भारतीय फिल्म बिरादरी के लिए असाधारण और चेतावनी से भरी फिल्म ट्रम्बो, बॉलीवुड के लिए एक सीख

फिल्म ‘ट्रम्बो’ शायद ज्यादातर लोगों की पसंदीदा फिल्मों की सूची में नहीं हो सकती है। सन 2015 की यह फिल्म हॉलीवुड के पटकथा लेखक, श्रमिकों के अधिकारों के लंबे समय तक चैंपियन रहे और यूएसए की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य डाल्टन ट्रम्बो के जीवन के सबसे उथल-पुथल भरे दौर पर आधारित है।

फोटो: सोशल मीडिया
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नम्रता जोशी

फिल्म ‘ट्रम्बो’ शायद ज्यादातर लोगों की पसंदीदा फिल्मों की सूची में नहीं हो सकती है। सन 2015 की यह फिल्म हॉलीवुड के पटकथा लेखक, श्रमिकों के अधिकारों के लंबे समय तक चैंपियन रहे और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य डाल्टन ट्रम्बो के जीवन के सबसे उथल-पुथल भरे दौर पर आधारित है। यह फिल्म भारतीय फिल्म बिरादरी के लिए असाधारण भी है और चेतावनी से भरी हुई भी है। यह बॉलीवुड को उस वक्त आईना दिखाती है जब बॉलीवुड अपने इतिहास में सबसे खराब दौर से गुजर रहा है। फिल्म के बिल्कुल अंत में जब ट्रम्बो (ब्रायन क्रान्स्टोन ने यह किरदार निभाया) राइटर्स गिल्ड ऑफ अमेरिका लॉरेल अवार्ड प्राप्त कर रहे होते हैं, तो वह 1940 के दशक के अंतिम दौर के सबसे स्याह और डरावने वक्त को याद करते हुए कहते हैं कि उस समय कम्युनिस्ट विचार के प्रति झुकाव के चलते उनके-जैसे कलाकारों की धर-पकड़ शुरू हो गई थी। उस वक्त ज्यादातर साथी या तो चुप रहते थे या फिर छींटाकशी करते थे और धोखा भी देते थे। हाउस अन-अमेरिकन एक्टिविटिज कमेटी के सामने गवाही देने से इनकार करने पर ट्रम्बो सहित हॉलीवुड के दस लोगों को एक वर्ष की सजा हुई थी। लेकिन परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई। जिन्हें काली सूची में डाल दिया गया था, जेल से बाहर आने के बाद भी उन्हें गलत तरीके से निशाना बनाया जाता रहा। उन्हें किसी भी प्रकार का काम नहीं दिया गया। कई लोगों को दिवालियापन, बर्बादी और यहां तक कि मौत का भी सामना करना पड़ा।

ट्रम्बो अपने भाषण में अतीत की ओर गुस्से से नहीं देखते। वह उन घिनौनी कहानियों में किसी नायक और खलनायक की तलाश से साफ इनकार करते हैं बल्कि वह तबके ध्वीकृत हॉलीवुड रु में दुखद किंतु एक विशिष्ट एकजुटता देखते हैं। वह कहते हैं, “हम सभी पीड़ित थे क्योंकि हम जो नहीं करना या कहना चाहते थे, हम सब वही करने के लिए बाध्य थे। हमें वे जख्म मिले या दिए गए जिन्हें असल में हम किसी और के साथ बांटना नहीं चाहते थे।”

गॉसिप कॉलम्निस्ट हेडा हूपर (यह किरदार हेलेन मिरेन ने निभाया) ट्रम्बो और अन्य लोगों को एक “खतरनाक अतिवादी”, “पंचीकृत कम्युनिस्ट”, “गद्दार”, आदि के संबोधनों से संबोधित करती है और कहती है कि इनको “दुश्मनों के रूप में पहचाने जाने की आवश्यकता” है।


