गुजरात चुनावः तटीय गुजरात में बीजेपी की हालत खराब, मछुआरों में सरकार के खिलाफ भारी नाराजगी

गुजरात की वास्तविकता काल्पनिक तौर पर गढ़े गए ‘गुजरात मॉडल’ और ‘अच्छे दिन’ का शिकार बनी रही। पिछले 22 सालों में गुजरात के कथित ‘विकास मॉडल’ में गरीबों को कभी शामिल ही नहीं किया गया।

फोटोः सोशल मीडिया
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गौहर रजा

मैंने व्यापक तौर पर गुजरात का दौरा किया और इस बात का गवाह बना कि वर्षों पुरानी कहावत, ‘कोस, कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’ कितना सच है। इतिहासकार हमें बताते हैं कि कोस दूरी नापने का प्राचीन तरीका है। भारतीय उपमहाद्वीप में हाल तक यह व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता था। एक कोस लगभग 3 किलोमीटर के बराबर होता है। इस कहावत का अर्थ यह हुआ कि पानी की गुणवत्ता हर 3 किलोमीटर पर बदलती है और बोली हर 12 किलोमीटर पर बदल जाती है। मेरे विचार में यह बात हर संस्कृति पर लागू होती है। भारत में अगर आप सड़क मार्ग से चाय पीने और स्थानीय लोगों से बातचीत करने के लिए जगह-जगह सड़क किनारे मौजूद ढाबों पर रुकते हुए सफर करें तो आपको लोगों की बोली और भोजन के स्वाद में क्रमिक परिवर्तन का अनुभव होगा।

हालांकि, भौगोलिक दूरी पानी के स्वाद और बोली में परिवर्तन का इकलौता निर्धारक नहीं होता है। अगर आप जातीय, धार्मिक और आर्थिक सीमाओं से होते हुए गुजरें तो ये बदलाव एक शहर, कस्बे या गांव के भीतर भी अधिक स्पष्ट नजर आते हैं। और ये सभी परिवर्तन आपकी अनुभूतियों को प्रभावित करते हैं। ये बात गुजरात के लिए उतनी ही सच है जितना देश के किसी अन्य राज्य के बारे में।

पिछले 15 सालों में व्यापारिक दौरे के तहत अल्प समय के लिए गुजरात का दौरा करने वाले लोगों में से ज्यादातर सच्चाई के इस पक्ष को नहीं देखना चाहते थे। उनकी रुचि गरीबी, गंदगी, बदहाल घरों, टूटी सड़कों, बहते नालों, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, बढ़ते कुपोषण, स्कूल ऑर कॉलेज ड्रॉप आउट की उच्च दर, व्यापक बेरोजगारी और स्वास्थ्य व्यवस्था की बिखरी संरचना में नहीं थी। वे सिर्फ नदी तट, मॉल, चिकने राजमार्ग, एफडीआई, मंदिरों और अपने बेहद व्यक्तिगत गुरुओं के साथ आध्यात्मिक चर्चाओं में रुचि रखते थे। उन्होंने अंबानियों, अदानियों, टाटा नैनो की सफलता की कहानियों सुनी हैं, यहां तक कि खाखड़ा और फाफड़ा बनाने वाली एक महिला को भी एक देवी में बदल दिया गया था। उन्होंने एक जादूगर और हिंदी फिल्म के एक नायक का सपना देखा था जो बड़े विश्वास के साथ भावनात्मक संवाद बोल सकता था। पूरे राजनीतिक परिदृश्य में सिर्फ एक व्यक्ति इस कसौटी पर खरा उतरा, वह चीख सकता था, वह रो सकता था, वह घनघोर सांप्रदायिक, जातिवादी और घृणित हो सकता था, वह दृढ़ विश्वास के साथ झूठ बोल सकता था, वह विकास के सपने बेच सकता था और जब परिस्थितियों की मांग हो तो वह गली के एक गुंडे जितना अशिष्ट भी हो सकता था।

