फिल्म क्लोज: ट्रांसगर्ल की बैलेरीना बनने की आकांक्षाओं की कहानी नहीं, खुद की तलाश की कहानी भी है

लुकास धोंट की ‘क्लोज’ कई तरह से याद रह जाने वाली फिल्म है। यह अपने दो नायकों- लियो (ईडन डैमब्राइन) और रेमी (गुस्ताव डी वेले) के चेहरों के सहारे आगे बढ़ती है जो हमें रेनेसां (पुनर्जागरण काल) के स्वर्गदूतो की याद दिलाते हैं।

फोटो: सोशल मीडिया
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नम्रता जोशी

लुकास धोंट की ‘क्लोज’ कई तरह से याद रह जाने वाली फिल्म है। यह अपने दो नायकों- लियो (ईडन डैमब्राइन) और रेमी (गुस्ताव डी वेले) के चेहरों के सहारे आगे बढ़ती है जो हमें रेनेसां (पुनर्जागरण काल) के स्वर्गदूतो की याद दिलाते हैं। यह दरअसल सौंदर्य के बीच विद्रूप की कहानी है। सारा कमाल फ्ररैंक वैन डेन ईडन के कैमरे का है। यहां रमणीय प्रकृति है जहां घास के विशाल मैदानों और जीवन का पर्याय बने फूलों के खेतों के बीच खिलखिलाने के अवसर हैं, तो इसी आकर्षण के वशीभूत हो फंसने की गुंजाइश भी है। यह ऋतुओं के शाश्वत चक्र का मामला है।

‘क्लोज’ में सौंदर्य प्रत्क्ष तो दिखता है, अमूर्त भी है। उनकी दोस्ती की मासूमियत और मस्ती, आंखों ही आंखों में एक-दूसरे को समझना, एक दूसरे को देखने, महसूस करने की दृष्टि और यह भी कि एक-दूसरे के लिए वे इतना मायने रखते हैं कि उन्हें कभी अहसास ही नहीं होता।

सौंदर्य बड़े होने की प्रक्रिया में है, अप्रत्याशित, परेशान करने वाली, भावनाओं से टकराने और कई बार तो गलत समझे जाने की हद को छूती हुई। यह सौंदर्य साहचर्य में भी उतना ही है, जितना अपनत्व में, निकटता और दूरियों में, बिना शर्त प्यार में और बेलगाम क्रोध में भी। यह मृत्यु के अंत में भी उतना ही है जितना जीवन की सच्चाई में। यह नुकसान, दु:ख, दर्द, आशा, उपचार और गतिशीलता में भी है। धोंट के सिनेमाई संसार में सौंदर्य अनिवार्य रूप से हर चीज में व्याप्त है, यहां तक कि सबसे अप्रिय में भी।

उनकी पहली फिल्म ‘गर्ल’ कान्स फिल्म फेस्टिवल 2018 में कैमरा डी’ ओर जीत चुकी है। यह एक ट्रांसगर्ल की बैलेरीना बनने की आकांक्षाओं की कहानी है। जिस ‘पुरुष जिस्म’ के साथ वह पैदा हुई, उसी के साथ अपने सपने पूरे करने की चाहत रखती है और तमाम चुनौतियोंका सामना करती है।

धोंट की ‘क्लोज’ भी इसी लीक पर चलती है। यहां भी एक खास किस्म की तरलता, स्वभाव और चतुराई के साथ लिंग, पहचान और कामुकता के मुद्दे हैं। इस साल के कान्स में इसने ग्रैंड प्री भी जीता। हालांकि यहां टकराव थोड़ा अलग किस्म के हैं। मसलन, मैत्री भावना में बदलाव के बारे में, एक गहरे दोस्त के साथ आपके संबंधों के बारे में जो आपकी निर्मित, आपके विकासक्रम पर गहरा असर डालते हैं। एक स्तर पर ‘क्लोज’ मृत्यु और इसके साथ तालमेल के प्रथम अनुभव, पहले अहसास के बारे में है। यह उन सारे अवयवों की बात करती है जो जीवन के लिए जरूरी हैं।

क्लोज, उस अर्थ में, उसी अनुभव संसार में ठीक उसी तरह ले जाती है, जहां क्रिस्टाफ किस्लोवस्की के ‘थ्री कलर्स ब्लू’ की प्रायश्चित की यात्रा और इससे भी ज्यादा हमारी अपनी उमेश कुलकर्णी की मराठी फिल्म ‘विहिर’ हमें पहुंचाते हैं।

