लॉकडाउन डायरी: सिर्फ भाषण तक ही सीमित रह गया मदद का वादा! आखिर में 'गरीब' को बचाने गरीब ही आ रहा आगे

कोरोना संकट के बीच जारी लॉकडाउन का असर हर तबके पर हुआ है। कइयों को अपनी नौकरी जाने का डर सता रहा है तो कई लोग अपनी बचत के पैसों को जरूरतमंदों की मदद में लगा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर नेताओं द्वारा पलायन कर रहे मजदूरों की मदद महज भाषण तक ही सीमित नजर आ रही है।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

अपने 'सपने' की बचत से नन्हें मृगांक ने की मदद

शहरों-महानगरों से पांव-पैदल अपने गांव लौट रहे लाखों श्रमिकों के कष्टों को कम करने का प्रयास करने वाली उम्मीद की कहानियों में से एक नन्हे बच्चे मृगांक की भी है। पश्चिम बंगाल के नॉर्थ 24-परगना के हाबरा शहर में रहने वाले आठ वर्ष के बच्चे मृगांक ने एक दिन अपने घर की बालकॉनी से देखा कि सड़क पर लोगों की लंबी कतार लगी है और कुछ लोग उन्हें खाना दे रहे हैं। उसे कुछ समझ नहीं आया और उसने अपने पिता से इस बारे में पूछा। पिता ने उसे बताया कि लॉकडाउन के कारण इन लोगों की दशा बहुत खराब हो चुकी है और इनके पास एक वक्त खाने तक के लिए पैसे नहीं हैं।

मृगांक को यह बात छू गई। वह घर से निकला और सामुदायिक किचन चला रहे युवाओं को उसने अपना नीले रंग का कॉटन का बैग दे दिया। इस बैग में कुछ सिक्के और नोट थे। ये वे पैसे थे जिसे वह तीन साल से जमा कर रहा था ताकि वह हैरी पॉटर की किताबों का पूरा सेट खरीद सके। यह बचत पांच सौ रुपये की थी। देखने में यह रकम छोटी लग सकती है लेकिन तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले इस बच्चे की संवेदनशीलता का कोई मोल नहीं है। यह अप्रतिम है। प्रेसिडेंसी कॉलेज के वर्तमान और पूर्व छात्र-छात्राओं तथा कई संस्थाओं के प्रयास से चलाए जा रहे इस तरह के सामुदायिक किचन और नन्हे मृगांक की इंसानियत पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी का दावा करने वालों से कहीं ज्यादा है।

बहुत धन्यवाद, हम आएंगे अपने यहां का खाना लेकर

यह किस्सा दिल्ली के एक पॉश इलाके का है। यहां अपार्टमेन्ट बने हुए हैं। जनता कर्फ्यू से पहले यहां कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। काफी सारे मजदूर लगे हुए थे। अधबने घरों में उन्होंने अपना डेरा-डंडा बसा रखा था। लॉकडाउन की अचानक घोषणा हो गई, तो ये जाएं कहां? खाने-पीने के लिए अनाज-सब्जी का जुगाड़ करना भी मुश्किल। इलाके के कुछ फ्लैट में लोग रहने लगे हैं। शुक्र है कि उन्हें समझ में आया कि इन लोगों की मदद की जाए। तो, लोगों ने आपस में पैसे जुटाकर इन लोगों के खाने-पीने का इंतजाम कर दिया। करीब एक महीने तक ऐसा चलता रहा। लॉकडाउन 3 के दौरान एक दिन अचानक लोगों ने देखा कि ये लोग गायब हैं। आपस में चर्चा हुई कि कहीं किसी समय पुलिस वालों ने इन्हें यहां से भगा तो नहीं दिया। पुलिस वाले तो कुछ भी कर सकते हैं! लोग चिंतित हुए।

