फिल्म जगत पर कोरोना ने ढाया कहर, अब महामारी को इस तरह मात दे रहा बॉलीवुड

कोविड महामारी ने बॉलीवुड को अनेक प्रकार से प्रभावित किया है लेकिन लॉकडाउन की चोट इस इंडस्ट्री पर सबसे भारी रही क्योंकि इसके चलते कई फिल्मों की शूटिंग बीच में ही रुक गई।

फोटो:  सोशल मीडिया
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गरिमा सधवानी

जबसे सोशल डिस्टेन्सिंग– जैसे शब्द ने पिछले वर्ष से हमारे शब्दकोशों में प्रवेश पाया है, तब से लोगों के आपस में मेलजोल और चीजों से निकटता ने एक यू-टर्न ले लिया है। फिर भी, चाहे कुछ भी हो जाए, फिल्म इंडस्ट्री एक ऐसी जगह है जहां कभी भी निकटता को सदा के लिए तो छोड़ो, अस्थायी रूप से भी अलविदा नहीं कहा जा सकता। कोविड महामारी ने बॉलीवुड को अनेक प्रकार से प्रभावित किया है लेकिन लॉकडाउन की चोट इस इंडस्ट्री पर सबसे भारी रही क्योंकि इसके चलते कई फिल्मों की शूटिंग बीच में ही रुक गई।

निर्देशक विकास चंद्रा बताते हैं कि पिछला वर्ष बहुत ही मुश्किलों से भरा रहा क्योंकि सेट पर काम करने वाले बहुत सारे लोग अनौपचारिक क्षेत्रों से आते हैं। कोविड महामारी के पहले उनके पास बहुत सारा काम हुआ करता था। और हर एक का स्वागत था। लेकिन जबसे इस महामारी के चलते लॉकडाउन लगाया गया तो लोगों की आजीविका और बचत- सभी डूब गई। जंगली पिक्चर्स के अनूप पांडेय का मानना है कि मौजूदा वक्त किसी भी प्रकार से रचनात्मक प्रयासों के लिए उचित समय नहीं है। वह कहते हैं, “लेखकों को अपनी पटकथाओं को पूरी करने में बहुत मुश्किल हो रही है, पर क्योंकि ज्यादातर काम शुरू हो चुका है इसलिए किसी भी प्रकार से एक समय सीमा को मानकर काम तो पूरा करना ही होगा।” और ऐसा ही बहुत से दूसरे लोगों के साथ भी हो रहा है- जैसे फोटोग्राफर, स्टाइलिस्ट या मेकअप आर्टिस्ट। लेकिन संघर्ष के बावजूद बॉलीवुड निरंतर हमारा मनोरंजन कर रहा है।

अब शूटिंग के दोबारा से रफ्तार पकड़ने के साथ ही जो सबसे बड़ी चिंता है, वह है पूरे क्रू की सुरक्षा। लेकिन हर बार की तरह मुश्किलों के आगे हौसला दिखाते हुए बॉलीवुड अब कुछ ऐसे स्टार्टअप और कंपनियों को ढूंढ रहा है जो सेनिटाइजेशन की जिम्मेदारी को बड़ी कुशलता से निभाते हों। आदित्य गुप्ता लाइफ फर्स्ट के संस्थापक हैं। उनकी यह कंपनी सेनिटाइजेशन में पहली दक्ष कंपनी है। आदित्य गुप्ता कहते हैं कि वह उस इंडस्ट्री (बॉलीवुड) को अपने पैरों पर खड़े होने के लिए सहायता प्रदान करना चाहते हैं जिसने उन्हें एक निर्देशक के रूप में इतने महान वर्ष दिए।

चंद्रा मुस्कराते हुए कहते हैं, “यह हमारी विविधता का साक्ष्य है। जब भी कभी मुश्किलों ने सर उठाया है तो हमने उससे निपटने के लिए नए समाधान खोज निकाले हैं।” वह यह भी कहते हैं कि यह महामारी एक चीज तो बिल्कुल नहीं कर सकती और वह है बॉलीवुड को तोड़ना। यहां तक कि चंद्रा ने किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचते हुए महामारी के दौरान ही एक प्रोजेक्ट को अस्सी दिन में शूट किया। वह कहते हैं कि उनकी कार्यकारी निर्माता सुनीता राम ने पिछले वर्ष चंद विज्ञापनों और लघु फिल्मों की शूटिंग की थी, ताकि हम पूरे विश्वास के साथ यह कह सकें कि अगर हम सभी प्रोटोकॉल का पालन करते हैं तो एक फीचर फिल्म की शूटिंग भी की जा सकती है। इस पर राम सिर हिलाते हुए कहती हैं कि फिल्म के सेटों पर अब एक निर्देश पुस्तिका रखी हुई है जिसमें सारे नियम लिखे गए हैं जिनका सभी निरंतर पालन करते हैं। हर प्रकार की जांच और संतुलन को बनाए रखते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है कि किसी भी कारण से फिल्म के सेट इस महामारी के सुपर स्प्रेडर न बनने पाएं।


