एनआरसी पर बंगाल के मुसलमानों में खौफ की वजह अमित शाह, खुली धमकी ने किया डर फैलाने का काम

एनआरसी पर अमित शाह के बयान से नाराज पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने बीजेपी को पहले त्रिपुरा में एनआरसी लाने की चुनौती दी है। ऐसा होने पर सीएम बिप्लब देव भी सूची से बाहर हो जाएंगे। ममता ने कहा कि बंगाल या दूसरे राज्य में एनआरसी की कोई जरूरत नहीं है।

फोटोः सोशल मीडिया
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रीता तिवारी

अमित शाह ने कहा कि हिंदू, सि ख, जैन, ईसाई और बौद्ध शरणार्थियों को मिलेगी नागरिकता l लगने लगी है सरकारी दफ्तरों में भीड़, आत्महत्या करने वालों की संख्या भी बढ़ी जैसे-जैसे बंगाल में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स) की प्रक्रिया शुरू करने का शोर बढ़ रहा है, लोग जमीन, मकान, जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र हासिल करने और कागजात में हुई गड़बड़ियों को दुरुस्त करने के लिए सुबह-सवेरे सरकारी दफ्तरों में पहुंच रहे हैं। बीते दो-तीन सप्ताह से कई मुस्लिम संगठनों ने अल्पसंख्यक-बहुल इलाकों में सेमिनारों का आयोजन कर और पर्चे बंटवा कर लोगों से अपना नागरिकता संबंधी दस्तावेज दुरुस्त करने की अपील भी की है।

दरअसल, असम के बाद पश्चिम बंगाल में एनआरसी अब एक मजबूत राजनीतिक हथियार के तौर पर उभर रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अक्टूबर के पहले सप्ताह में कोलकाता आकर बता चुके हैं कि बंगाल में भी एनआरसी लागू किया जाएगा। इसके बाद से कोलकाता के अलावा असम और बांग्लादेश की सीमा से लगे इलाकों में सरकारी दफ्तरों में भीड़ लग रही है। कोलकाता नगर निगम के डिप्टी मेयर अतीन घोष बताते हैं कि एनआरसी पर आतंक की वजह से रोजाना ढाई सौ से ज्यादा लोग यहां पहुंच रहे हैं।

दक्षिण 24 परगना जिले से नगर निगम आईं शबीना खातून बताती हैं कि हम सुबह छह बजे से ही कतार में हैं। कल भी आए थे। लेकिन घंटों खड़े होने के बावजूद हमारा नंबर नहीं आया। साल 2012 में उनके भाई का जन्म हुआ था। लेकिन तब घरवालों ने जन्म प्रमाणपत्र नहीं लिया था। अब एनआरसी की लागू होने की संभावना से वे लोग कागजात दुरुस्त करने में जुटे हैं। बांग्लादेश से लगे सीमावर्ती इलाकों में तो हालात बेहद गंभीर हैं।

दरअसल पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से शरणार्थियों के आने का सिलसिला देश की आजादी जितना ही पुराना है। वहां से आए लाखों लोग सीमावर्ती इलाकों में हैं। वैसे, सरकारी दफ्तरों में लगने वाली इस भीड़ में अधिकांश लोग अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। इसकी वजह भी है। अमित शाह ने कोलकाता में कहा था कि पश्चिम बंगाल में एनआरसी लागू होना तय है लेकिन उससे पहले सरकार नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के जरिये हिंदू, सिख, जैन, ईसाई और बौद्ध शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दे देगी।

मतलब साफ है कि नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी सिर्फ मुसलमानों की है। उनके लिए यह बड़ा संकट है, क्योंकि जिसकी जमीन नहीं है, जो कमजोर आर्थिक स्थिति वाले हैं, जो कम पढ़े-लिखे हैं, आखिर वे किस आधार पर सिद्ध कर पाएंगे कि वे कितने वर्षों से यहां रह रहे हैं। इस कारण लोग आत्महत्या तक कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दस्तावेज नहीं होने या उनमें गलतियां होने की वजह से अब तक लगभग डेढ़ दर्जन लोग आत्महत्या कर चुके हैं। खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसकी पुष्टि की है।

आत्महत्या करने वालों में निभाष नामक एक व्यक्ति भी हैं। बीते लोकसभा चुनावों में निभाष ने हनुमान का वेश बना कर नदिया जिले की रानाघाट संसदीय सीट पर बीजेपी उम्मीदवार जगन्नाथ सरकार का प्रचार करते हुए काफी सुर्खियां बटोरी थी। निभाष के पड़ोसियों का दावा है कि नागरिकता संबंधी तमाम दस्तावेज नहीं होने की वजह से ही उसने मानसिक अवसाद का शिकार होकर आत्महत्या कर ली। निभाष ने अमित शाह के दौरे और उनके इस बयान के बाद ही आत्महत्या की जिसमें उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार बंगाल में एनआरसी लागू करने पर कृतसंकल्प है।

वैसे, कांग्रेस और सीपीएम के सहयोग-समर्थन के साथ तृणमूल कांग्रेस इसका पुरजोर विरोध कर रही है। विधानसभा में बीते महीने एनआरसी के खिलाफ एक प्रस्ताव भी पारित किया गया था। कांग्रेस और वामपंथी दलों ने उस प्रस्ताव का समर्थन किया। ममता ने 12 सितंबर को कोलकाता में एनआरसी के विरोध में आयोजित एक रैली का नेतृत्व भी किया था। राज्य सरकार रेडियो, टीवी और अखबारों पर विज्ञापन जारी कर अफवाहों पर ध्यान नहीं देने की अपील भी कर रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कहती हैं कि उनकी सरकार किसी भी हालत में बंगाल में एनआरसी लागू नहीं करने देगी।

उनका सवाल है कि अगर बीजेपी एनआरसी को लेकर इतनी उतावली है तो वह पहले त्रिपुरा में यह कवायद क्यों नहीं करती? वहां लागू होने की स्थिति में मुख्यमंत्री बिप्लब देव भी सूची से बाहर हो जाएंगे। ममता का कहना है कि असम में असम समझौते के प्रावधानों की वजह से ही एनआरसी लागू किया गया। बंगाल या देश के दूसरे हिस्सों में एनआरसी लागू करने की कोई वजह नहीं हैं।

नागरिकता विधेयक, 1995 में संशोधन पर विचार करने वाली संसद की स्थायी समिति के सदस्य कांग्रेस सांसद प्रदीप भट्टाचार्य का भी कहना है कि बंगाल के लोग एनआरसी नहीं चाहते। विधानसभा में इसके खिलाफ आम राय से एक प्रस्ताव भी पारित हो चुका है। उनका कहना है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक असंवैधानिक और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

सीपीएम के वरिष्ठ नेता और कोलकाता नगर निगम के पूर्व मेयर विकास रंजन भट्टाचार्य का भी मानना है कि बंगाल में एनआरसी की कोई जरूरत नहीं है और नागरिकता (संशोधन) विधेयक असंवैधानिक है। लेकिन बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक और एनआरसी पर आम राय बनाने के लिए घर-घर जाकर अभियान चलाने का फैसला किया है। संघ के प्रवक्ता जिष्णु बसु कहते हैं कि हम घर-घर जाकर लोगों को एनआरसी और नागरिकता (संशोधन) विधेयक के बारे में बताएंगे और यह भी समझाएंगे कि अवैध बांग्लादेशी मुसलमान घुसपैठियों को निकालने के लिए एनआरसी किस तरह जरूरी है।