हालांकि एक इंसान की मृत्यु से ज्यादा यह एक दोस्ती के आगे बढ़ने की पड़ताल के बारे में है। दूरी, विभाजन, टूटना, बिखरना और विश्वासघात। यह ठीक ही था कि पुरस्कार जीतने के बाद मीडिया से बात करते हुए धोंट ने इसे ‘वक्त में गुम हो गई दोस्ती’ के नाम समर्पित कर दिया। एक इंटरव्यू में उन्होंने ने कहा- ‘यह उन दोस्तों के प्रति श्रद्धांजलि जैसी है जिनके साथ मेरा संपर्क इसलिए टूट चुका था क्योंकि कि मैंने उनसे दूरी बना ली थी, और मुझे लगा, मानो मैंने उन्हें धोखा दिया हो।’

‘क्लोज’ बताती है कि किशोरावस्था की सोच के साथ किसी युवा की बॉनर्जिंग, उसकी खुशियां, उसकी अंतरंगता किस तरह नई जन्म लेने वाली इच्छाओं के वशीभूत उत्पन्न होने वाले भ्रम से अनियंत्रित हो जाते हैं और किसी नई दिशा में चल पड़ते हैं। यह मर्दानगी की उम्मीदों के बीच सूचनाओं की विलक्षणता की बात करती है।

क्लोज खुद धोंट के बारे में भी है। वह अपनी फिल्म के लियो और रेमी- दोनों हैं। वह अक्सर पहचान और लिंग के मुद्ददों, अंतरंगता के सवाल पर फिल्म बनाने की अपनी इच्छा व्यक्त करते रहे हैं। वह उन सवालों से टकराना चाहते हैं जो एक बच्चे और किशोर के रूप में उस धोंट को परेशान करते रहे हैं। अब यह जुनून ही तो है कि कोई भीड़ आपको किस तरह लेती है, किस तरह देखती है। आप उससे जुड़ने, उसका हिस्सा बन जाने की चाहत चाहत पाले हुए हैं। और इस प्रक्रिया में अक्सर आप जो हैं, उससे या उसके एक हिस्से को जानबूझकर नकारते रहते हैं।

धोंट के एक साक्षात्कार में स्कूल के दिनों की उनकी पीड़ा का बयान कुछ इस तरह है- “लड़के एक तरह से व्यवहार करते थे, लड़कियां बिलकुल अलग। और मुझे हमेशा यही लगता रहा कि मैं इनमें से किसी भी समूह में नहीं हूं। मैं अपनी दोस्ती को लेकर घबराने लगा, खासकर लड़कों के साथ क्योंकि कि मैं स्त्रैण था और इसके लिए मुझे परेशान किया जाता था। सब चिढ़ाते थे। किसी अन्य लड़के के साथ घनिष्टता ही औरों की नजर में मेरी यौन शिनाख्त की पुष्टी का आधार होती थी। यह सब अजीब लगता था।” उन अर्थथों में यह अपने गहरे स्वाद का दावा करने के प्रयास के बारे में है।

फिल्म की पूरी कास्ट, विशेष रूप से एमिली डेक्वेनेथे ने अद्भुत काम किया है। खासतौर से अपने बेटे के शोक को पीछे रखकर करीबी दोस्त के दुःख में शामिल होने, उसे उसी शिद्दत से जीने के लमहे बहुत गहरा असर डालते हैं। और फिर दो अजूबे लड़के डैमब्राइन और डी वेले हैं जो अलगअलग आचरण करते हुए व्यक्तिगत रूप से तो प्रभावी हैं ही, ऐसा असर छोड़ते हैं जैसे उनका हर आचरण परस्पर बिंधा हुआ हो। क्षणिक भावनाएं हों, या भावनाओं की दरार- किसी दिग्गज अभिनेता की तरह वे इनकी बारीकियों और गहराई के साथ व्यक्त करते हैं।

‘क्लोज’ कलात्मक रूप से महत्वाकांक्षी है। किसी सिनेमाई सिम्फनी की तरह, पूरे लय और ताल के साथ एकदम संतुलित तालमेल वाले संगीत का एक अद्भुत अंश जो कहीं से सुना जाए, प्रभावित करता है। थोपा हुआ तो बिलकुल नहीं लगता। हम वर्ष के मध्य में हैं और भारत के लिए यह आधिकारिक तौर पर गर्व का महीना है। सौभाग्य से क्लोज मेरे लिए इस वर्ष की अब तक की सबसे पसंदीदा फिल्म है। आपको भी इसके अपने आसपास के किसी सिनेमाघर में दिखाए जाने की खोज-खबर लेते रहना चाहिए और मौका मिलते ही जरूर देखना चाहिए।

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