जो लोग सत्ता के शीर्ष पर एक सांप्रदायिक, हिंसक और गुस्सैल व्यक्ति को चाहते थे, वे अब उसे समर्थन देने के लिए पछतावे के बहाने तलाश रहे हैं। लंबे समय से उनके प्यादे, जिसकी विशेषज्ञता नकली मुठभेड़ और भय का माहौल बनाने में रही है, के नेतृत्व वाली माफिया टीम को उनकी ताकत के तौर पर देखा जाता था। गुजरात में अदालत द्वारा 30 से ज्यादा पुलिस अधिकारियों को जेल भेजा जाना उच्च सांप्रदायिक मध्यम वर्ग के लिए कोई चिंता की बात नहीं थी। बहरहाल, माफिया अपने काम में दक्षता और त्वरित परिणाम के लिए भी जाना जाता था। रातोंरात अमीर बनने की चाहत रखने वाले मध्य वर्ग ने स्वेच्छा से अपने बैंक खाते में 15 लाख रुपये के जमा होने का बेतुका सपना देखा। इसमें कोई शक नहीं कि यह एक बड़ी राशि थी और अपने आसपास की वास्तविकता की तुलना में सपने की दुनिया में रहना कहीं ज्यादा बेहतर था। यह सपना गरीब से गरीब लोगों को भी बेचा गया था।

अपने अस्तित्व के 90 सालों में अफवाह का धंधा करने और झूठ फैलाने के तरीके इजाद करने में दक्ष हो चुका पूरा संघ परिवार 2002 के बाद अपने सर्वश्रेष्ठ स्तर पर था। कॉर्पोरेट नियंत्रित कठपुतली मीडिया (अब गोदी-मीडिया के नाम से प्रचलित) पिछले 15 सालों से वही दिखाता रहा है जिसको दिखाने के लिए उसके मालिकों ने उसे पैसे दिए। और इस तरह से गुजरात की वास्तविकता काल्पनिक तौर पर गढ़े गए 'गुजरात मॉडल' और ‘अच्छे दिन' का शिकार बनी रही। गुजरात में आम लोगों के लिए कभी अच्छे दिन नहीं रहे और पिछले 22 सालों में ‘गुजरात के विकास मॉडल’ में गरीबों को कभी शामिल ही नहीं किया गया।

‘लोकशाही बचाओ अभियान’ के सदस्यों ने जब गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों और विधानसभाओं का दौरा करने का फैसला किया तो ये तय हुआ कि जहां तक संभव हो हम लोग राजनीतिक और सामुदायिक नेताओं से मुलाकात करने से बचेंगे। हम छोटे समूहों में सीधे लोगों से मिलेंगे, पर्चे बाटेंगे और फासीवाद के हमलों और उसके खतरों पर चर्चा करेंगे। दौरे के दूसरे चरण में गुजरात के पश्चिम तटीय जिलों में जाने के लिए हम में से तीन लोगों ने समूह बनाकर कच्छ तक जाने का फैसला किया। उवेस भाई अपनी नई कार में हमें ले जाने के लिए तैयार हो गए।

प्राकृतिक कारणों से गुजरात के सभी तटीय जिलों की बड़ी आबादी पारंपरिक रूप से मछली का व्यापार करती है। वे 'मच्छीमार समुदाय' के रूप में जाने जाते हैं। 2002 के नरसंहार में ये जिले बेअसर रहे थे। इस क्षेत्र के दक्षिणी भाग में, (सोमनाथ, मंगरौल, वेरावल और पोरबंदर जैसे जिलों में) हिंदू और मुसलमान दोनों मछुआरे का काम करते हैं। लेकिन जैसे आप उत्तर की तरफ बढ़ते हैं और कच्छ में प्रवेश करते हैं, इस कारोबार में शामिल हिंदुओं का प्रतिशत धीरे-धीरे शून्य होता जाता है। दोस्तों ने हमें जानकारी दी थी कि पिछले चुनावों में कच्छ के मुसलमान मछुआरा समुदाय ने बीजेपी उम्मीदवारों को वोट दिया था। मैं विशेष रूप से इस समुदाय के सदस्यों से बात करना चाहता था और जानना चाहता था कि उनका वर्तमान राजनीतिक मूड क्या है।