संयोगवश, इन लोगों के पास उनमें से एक-दो लोगों का नंबर था। उन्होंने उस पर कॉल किया। थोड़ी देर घंटी बजने के बाद उसने उठाया और कहा कि आप लोग चिंता न करें, हम लोग अपने गांव जा रहे हैं। यह कहने पर कि हम लोग तो इंतजाम कर ही रहे थे तो जाने की जरूरत ही क्या थी, तो उसने कहा- हम कामगार हैं, दान कितने दिन लेते? गांव में घर, परिवार, इज्जत है। उसने बताया कि कंस्ट्रक्शन कंपनी के लोगों ने कह दिया कि वे उनके बकाया चालीस हजार रुपये फिलहाल नहीं दे सकते और इस बारे में भी कोई भरोसा नहीं दे सकते कि दोबारा काम कब शुरू होगा। इसलिए वे लोग करीब 800 किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के अपने गांव की ओर निकल पड़े। उन्हें करीब छह घंटे तक पैदल चलना पड़ा, फिर सब्जी ढोने के काम में लगा एक ट्रक वाला उन्हें आगे ले गया और बाद में, उन्हें बस मिली जिससे वे मध्यप्रदेश में मुरैना के पास अपने-अपने गांव पहुंचगए। उन लोगों ने कहाः अगली बार जब हम आएंगे, तो सभी लोगों के लिए अपने घर का बना खाना लेकर आएंगे। ठीक है कि सामाजिक मदद के बहुतेरे किस्से देखने-सुनने को मिल रहे हैं, पर खुद्दारी के ऐसे उदाहरण भी आपको बहुतेरे मिलेंगे।

भुतहा गांवों में लौटने लगी रौनक

उत्तराखंड में तमाम ऐसे गांव हैं जिन्हें ‘भुतहा’ कहा जाने लगा है क्योंकि वहां से लोगों का पलायन हो चुका है। ऐसे भी गांवों की संख्या काफी अधिक है जहां केवल उम्रदराज लोग रह गए हैं। लेकिन कोरोना के इस संकट काल में इन भुतहा गांवों में से कई में चहल-पहल लौटने लगी है। लोग लौट रहे हैं, वहां रहने-जीने की कोशिश कर रहे हैं और दूसरों को भी ऐसा करने में मदद कर रहे हैं। उत्तराखंड में 1.65 लाख गांव हैं जिनमें से करीब 10 फीसदी, यानी 17.5 हजार गांव लगभग वीरान हैं। कोविड-19 के संक्रमण के भय से ठप काम-धंधे के बीच देशभर से प्रवासी अपने मूल निवास को लौट रहे हैं।

लेकिन उत्तराखंड लौटने वालों में मजदूरों की संख्या कम ही है। ज्यादातर लोग सेवा क्षेत्र से जुड़े हैं या फिर विभिन्न फैक्टरियों में काम करने वाले। पहली बार लॉकडाउन की घोषणा के बाद ही करीब दो लाख लोगों ने वापस अपने गांवों में लौटने की इच्छा जताई थी और धीरे-धीरे उन्हें वापस लाया जा रहा है। इनमें से तमाम लोग इन्हीं गांवों के हैं। जैसे-जैसे ये लोग लौट रहे हैं, इन गांवों में जिंदगी भी लौटने लगी है। पौड़ी गढ़वाल के संगरौला गांव में रहने वाले समाजसेवी त्रिभुवन उनियाल विभिन्न राज्यों से लौटकर आ रहे लोगों को राज्य में ही रहने को प्रेरित कर रहे हैं। उन्हें पता है कि यह एक विशेष स्थिति है और लोग मजबूरी में ही वापस आए हैं। लेकिन उनका आकलन है कि दस में से 2-3 लोग तो यहां रह ही जाएंगे और यह भी कोई बुरी स्थिति नहीं होगी। वैसे भी, राज्य की जीडीपी में सेवा उद्योग की अच्छी-खासी भागीदारी है और इससे जुड़े लोगों की यहां भी जरूरत है।

ढाबा मालिक बना मजदूरों का मददगार

बिहार में छपरा के मांझी में नेशनल हाईवे 19 पर बसंत सिंह का ढाबा है। उन्हें जब हाइवे से गुजर रहे मजदूरों की तकलीफ न देखी गई, तो उन्होंने सोचा कि खाना-कमाना तो जिंदगी भर है, अभी इन लोगों के लिए खाने आदि का मुफ्त इंतजाम किया जाए। बस, उन्होंने अपना कैश काउंटर बंद कर दिया और मजदूरों को बुला-बुलाकर खाना खिलाने लगे। इतना ही नहीं, वह कुछ सूखा खाना भी इन लोगों को देने लगे ताकि आगे के सफर में भी उन्हें आसानी रहे। उन्होंने यह काम इस तरह शुरू किया, तो आसपास के कई लोग भी इसमें जुट गए।