फिल्मकार सैम वुड, मोशन पिक्चर अलायंस, कलाकार रोनाल्ड रेगन और एडवर्ड जी रॉबिन्सन ने तो और भी धोखा दिया। उन्होंने शुरुआत में कानूनी बचाव के लिए फंड इकट्ठा करने के वास्तेविन्सेंट वैन गॉग की पेंटिंग को बेच दिया लेकिन बाद में लोगों को उनके ही हाल पर छोड़ दिया। लेकिन लुसिले बॉलजैसी दुर्लभ कलाकार भी थीं जो समर्थन में खुलकर सामने आईं और जिन्होंने बोलने एवं सुने जाने के मौलिक अधिकार की बात रखी। वह कहती हैं, सभी नागरिक स्वतंत्रताएं एक साथ ही चलती हैं। अगर इनमें से एक भी अलग हो जाए, तो अन्य कमजोर पड़ जाते हैं।

इस फिल्म में हॉलीवुड में मिलीभगत और दोहरेपन का दिखाया गया चित्रण बीते कुछ वर्षों में बॉलीवुड के भीतर उभरी गहरी दरारों को बराबर में खड़ा कर देता है। और खासकर सुपरस्टार शाह रुख खान के बेटे आर्यन खान की तथाकथित ड्रग के मामले में की गई गिरफ्तारी को लेकर जो घोर सन्नाटा छाया हुआ है, वह समय के साथ ऐसे लग रहा है जैसे किसी खराब फिल्मी पटकथा के मुकाबले में यह और अधिक खराब मोड़ लेने वाली और कई छिद्रों से भरी पटकथा है। सारा दारोमदार फिर से उन बहादुर युवाओं पर आ जाता है जो उस डगर पर चलने को तैयार हैं जहां उनके वरिष्ठों ने कदम रखने से भी साफ इनकार कर दिया हो। लेखक, गीतकार और कवि हुसैन हैदरी के शब्द हैं, “कबीले में जब ज्यादातर बुजदिल और खुद परस्त हों, तो सरदार के घायल होने पर खामोशी का तमाशा ही होता है, यलगार नहीं।” लेखक, गीतकार और कवि पुनीत शर्मा ने ट्वीट किया, “जश्न में तो अजनबी भी शामिल होना चाहते हैं। शोक में जो शामिल न हो, वे अपने नहीं।” एक स्तर पर यह कल्पना करना निर्मम होगा कि लोगों को अपने दोस्तों या प्रॉक्सी परिवार के बच्चे की गिरफ्तारी से कोई फर्क नहीं पड़ता।

लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस चक्रव्यूह की रचना बॉलीवुड ने स्वयं की है। पिछले कुछ दशकों से अधिक समय से खुद को एक बड़े सामाजिक स्पेक्ट्रम के हिस्से के रूप में, देश के सामने आने वाले मुद्दों में एक हिस्सेदार के रूप में, महत्वपूर्ण चर्चाओं और विमर्शों में एक भागीदार के रूप में देखने की इस उद्योग की अक्षमता में ही इस चक्रव्यूह की जड़ें निहित हैं। बॉलीवुड ने स्वयं को एक मनोरंजन प्रदानकर्ता की सीमित भूमिका में जान-बूझकर कैद कर लिया है और वह एक मुनाफा कमाने वाले व्यवसाय से अधिक होने की इच्छा भी नहीं रखता। इसलिए सत्ता को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जाने की आवश्यकता पड़ जाती है। लेकिन इस दौड़ में शायद ही उसे इस बात का एहसास हो पाता है कि संरक्षणवाद और वसूली अंततः एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। और स्वयं को सुरक्षा देने के इस मार्गमें शायद वह अपने आपको और भी अधिक कमजोर बना रहा है।


इस सारे गड़बड़झाले में चापलूस सुपर स्टार और विभिन्न नख-दंत विहीन संगठन सहारे के बजाय कहीं बड़ेबोझ बन गए हैं। जिस नैतिकवादी, पाखंडी मध्य वर्ग के दर्शकों को बॉलीवुड ने हमेशा से ही संरक्षण दिया, वह पिछले एक वर्ष से अपनी ओर फेंके गए हर एक गंदगी का दृश्यरतिक उपभोक्ता होने के बावजूद बदनाम करने के लिए सबसे पहले आगे आया। ठीक मीडिया की भांति ही हिन्दी सिनेमा भी पहियों में फंसे कीचड़ से अधिक नहीं उभर पाया है। मीडिया और सिनेमा एक ही रणनीति के दो पहलू हैं: संदेशवाहक को नियंत्रित करना और उन्हें प्रोपेगेंडावादी बनाना, फिर चाहे वे समाचारों के वाहक हों या फिर कल्पानाओं के। जैसा कि ट्रम्बो स्वयं पूरी दृढ़ता के साथ कहते हैं, “अब तक की रचनात्मकताओं में फिल्में ही सबसे शक्तिशाली प्रभावपूर्ण हैं।”

