पीएम के 20 लाख करोड़ का 70 फीसदी तो खर्च हो गया, लेकिन किसी के हाथ नहीं आई फूटी कौड़ी भी

20 लाख करोड़ के पैकेज का आधा तो पहले ही खर्च हो चुका था और उसका कोई भी अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ा। बुधवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुल मिलाकर 4.4 लाख करोड़ के ऐलान किए, लेकिन इसमें से बड़ा हिस्सा एमएसएमी यानी छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज देने के नाम पर चला गया।

फोटो: सोशल मीडिया
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राहुल पांडे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार शाम जब 20 लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा की तो कोरोना संकट के दौरान लॉकडाउन में रोजी-रोटी छिनने के बाद जो लोग सरकारी उपेक्षा से त्रस्त होकर पैदल ही अपने घरों को निकल पड़े हैं, उन्हें लगा होगा कि शायद उनकी जिंदगी बेहतर बनाने और उनकी परेशानियां दूर करने के कुछ उपाय सरकार सामने रखेगी। लेकिन इस पैकेज की डिटेल देने का पहला दिन इन लोगों के लिए उम्मीद की कोई किरन लेकर नहीं आया। साथ ही गैर संगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में सिर खुजा रहा है कि आखिर उसके क्या मिलेगा भी या नहीं।

20 लाख करोड़ के पैकेज का आधा तो पहले ही खर्च हो चुका था और उसका कोई भी अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ा। बुधवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुल मिलाकर 4.4 लाख करोड़ के ऐलान किए, लेकिन इसमें से बड़ा हिस्सा एमएसएमी यानी छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज देने के नाम पर चला गया। इस मद में करीब 3 लाख करोड़ रुपए के प्रावधान का ऐलान कर दिया गया। इसी तरह बिजली वितरण और उत्पादन कंपनियों के लिए 90,000 करोड़ रुपए का प्रावधान कर दिया गया, बाकी बचा 50,000 करोड़ उसे टीडीएस में 25 फीसदी की कमी और ईपीएफ आदि में दे दिया गया।

इस तरह कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के 20 लाख करोड़ का 70 फीसदी तो ठिकाने लग गया या खर्च करने का तरीका सामने रख दिया गया, लेकिन बुरी तरह प्रभावित हुए असंगठित क्षेत्र और ऐसे गरीबों के लिए तो कुछ है ही नहीं जो इस कोरोना संकट में अपनी आजीविका खो चुके हैं।

सवाल है कि अब जो पैसा बचा है उसे किस तरह खर्च किया जाएगा और इसमें से कितना पैसा सीधे लोगों तक पहुंच पाएगा। ध्यान रहे कि कोरोना संकट में 12 करोड़ से ज्यादा लोगों का रोजगार छिना है, इनमें से करीब 9 करोड़ लोग तो सीधे असंगठित क्षेत्र से हैं। करीब 40 करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्हें जिंदगी चलाने के लिए सरकार मदद की जररूत है। लेकिन सरकार ने अभी तक इन लोगों के लिए कुछ भी ऐलान नहीं किया है। उम्मीद करें कि इनका भी ध्यान रख पाएगी सरकार।

बुधवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जो भी ऐलान किए उसकी हेडलाइन एमएसएमई और बिजली कंपनियां हैं, लेकिन सवाल यहां यह है कि अगर मांग ही नहीं होगी तो फिर एमएसएमई उत्पादों को खरीदेगा कौन।

इसके अलावा वित्त मंत्री ने टीडीएस दरों में 25 फीसदी कटौती का ऐलान किया है, इससे सरकार पर किसी तरह का बोझ नहीं पड़ता यानी इस पर कोई पैसा खर्च नहीं होता, हां इससे यह जरूर होगा कि लोगों के हाथ में कुछ पैसा जरूर अतिरिक्त होगा जिसे वे खर्च करना चाहेंगे। लेकिन एक बाद ध्यान रखना होगी, वित्त वर्ष के अंत में आपको पूरा ही टैक्स चुकाना होगा, भले ही अभी कुछ कम टैक्स कटे।

