार हैं जो छाए हुए हैं। वह कहती हैं, “मुझे उनका नाम तो याद नहीं है। वह बॉलीवुड से तो नहीं हैं लेकिन दूसरी बड़ी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री से हैं...जब वह किसी को घूसा मारते हैं तो बीस लोग हवा उड़ जाते हैं... वह अपनी सिगरेट बंदूक से जलाते हैं।” यह और कोई नहीं थलाइवा रजनीकांत हैं!

‘द ऑर्फनेज’ में दिखाया गया है कि कुदरत उल्लाह काबुल में एक सिनेमाघर के बाहर बिग बी की फिल्म ‘शहंशाह’ के टिकट ब्लैक में बेच रहा है। मुझे बताया गया था कि 2019 में काबुल में तीन सिनेमाघर थे। यह ऐसी जगहें होती हैं जहां औरतें नहीं जाती हैं। ऐसा नहीं था कि वहां औरतों को जाने की अनुमति नहीं थी लेकिन भीड़ इतनी ज्यादा और बेकाबू होती थी कि उसे संभालना मुश्किल हो जाता था। वह कहती हैं, “ऐसे लगता था जैसे अंदर सर्कस चल रहा हो। वे पेशावर की बहुत सारी सस्ती और घटिया फिल्में दिखाते थे।” वह आगे कहती हैं, “बॉलीवुड की फिल्मों की डीवीडी काबुल में ब्लैक मार्केट में मिल जाती हैं।”

सादात ने सलीम शाहीन के बारे में भी बताया। सलीम शाहीन बॉलीवुड के, और खासकर धर्मेन्द्र के बहुत बड़ी प्रशंसक हैं। वह अपने दम पर फिल्मकार बने हैं और स्थानीय फिल्मों के सफल निर्माता हैं। फ्रांसीसी पत्रकार सोनिया क्नलैंड ने उन पर एक डॉक्युमेंट्री बनाई है जिसका नाम है ‘नथिंगवुड’। और इसी स्पेक्ट्रम के दूसरे छोर पर अफगानिस्तान के ही सिद्दीक बरमक हैं। उन्होंने अपनी फिल्म ‘ओसामा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की श्रेणी में गोल्डन ग्लोब का पुरस्कार जीता है। सादात कहती हैं, मुझे लगता है कि भारतीय क्रू के साथ वह एक फिल्म पर काम कर रहे हैं।

उस दिन सादात अपनी टी-शर्ट पर लिखे – “पीस विद तालिबान = वार ऑन अफगान वूमेन” के कारण सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। उन्होंने उस टी-शर्ट को जान-बूझकर पूरे दिन पहन कर रखा ताकि वह वैश्विक फिल्म निर्माण समुदाय का ध्यान उस समय तालिबान के साथ चल रही शांति- वार्ताओं की निरर्थकता की ओर खींच सके। वह लगातार कहती रहीं कि अगर तालिबान ने देश पर दोबारा नियंत्रण कर लिया तो उन्हें अपने घर से बाहर निकलने या फिल्म बनाने की इजाजत नहीं मिलेगी। वह केवल अपनी बात नहीं कर रही थीं बल्कि ऐसी अवस्था में सारी महिलाओं की स्थिति पर जोर दे रही थीं। उन्होंने आगाह किया था कि “अगर अफगानिस्तान इस्लामिक अमीरात बन जाएगा तो औरतों की स्थिति बिल्कुल वैसी ही हो जाएगी जैसी तालिबान के शासनकाल में 1996 से लेकर 2001 तक थी और वे केवल जन्म देने वाली मशीन बन जाएंगी।”


वर्तमान समय में युद्ध से तबाह अफगानिस्तान और बॉलीवुड के भीतर चल रही घेराबंदी को देखा जाए तो टकराव की स्थिति या अलोकतांत्रिक ताकतों के चलते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध को लेकर उस दिन के उनके शब्द पूरी तरह से सच साबित हुए हैं। उन्होंने कहा था, “ऐसे बहुत से फिल्मकार हैं जो यह मानते हैं कि जब आप अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलते हैं तो आपको कहानी सुनाने की और भी ज्यादा इच्छा होती है और आपके पास बताने के लिए ज्यादा रोचक कहानियां भी होती हैं।”

शायद बहुत सारे मोर्चों पर चल रहे संकटों के चलते बॉलीवुड अपने आत्मसंतोष की स्थिति से जागेगा और आगे बढ़कर नई दुनियाओं को फतह करेगा। कौन नहीं चाहेगा कि बिग बी और थलाइवा और आगे यात्रा करें? और अधिक तेजी के साथ, मजबूती के साथ और ऊंचाइयों तक पहुंचें।

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