लोगों का कहना है कि इस रास्ते से गुजरने वाला कोई भी मजदूर भूखा नहीं जा सकता है। माना जाता है किइस भंडारे में प्रतिदिन करीब 500 लोग तो जरूर ही खाना खा रहे हैं। झारखंड के कयूम शेख और मदीना बीबी वैसे ही लोगों में हैं। इनके अनुसार, बसंत सिंह ने उन्हें अपने ढाबे पर बुलाकर खाना खिलाया। इससे न केवल उनकी भूख मिटी बल्कि काफी सुकून भी मिला क्योंकि कई दिन बाद इतना अच्छा और स्वादिष्ट खाना खाने को मिला। बसंत सिंह कहते हैं कि यह सब कर उन्हें बहुत संतोष मिल रहा है क्योंकि मानवता की सेवा से बड़ा कुछ भी नहीं होता। उन्होंने यह भी बताया कि शुरू में यह काम अकेले आरंभ किया था लेकिन अब अन्य ग्रामीण भी शारीरिक और आर्थिक रूप से मानवता की सेवा वाले इस काम में मदद कर रहे हैं।

एमएसएमई को और कर्ज ने कइयों की नौकरी को खतरे में डाला

सीके प्रीति (बैंक अधिकारी)

लॉकडाउन 4 से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी, तब ही मेरे पति ने कहा था कि सरकार कुछ बड़ा खेल करने जा रही है- दो-तीन रुक जाओ, समझ में आ जाएगा। वह बात सही ही निकली। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एमएसएमई को और कर्ज देने को कहा है। यह हम बैंक वालों की जान की आफत बनेगी। एमएसएमई के नाम पर ऐसे-ऐसे लोगों को पहले ही कर्ज दिया जा चुका है जिनसे वापसी की उम्मीद कम ही है या नहीं के बराबर है। पांच प्रतिशत भी वापसी हो जाए, तो समझिए, बहुत है। और लोन दिए कैसे जा रहे? न इन्फ्रास्ट्रक्चर है, न कोई योजना। बस, कुछ बड़े नेताओं या बैंक के कुछ अधिकारियों से ठीक ठाक जान-पहचान है, तो उसे लोन मिल जा रहा है। अफसर मौखिक निर्देश दे देते हैं कि इन्हें लोन सैंक्शन कर दो। रिकवरी के वक्तजान फंसेगी लोन डिसबर्सिंग अफसर की। वह क्या करे? अभी दिया गया टार्गेट तो पूरा हो रहा है लेकिन बाद में नौकरी उसकी ही जाएगी- वह भी इस आरोप के साथकिबिना सोचे-समझे अपने नाते-रिश्तेदारों-परिचितों को लाखों रुपये बांट दिए।

इन दिनों बैंक आइए, तो समझ में आएगा कि हम बैंक वाले किन दबावों में काम कर रहे। मेरा बैंक थोड़ा कस्बाई इलाके में है, तो कई तरह की दिक्कतें हैं। सरकार कह रही है कि सबके खाते में पांच सौ रुपये से लेकर दो-ढाई हजार रुपये तक डाल दिए गए हैं। दुख भी होता है लेकिन गुस्सा भी आता है कि लोग रोजाना अपना खाता चेक कराने आ जाते हैं कि पैसे आए या नहीं। अगर एक के खाते में कुछ पैसे आ गए हों, तो दूसरे कई लोग लड़ाई-झगड़ा करने तक को तैयार हो जाते हैं कि हमारे क्यों नहीं आए। वे यह तक आरोप लगाने लगते हैं कि पैसे आए तो जरूर होंगे, हम बैंक वाले खा गए या नहीं दे रहे। जरा सोचिए, मेरी क्या हालत होगी। मेरी बेटी के अभी छह महीने ही हुए हैं। घर का सारा कामकाज निबटाने के बाद उसे सुबह तैयार कर अपनी सासू मां को सौंप आती हूं। रोज सोचती हूं कि दिन में फुर्सत मिली, तो थोड़ी देर आकर बेटी को देख लूंगी। डेढ़ महीने में तो यह कभी संभव नहीं हो पाया।

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