अब हर शूटिंग के लिए टीमों को चिह्नित किया जा रहा है। ‘हॉटसेट’ में उन कलाकारों को रखा जाता है जो हर समय मास्क नहीं पहन सकते और इसका कारण यह है कि उनका काम उनको इसकी इजाजत नहीं देता है। इसलिए इस समूह को प्राथमिकता दी जाती है और उन्हें सुरक्षित रखना सबसे बड़ी जरूरत बन जाती है। क्रू के कुछ और भी सदस्य होते हैं जो अधिकांश समय इस समूह के सबसे करीब रहते हैं। यही कारण है कि इन सभी लोगों में से हर एक को अलग-अलग कर दिया जाता है और शूटिंग पूरी होने तक बायो बबल्स में रखा जाता है। सेट पर कोविड सुरक्षा अधिकारी भी तैनात होते हैं। इसके अलावा वाईआरएफ फिल्म्स की तरह ही सभी प्रोडक्शन हाउस अपने सभी कार्यबल के टीकाकरण की पहल कर रहे हैं।

लेकिन गुप्ता कहते हैं कि फिल्म के सेट पर साफ-सफाई के पारंपरिक तरीके अब नहीं अपनाए जा सकते। वह कहते हैं, “बिजली के उपकरणों की वजह से हमें सेनिटाइजेशन को ड्राई और असरदार तरीके से करवाने की जरूरत है।” इतना ही नहीं, आवश्यक यह भी है कि जो भी तरीका अपनाय़ा जाए, वह प्रभावशाली और पोर्टेबल हो। इसके साथ ही गुप्ता यह भी बताते हैं कि हमारी कंपनी को सिर्फ यह सुनिश्चित करने के लिए एक डेटा बेस रखना पड़ता है कि जो लोग सेट से दूर हैं, वे किसी भी प्रकार से इस दौरान वायरस के संपर्क में न आएं। वह कहते हैं, “जो अंसगठित कार्यबल होता है, हमें उसे यह समझाना पड़ता है कि यदि किसी भी कारण से उन्हें महामारी के कोई लक्षण दिखते हैं तो वे सेट पर न जाएं लेकिन उन्हें उस दिन का उनका भुगतान जरूर किया जाएगा।” लोगों में सेनिटाइजेशन की संस्कृति को गहरा बिठाना भी एक कार्य है। इस पर सहमति जताते हुए राम कहती हैं, “सभी लोगों की सुरक्षा को खतरे में डालना या शूटिंग को रोकना बहुत महंगा पड़ सकता है। इसके बजाय थोड़ा सतर्क रहना और कुछ प्रोटोकॉल का पालन करना ज्यादा फायेदमंद है।” यही कारण है कि दैनिक परीक्षणों की जांच के अलावा क्रू यह भी सुनिश्चित करता है कि जब ये लोग अपने बायो बबल से बाहर आएं, तब भी वे पूरी हिफाजत में रहें। पांडेय हमें यह समझाते हुए बताते हैं कि हर एक को सुरक्षित रखने की जरूरत असल में पूरे मामले का सबसे किफायती पहलू भी है। निर्माता को सेट पर हर रोज लाखों रुपये की लागत आती है और अगर ऐसे में एक भी मामला सामने आता है तो पूरे सेट को कम-से-कम 14 दिनों के लिए सील करना पड़ सकता है जो निर्माता के लिए एक बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। वह बताते हैं कि बायो बबल्स और पूरे क्रू के लिए होटल की बुकिंग भी फिल्म की लागत में अतिरिक्त खर्चा है। लेकिन मौजूदा हालात और समय को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है। पांडेय कहते हैं, “कलाकारों और क्रू के सदस्यों को जिम्मेदारी उठानी होगी। लेकिन शुक्र है कि इस इंडस्ट्री में हर व्यक्ति न केवल बहुत सहयोगी है बल्कि बहुत समझदार भी है।” वह मानते हैं कि इस महामारी ने लोगों के अंदर सेनिटाइजेशन और सुरक्षा को लेकर एक अनुशासन की भावना पैदा कर दी है। वह कहते हैं, “इस महामारी ने हमें सेनिटाइजेशन के साथ-साथ ज्यादा निपुण होना भी सिखाया है क्योंकि अब सेट पर तुलनात्मक रूप से कम लोग काम करते हैं। इससे अस्त-व्यस्तता भी कम होती है।”


गुप्ता और पांडेय- दोनों ही इस बात पर सहमत हैं कि शूटिंग तो शुरू हो गई हैं लेकिन इंडोर शूटिंग करना एक बेहतर विकल्प है क्योंकि स्थितियां पूरी तरह से आपके नियंत्रण में रहती हैं जबकि आउटडोर शूटिंग करने में बहुत कुछ बड़ी आसानी से गड़बड़ा जाता है। लेकिन सेट कितने भी सुरक्षित क्यों न बना दिए जाएं, महामारी के पहले का जो समय था और जिस तरह से शूटिंग होती थी, उसका कोई जवाब नहीं है। चंद्रा स्वीकार करते हैं, “तब सब एक पार्टी जैसा लगता था। डेढ़ सौ से लेकर दो सौ लोग एक विजन को साकार करने के लिए एक साथ काम करते थे। तब जो समर्पण और मेहनत होती थी, और एक मैजिक क्रिएट करने के लिए जो जोश होता था, वह बेजोड़ था।” लेकिन अब हर व्यक्ति जानता है कि अगर कोई दृश्य बहुत ही जोरदार हो तो भी वह उसकी खुशी में आगे बढ़कर अपनी टीम को गले नहीं लगा सकता।

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