समीक्षा: देशभक्ति से भरी औसत फिल्म है ‘परमाणु’

90 के दशक में कुछ वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और सेना अधिकारियों का जरूर ये जुनून होगा कि भारत एक परमाणु शक्ति बने। लेकिन इस जुनून की वजह कोई चटकीला देशभक्ति का जज्बा नहीं, बल्कि कुछ कर दिखाने का जज्बा होगा और यहीं ‘परमाणु’ में निराश करती है।

फोटो: सोशल मीडिया 
फोटो: सोशल मीडिया
user

प्रगति सक्सेना

भारत में भी असल घटनाओं पर फिल्म बनाने का चलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। इनमें से कुछ जैसे ‘मांझी’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘तलवार’, ‘नो वन किल्ड जेसिका’ असल घटनाओं से परे जाकर अच्छी फिल्मों की मिसाल बन गयीं। इनके अलावा बहुत सी फिल्में जैसे ‘मैं और चार्ल्स’ ‘अजहर’, ‘बॉम्बे वेलवेट’ ‘रहस्य’ न बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन कर सकीं और न ही अच्छी फिल्मों में अपनी पहचान बना पायी।

यह एक विडंबना है कि लोक कथाओं में प्रचलित किरदार ‘पद्मावत’ पर बनी फिल्म पर इतना हंगामा हुआ, जबकि अच्छे विषयों और वास्तविक घटनाओं पर बनी बहुत सी फिल्मों पर चर्चा ही नहीं हुयी। फिल्म ‘राजी’ 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध के दौरान घटी असल कहानी पर आधारित होने का दावा करती है। उसके बाद अब फिल्म ‘परमाणु’ रिलीज हुई है जो उन घटनाओं पर आधारित होने का दावा करती है, जिनकी वजह से 1998 में पोखरण में भारत का परमाणु परीक्षण हुआ था।

फिल्म ‘राजी’ में देशभक्ति को केंद्र न बनाते हुए बहुत संवेदनशीलता के साथ इंसानी रिश्तों पर ज्यादा ध्यान दिया गया था। फिल्म ‘परमाणु’ में मानवीय रिश्तों को कोई तवज्जो नहीं दी गयी है, बल्कि देशभक्ति और उस टीम की काबिलियत और दृढ निश्चय पर फोकस किया गया है, जिसके कारण भारत का परमाणु परीक्षण अंतर्राष्ट्रीय दबाब और व्यवस्था की खामियों के बावजूद सफल हो सका।

अभिनेता जॉन अब्राहम एक औसत अभिनेता हैं, लेकिन बतौर प्रोड्यूसर उन्होंने कुछ अच्छी फिल्में की हैं। ‘विकी डोनर’ एक जटिल कथानक पर संवेदनशील फिल्म थी, तो फिल्म ‘मद्रास कैफे’ का रिसर्च और निर्देशन शानदार था। फिल्म ‘परमाणु’ में भी अच्छी रिसर्च की झलक दिखती है, लेकिन पूरी फिल्म पर एक आक्रामक देशभक्ति का मुलम्मा चढ़ा हुआ है, जो गैर-जरूरी लगता है।

90 के दशक में कुछ वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और सेना अधिकारियों का जरूर ये जूनून रहा होगा कि भारत एक परमाणु शक्ति बने। लेकिन इस जूनून की वजह कोई चटकीला देशभक्ति का जज्बा नहीं बल्कि अपने बूते पर कुछ कर दिखाने की भावना रही होगी और यहीं यह फिल्म निराश करती है। पता नहीं यह स्वीकार करना हमारे फिल्म वालों के लिए मुश्किल क्यों है कि देश की सेवा के लिए जरूरी नहीं है आप अपना देश प्रेम जताते चलें। आज भी हमारे समाज में ऐसे कई लोग हैं जो देश सेवा कर रहे हैं, देशप्रेम की खातिर नहीं बल्कि उन लोगों की खातिर जो उनके आसपास हैं, जरूरतमंद हैं।

फिल्म निर्देशक उस आक्रामक देशप्रेम की भावना से बहुत प्रभावित हो गए जो आजकल बहुत फैशन में है। फिल्म ‘परमाणु’ एक अच्छी फिल्म हो सकती थी अगर फिल्म का फोकस देशभक्ति की बजाय उस टीम के लोगों के जुनून पर होता, जिन्होंने तमाम दिक्कतों के बावजूद इसे सफलतापूर्वक अंजाम दिया। ये देशभक्ति और भी निराश करती है जब एक दृश्य में अहिंसा का मजाक बनाया जाता है (इस दृश्य में नायक का पीछा एक आईएसआई का जासूस कर रहा है और वे स्कूल के क्लॉसरूम में घुस जाते हैं, जहां शिक्षक कह रहा है -‘अहिंसा परमोधर्म’)।

हालांकि फिल्म का अंतिम सीक्वेंस प्रभावित करता है, जब भारतीय टीम अपना परीक्षण कुछ देर के लिए रोक देती है क्योंकि हवा का रुख पाकिस्तान की तरफ है, ताकि परीक्षण के दौरान किसी कमी के कारण अगर रेडिएशन फैले तो वह पाकिस्तान को प्रभावित न कर पाए।

अभिनेत्री डायना पेंटी की मौजूदगी फिल्म में बेजरूरी लगती है। फिल्म के अन्य अभिनेता औसत ही हैं क्योंकि कुछ खास करने को है ही नहीं। फिल्म का प्लॉट ही अपने आप में काफी आकर्षक है। फिल्म के निर्देशक ‘तेरे बिन लादेन’ वाले अभिषेक शर्मा हैं। अभिषेक हालांकि परदे पर सभी घटनाओं की टाइम लाइन बहुत मुस्तैदी से दिखाते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि तीन साल के अरसे के बाद नायक का बेटा बड़ा हो गया होगा।

फिल्म ‘परमाणु’ में वो पैनापन और निर्देशन की चुस्ती नहीं है जो फिल्म ‘मद्रास कैफे’ में दिखाई दी थी। अमेरिका और पाकिस्तान के लगभग हास्यास्पद जासूस फिल्म को और भी सतही बना देते हैं। लेकिन हां, अगर आप सामान्य कमर्शियल हिंदी फिल्में देख-देख कर उकता गए हैं तो आपको ये फिल्म दिलचस्प लग सकती है। वरना, फिल्म ‘परमाणु’ एक औसत फिल्म ही है।

Published: 25 May 2018, 10:32 PM
लोकप्रिय