‘ट्रम्बो’ फिल्म में प्रदर्शन के एक दृश्य में एक तख्ती पर लिखा होता है कि साहस संक्रामक होता है। बॉलीवुड को बहादुर बने एक लंबा अरसा गुजर चुका है। समय आ गया है कि चुप्पी की साजिशों को त्याग दिया जाए और अपने लिए तय किए गए सभी नैतिक मूल्यों को गिरा दिया जाए। सच है कि यह एक लंबी लड़ाई होगी जिसमें लाभ से कहीं ज्यादा नुकसान और तकलीफ मिलेगी। लेकिन इतिहास में अपनी एक सही जगह बनाने के लिए यह पूरी तरह से जायज है। ट्रम्बो को लेखन के लिए सबसे अधिक पैसा मिलता था लेकिन उन्होंने उसकी परवाह नहीं की। इसके बजाय वह पूरे साहस के साथ सामने आए और बहुत हिम्मत के साथ “मत के अभियोग” और “विचारों के अपराधीकरण” के खिलाफ बोले। उन्होंने चेतावनी दी थी कि “यह अमेरिकी कन्सन्ट्रेशन कैंप की शुरुआत है।”

और ऐसा नहीं है कि बॉलीवुड में मौजूद दिग्गजों के लिए यह संभव न हो। ट्रम्बो कहते हैं, “रेडिकल संभवतः यीशू की पवित्रता के साथ युद्ध कर सकते हैं लेकिन अमीर आदमी शैतानी चालाकी से जीत जाता है।” उनके दृढ़ निश्चय ने उन्हें आगे बढ़ने में हमेशा ही उनका साथ दिया। उन्होंने बहुत चतुराई से उस प्रणाली को ही समाप्त कर दिया जो उन्हें नष्ट करने निकली थी।


किर्क डगलस-जैसे अभिनेताओं ने ट्रम्बो का समर्थन किया और उनके काली सूची में नाम डाले जाने की भी परवाह नहीं की। उन्होंने ट्रम्बो से ‘स्पार्टक्युस’ फिल्म की पटकथा लिखाई और उन्हें उसका श्रेय भी दिया। फिल्मकार ओटो प्रेमिंगर ने उन्हें लियोन यूरिस की पुस्तक ‘एक्सोडस’ को रूपांतरित करने में मदद की और उन्हें ‘घोस्ट राइटर’ से बाहर निकाल लाए। डगलस ने बाद में एक साक्षात्कार में कहा, “मुझे धमकाया गया था कि अगर मैं ‘स्पार्टक्युस’ के लिए काली सूचीबद्ध एक लेखक– मेरे मित्र डाल्टन ट्रम्बो – के साथ काम करता हूं तो मुझे एक “साम्यवादी प्रेमी” के रूप में चिह्नित कर दिया जाएगा और मेरे कॅरियर का अंत हो जाएगा। ऐसा समय आता है जब व्यक्ति को अपने सिद्धांतों के लिए हर हाल में खड़ा होना ही पड़ता है।”

राइटर्स गिल्ड अवार्ड समारोह के बाद ट्रम्बो की पत्नी क्लियो (यह भूमिका डायने लेन ने निभाई थी) ने चैन की सांस लेते हुए कहा, “अब सब ठीक हो गया है न? और हम सफल हुए।” ट्रम्बो ने अंततः पूरे अधिकार के साथ ‘रोमन हॉलीडे’ के लिए ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त किया जिसे उनकी पत्नी क्लियो ने उनके मरणोपरांत 1993 में उनके स्थान ग्रहण किया।

ट्रम्बो ने एक साक्षात्कार में बड़े गौरव के साथ कहा था, “अब हमारे पास हमारे नाम वापस आ गए हैं।” और यही हमारे सारे संघर्ष को सही ठहराता है। बॉलीवुड को भी जरूरत है कि वह अपनी वह एक चीज वापस प्राप्त करे जिसे उसने बहुत पहले खो दिया है- व्यक्तिगत और सामहिू क रूप से अपनी आवाज।

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