सफर के दौरान सड़क किनारे चाय के ढाबों पर रुकने के दौरान लोगों में जीएसटी और नोटबंदी के खिलाफ गुस्सा हल्के और कभी कड़े शब्दों में बार-बार जाहिर हुआ। रास्ते में हम बड़ी संख्या में गुजरातियों से मिले और जानबूझकर उनसे राजनीतिक मुद्दों के बारे में बात की। बावजूद इसके कि मुझे गुजराती भाषा नहीं समझ में आती है, बोली में धीरे धीरे हो रहा परिवर्तन, मुहावरे के अनुसार हर '4 कोस' पर स्पष्ट था। पंजाबियों, यूपी वालों या बिहारियों के विपरीत, गुजराती लोग मृदुभाषी होते हैं और बातचीत के दौरान किसी भी असहमति से बचने का प्रयास करते हैं। जब हमने पूछा कि अगली सरकार कौन बनाएगा, तो वे इसका सीधा जवाब देने से बचते रहे। लेकिन जब हमने नोटबंदी या जीएसटी के प्रभाव के बारे में पूछा, तो गुस्से में फौरन दिया गया जवाब था, ‘धंधा चौपट थई गयो’ (धंधा चौपट हो गया)। पिछले चुनावों के विपरीत, जब हर गुजराती जिससे मैं मिला था, उसने यही कहा था कि बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिलेगा, इस बार एक भी आदमी ऐसा नहीं मिला, जिसने कहा हो कि वे सत्ता में वापस आ रहे हैं।

हमने मांडवी और मुंद्ड़ा में ज्यादातर वक्त मछुआरा समुदाय के बीच बिताया। वे सभी मुसलमान थे। हम छोटे समूहों में बैठकें कर रहे थे। यह स्पष्ट तौर पर दिख रहा था कि तथाकथित गुजरात मॉडल ने उनके इलाकों को नहीं छुआ है। गलियां गंदी पड़ी थीं, नाले बह रहे थे और वहां के रहने वाले अस्वस्थ नजर आ रहे थे। उनकी शिकायतें सरल लेकिन अंतहीन थीं- 'कई जगहों पर नाले जाम हैं लेकिन नगरपालिका के मजदूर यहां नहीं आते हैं', 'हमारे लड़कों का पहचान पत्र नहीं बनता जिससे वे मछली पकड़ने नहीं जा सकते', 'पिछले तीन सालों से हमारी फाइबरग्लास वाली नई नौकाओं का पंजीकरण नहीं हो रहा है, हमने इनमें भारी रकम निवेश किया है, लेकिन मछली पकड़ने के लिए उनका इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।’

मैंने उनसे पूछा, “लेकिन आप लोगों ने बीजेपी को वोट दिया था और वे 22 वर्षों से सरकार में हैं, क्या आपने इन मुद्दों को बीजेपी नेताओं के समक्ष उठाया है?” उनका जवाब आंखें खोलने वाला था, एक बातूनी युवा लड़के ने कहा, “हां, हम स्थानीय बीजेपी नेता के पास गए थे, उसने कहा कि हमने तुम्हारे वोट खरीदे थे, हमें जीताने के लिए तुम्हारे वोटों के पैसे तुम्हें मिल चुके हैं, अब तुम किस बात के लिए शिकायत कर रहे हो, क्यों हमे परेशान कर रहे हो।” लड़का गुस्से में था, उसने आगे कहा, “हमें सबक मिल गया, इस बार हम किसी से भी पैसे नहीं लेंगे, हम उन्हें सबक सिखाएंगे, इस बार सभी गुजराती उनके खिलाफ हैं, हम अकेले नहीं हैं।” फिर वह लड़का शांत हुआ और हमसे बोला, “कृप्या ईवीएम का कुछ कीजिये।” मुझे समझ नहीं आ रहा था कि उसकी बात का कैसे जवाब दूं।

कच्छ में लोगों का मिजाज वर्तमान सरकार के खिलाफ है। हमने 4 कोस से ज्यादा का सफर किया लेकिन लोगों का मिजाज नहीं बदला, भाषा गुजराती से कच्छी मे बदलने पर भी लोगों की भावनाएं नहीं बदलीं। राजनीतिक हवा की दिशा हर जगह 180 डिग्री पर घूम चुकी है। लेकिन मुझे आश्चर्य है कि क्या ईवीएम एक बार फिर भाजपा के पक्ष में वोट करेंगी? क्या ट्रिकस्टर फिर से भारतीय लोकतंत्र को नष्ट करने में सक्षम होगा? क्या एक बार फिर मक्कारी भारतीय लोकतंत्र को विकृत करने में कामयाब होगी?

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