फिल्मी दुनिया की दो फिल्मों की टक्कर: जय भीम बनाम सूर्यवंशी, कौन बेहतर और क्यों?

जहां ‘जय भीम’ संस्थागत समस्याओं से सीधे मुठभेड़ करती है, वहीं इसके विपरीत ‘सूर्यवंशी’ राज्य की एक फिल्मी टूलकिट की तरह हमारे सामने चलती रहती है जो मौजूदा समय में देश में चल रहे एक बड़े आख्यान के अनुरूप लगती है।

फोटो: सोशल मीडिया
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नम्रता जोशी

दो दो नवम्बर को अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई तमिल फिल्म ‘जय भीम’ में एक संवाद है - “जिस तरह का सम्मान किसी व्यक्ति की प्रतिभा को मिलता है वह इस बात पर निर्भर करता है कि उसने उसका इस्तेमाल किस तरह के कार्य के लिए किया है।” फिल्म में यह संवाद एडवोकेट चन्द्रू के संदर्भ में फिल्माया गया है, जिसमें वह बता रहे हैं कि जिस केस पर वह काम कर रहे हैं उसमें न्याय मिल गया है, यह जानने के बाद ही वह चैन की नींद सोए पाए। फिल्म में एडवोकेट चन्द्रू का किरदार अभिनेता सूर्या ने निभाया है।

मैंने इसे एक अलग परिदृश्य में रखा है, कि किस तरह से कुछ प्रमुख भारतीय फिल्म निर्माण उद्योग, बड़ी बजट की फिल्में और सुपर स्टार कोविड के बीते कुछ महीनों से बाहर निकल आए हैं। और उन्होंने अपनी प्रतिभा का किस उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया है और कितनी सफलता के साथ किया है।

इसलिए दिवाली के अवसर पर यदि कॉलीवुड एवं सूर्या ने जातीय भेदभाव, आदिवासियों के शोषण और पुलिसवालों द्वारा हिरासत में की गई हिंसा पर नजर डाली है, तो ‘सूर्यवंशी’ में बॉलीवुड ने पुलिस बल को बड़े ही जोर-शोर से राष्ट्र की अन्तरात्मा के रक्षक होने के साथ-साथ महान, प्यारा, मिलनसार और एक दोस्ताना समुदाय के रूप में दिखाया है।

आप इन दोनों फिल्मों को बारीकी से देखेंगे तो इनमें ज्यादा फर्क नहीं है। दोनों ही पुलिसवालों की दुनिया के इर्द-गिर्द घूमती हैं। दोनों ही अत्यधिक नाटकीय और तीक्ष्ण हैं तथा अपने मुख्य पात्रों को बड़े स्तर पर चित्रित करती हैं जो जनता को नैतिक रूप से ऊंचा उठाने के लिए तत्पर हैं। दोनों ही फिल्मों के पास न्यायसंगत पुरुष नायक हैं जो अपने कंधों पर दुनिया की नैतिकता का भार उठाए हुए हैं। लेकिन अंतर इस बात में निहित है कि वे किसके बारे में नेकदिल हैं। टीजे ज्ञानवेल की ‘जय भीम’ अपनी राजनीति में उचित रूप से एक जुझारू फिल्म है। यह फिल्म 1993 की एक सच्ची घटना पर आधारित है। यह उस केस के बारे में जिसे जस्टिस के. चन्द्रू (जो तब वकील थे) ने ईरुला जनजाति की महिला सेंगेनी की तरफ से लड़ा था जिसका पति राजकन्नु पुलिस द्वारा चोरी के आरोप में गिरफ्तार किए जाने के बाद गायब हो जाता है।


तमिल सिनेमा ने ऐसे बहुत सारे अति तीव्र और शक्तिशाली आख्यान देखे हैं जो व्यवस्थागत उत्पीड़न के बारे में हैं जिनमें ताकतवर लोगों के हाथों हाशिये पर खड़े लोगों का शोषण होता है। इनमें वेत्रिमारन की शानदार सामाजिक-राजनीतिक थ्रिलर ‘विसरानाई’ भी शामिल है, जिसने ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। लेकिन जहां तक ‘जय भीम’ का सवाल है तो इसमें यह क्षमता है कि वह दर्शकों के व्यापक समूह से सीधे-सीधे मुखातिब होती है, संवाद करती है, जागरूकता पैदा करती है और जिन चीजों पर खुलकर बहस करने की जरूरत है उसके लिए उन्हें सवाल करने और बोलने के लिए तैयार करती है। वह यह सब-कुछ बिना मुलम्मा चढ़ाए करती है। यह फिल्म अपने स्टार कलाकार के करिश्मे और इस फिल्म की मुख्य विषय-वस्तु के साथ न्याय करने में सफल रही है। इसके अलावा चन्द्रू पूरी फिल्म पर हावी नहीं होते। यह फिल्म चन्द्रू पर उतनी केन्द्रित नहीं है जितनी की सेंगेनी पर और उस लक्ष्य पर है जिसके लिए वह लड़ रहे हैं।