वित्त मंत्री ने कहा कि एक बार सारी घोषणाएं होने दीजिए उसके बाद विस्तार से वह इस बारे में बात करेंगी की पैसा कहां से आएगा, कहां जाएगा। लेकिन फिलहाल जो घोषणाएं सरकार कर चुकी है उसके लिए पैसा कहां से मुहैया होगा, इसकी तस्वीर साफ नहीं है।

प्रेस कांफ्रेंस में निर्मला सीतारमण इस सवाल को तो टाल गईं कि अब तक कितना पैसा खर्च हो चुका है, लेकिन एक मोटे अनुमान के अनुसार करीब 8 लाख करोड़ पहले ही खर्च हो चुका है जिसमें 6 लाख करोड़ से ज्यादा आरबीआई द्वारा उठाए गए कदमों और उपायों का है। इसके अलावा पीएम गरीब कल्याण पैकेज के रूप में 1.70 लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान पहले ही सरकार कर चुकी है, जिसका जिक्र बार-बार निर्मला सीतारमण ने किया। उन्होंने गर्व के साथ बताया भी कि इसमें से 52,600 करोड़ 41 करोड़ लोगों तक पहुंचाया जा चुका है। यानी पूरे पैकेज का आधा तो पहले ही खर्च हो चुका है, जिसका की भी जमीनी असर नजर नही आया है अभी तक।

वित्तमंत्री ने बता दिया कि वे अगले कुछ दिनों तक यानी रोज मीडिया के सामने आएंगी और कुछ न कुछ ऐलान करेंगी। लेकिन ध्यान हे कि उनके पास खर्च करने को अब सिर्फ करीब 6 लाख करोड़ ही बचे हैं क्योंकि 70 फीसदी तो ठिकाने लग चुका है।

हालांकि फिलहाल तो वित्त मंत्री ने इन सवालों को टाल दिया कि इस सबके लिए पैसा कहां से आएगा, लेकिन जवाब तो देने ही होंगे। सरकार ने इसी महीने अपनी कर्ज की सीमा को 7.8 लाख करोड़ से बढ़ाकर 12 लाख करोड़ कर लिया है, जिससे उसके पास करीब 4.2 लाख करोड़ अतिरिक्त आ जाएंगे। बार्कलेज के एक अनुमान के अनुसार सरकार की बैलेंस शीट में सिर्फ 1.9 लाख करोड़ की गुंजाइश थी, जिसमें अब 4 लाख करोड़ का गैप दिख रहा है।

गौरतलब है कि सिर्फ कोरोना संकट से ही देश की अर्थव्यवस्था या सरकार की वित्तीय स्थिति ऐसी नहीं हुआ, यह पहले से ही बुरी हालत में थी। 2019-20 में ही संकेत दिखने लगे थे कि सरकार का राजस्व घट रहा है। अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अप्रैल में जीएसटी कलेक्शन के आंकड़े बेहद बुरी तस्वीर सामने रखते हैं। मौटे तौर पर देखें तो सरकार 2020-21 के बजट में टैक्स से आमदनी का लक्ष्य 24.23 लाख करोड़ रखा था जो कि पिछले साल के मुकाबले करीब 12 फीसदी अधिक था। लेकिन अब हम इन आंकड़ों को छू पाएंगे इसकी संभावना नहीं दिखती।

वित्त मंत्री ने जो भी घोषणाएं कीं वह मोटे तौर पर सिर्फ लोन गारंटी की है, तो सवाल है कि असली राहत कहां है। सरकार के पास वित्तीय गुंजाइश है नहीं, अगर होती तो शायद लाखों मजदूरों को पैदल सड़कों पर नहीं निकलना पड़ता।

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