वहीं, दूसरी तरफ रोहित शेट्टी की ‘मनोरंजक’ फिल्म ‘सूर्यवंशी’ केवल एक व्यक्ति और उसके कृत्रिम साहस के प्रदर्शन पर केन्द्रित है जो कैमरे के सामने धीरे-धीरे आते हुए एक मर्दाना अक्कड़ का पूरा प्रदर्शन करता है। उसका हास्यबोध इतना खराब है कि उस पर तो चर्चा करना ही बेकार है। साथ ही वह इतना बड़ा भुलक्कड़ है कि फिल्म में सरस्वती नाम की महिला को गर्भवती कहकर बुलाता है। मजाक इतने मूर्खतापूर्ण हो सकते हैं, सोचना था!

इससे भी अलग बात यह है कि जहां ‘जय भीम’ संस्थागत समस्याओं से सीधे मुठभेड़ करती है, वहीं इसके विपरीत ‘सूर्यवंशी’ राज्य की एक फिल्मी टूलकिट की तरह हमारे सामने चलती रहती है जो मौजूदा समय में देश में चल रहे एक बड़े आख्यान के अनुरूप लगती है। हम देखते हैं कि हमारी पिछली पीढ़ी को विभाजन के लिए दोषी ठहराया जाता है, मुसलमानों की बराबरी पाकिस्तान और आतंकवाद से की जाती है। अच्छे मुसलमान और बुरे मुसलमान (कसाब और कलाम) की बाइनरी पर यह एक चित-परिचित नाटक है तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता पर शून्य विनम्रता के साथ उपदेश दिए जाते हैं, लेकिन इसमें भी हिन्दुओं का हाथ ऊपर दिखाया जाता है।


पिछले कुछ वर्षों में जैसा हमारे देश का हाल हो गया है, यह उसका वाचन है। यहां तक कि फिल्म इंडस्ट्री भी लोकप्रिय और सरकार स्वीकृत सिनेमा की मदद से ऐसी कथाएं बुन रही है जो उसके आख्यान को निरंतर मजबूत बनाती जा रही है। ‘छोड़ो कल की बातें’- जैसे पुराने नेहरूवादी गीतों को अपनाकर नए भारत का प्रचार करें, लेकिन यह अब खोखली बयानबाजी से ज्यादा कुछ नहीं लगता। बल्कि यह फिल्म इतनी उबाऊ है कि यह वह करने में भी कामयाब नहीं हुई जो तय था – यानी मनोरंजन।

दोनों फिल्मों के स्क्रीन पर आने के एक हफ्ते से अधिक समय के बाद भी लोग अभी तक ‘जय भीम’ के बारे में ही बातें कर रहे हैं। उसकी तारीफ और आलोचना में लगातार लिख रहे हैं। एक अच्छी फिल्म हमेशा ही एक अच्छा प्रभाव छोड़ती है और विमर्श पैदा करती है। जहां तक ‘सूर्यवंशी’ और बॉलीवुड का सवाल है तो उन्होंने एक हफ्ते के भीतर ही करोड़ों रुपयों की कमाई की है। बॉलीवुड खुशी से फूला हुआ है क्योंकि दर्शकों ने अप्रत्याशित रूप देश में आर्थिक मंदी और कोविड के कारण स्वास्थ्य के खतरे के बावजूद सिनेमाघरों को त्यागा नहीं है और पैसा बरस रहा है। सबसे नया उत्साह है अक्षय कुमार की अगली फिल्म ‘पृथ्वीराज’ के टीजर के जारी होने और उसके रिलीज होने की तारीख (जो संयोग से गणतंत्र दिवस के साथ ही है) की घोषणा होने को लेकर है। यह फिल्म यश राज फिल्म्स के बैनर तले बन रही है और इसके निर्देशक डॉ. चन्द्रप्रकाश द्विवेदी हैं।

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